सरिस्का की ऐतिहासिक सफलता, अब देशभर के टाइगर रिजर्व अपनाएंगे राजस्थान मॉडल

शून्य से बढ़कर 56 हुई बाघों की संख्या

सरिस्का की ऐतिहासिक सफलता, अब देशभर के टाइगर रिजर्व अपनाएंगे राजस्थान मॉडल
राजस्थान का सरिस्का दुनिया में बाघ पुनर्स्थापन (Tiger Relocation) की सबसे सफल मिसाल बन गया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने शिरकत की। सरिस्का में बाघों की संख्या शून्य से बढ़कर 56 हो चुकी है, जो अब अन्य अभयारण्यों के लिए रोल मॉडल है।

अलवर। राजस्थान में कभी बाघों से पूरी तरह खाली हो चुका सरिस्का अब दुनिया में बाघ पुनर्स्थापन की सबसे सफल मिसाल बनकर उभरा है। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि के 18 वर्ष पूरे होने पर रविवार को सरिस्का बाघ अभयारण्य राष्ट्रीय स्तर के मंथन का केंद्र बना, जहां देशभर के बाघ संरक्षण विशेषज्ञ, वरिष्ठ वन अधिकारी और वैज्ञानिक जुटे। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राजस्थान सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला "बाघ पुनर्स्थापन : अवसर एवं चुनौतियां" का उद्घाटन केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने किया।

कार्यशाला में राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, अंतरराष्ट्रीय बिग कैट गठबंधन (आईबीसीए) के महानिदेशक, विभिन्न राज्यों के प्रधान मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, क्षेत्रीय निदेशक और देश के प्रमुख वन्यजीव वैज्ञानिक शामिल हुए। इस दौरान सरिस्का मॉडल के आधार पर देश के अन्य बाघ-विहीन और कम बाघ घनत्व वाले बाघ अभयारण्य पुनर्स्थापन की रणनीति पर मंथन हुआ। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरिस्का का 18 वर्षों का सफर ऐतिहासिक रहा है। बेहतर निगरानी, मजबूत प्रबंधन और उत्कृष्ट आवास संरक्षण के कारण सरिस्का वर्तमान में देश ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है। 

उन्होंने कहा कि प्रत्येक बाघ अभयारण्य की अपनी अलग परिस्थितियां हैं और जहां बाघों की संख्या नहीं बढ़ रही है वहां विशेष रणनीति अपनाई जाएगी। यादव ने कहा कि बाघ संरक्षण के साथ-साथ जल संरक्षण, पक्षी संरक्षण, सामुदायिक भागीदारी और प्रकृति पर्यटन को भी समान महत्व देना होगा। बाघ अभयारण्य से जुड़े ग्रामीणों के कौशल विकास पर विशेष जोर देने की आवश्यकता है ताकि संरक्षण और आजीविका दोनों मजबूत हों। उन्होंने बताया कि सरिस्का परियोजना के 20 वर्ष पूरे होने पर बड़ा राष्ट्रीय आयोजन किया जाएगा।

राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा ने कहा कि सरिस्का में बाघों की संख्या शून्य से बढ़कर 56 तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि है और जल्द ही यह आंकड़ा 60 तक पहुंचने की उम्मीद है। उन्होंने बाघ संरक्षण में ग्रामीणों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार से राजस्थान के लिए भी चीता परियोजना स्वीकृत करने की मांग रखी। एनटीसीए के सदस्य सचिव संजय कुमार ने कहा कि वर्ष 2004 में सरिस्का से बाघों के पूरी तरह समाप्त होने के बाद जो चूक हुई, उसे सुधारते हुए 2008 में दुनिया का पहला वैज्ञानिक बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रम शुरू किया गया। अब सरिस्का केवल बाघों का संरक्षण क्षेत्र नहीं बल्कि "स्रोत क्षेत्र" बन चुका है, जहां से भविष्य में बाघ अन्य अभयारण्यों तक पहुंच सकेंगे।

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उन्होंने इस सफलता का श्रेय तत्कालीन एनटीसीए सचिव राजेश गोपाल, फील्ड डायरेक्टर पी. सोमशेखर और वैज्ञानिक प्रबंधन को दिया। इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) के महानिदेशक डॉ. एस.पी. यादव ने कहा कि बाघ पुनर्स्थापन का प्रयास रूस में सफल नहीं हो सका, लेकिन राजस्थान ने इसे दुनिया के सामने सफल मॉडल के रूप में स्थापित किया। उन्होंने कहा कि मजबूत आधारभूत ढांचा, प्रभावी निगरानी और शिकार पर नियंत्रण सफलता की सबसे बड़ी कुंजी हैं। उन्होंने जानकारी दी कि सितंबर में सरिस्का में 32 देशों के वन्यजीव विशेषज्ञों का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित होगा।

कार्यशाला में बताया गया कि भारत वर्तमान में विश्व के करीब 70 प्रतिशत जंगली बाघों का संरक्षण कर रहा है। देश में 58 बाघ अभयारण्य में करीब 3,682 बाघ हैं। पिछले एक दशक में बाघ अभयारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो चुकी है और संरक्षित क्षेत्र 84 हजार 450 वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों ने कहा कि बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं बल्कि पूरे जंगल और जैव विविधता का आधार है। इसलिए आवास पुनर्स्थापन, शिकार आधार मजबूत करने, वन्यजीव गलियारों, पुनर्प्रवेश, वन्यजीव स्थानांतरण और वैज्ञानिक प्रबंधन जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यशाला में चीता परियोजना पर भी विशेष विचार-विमर्श हुआ।

दो दिवसीय कार्यशाला से प्राप्त सुझावों के आधार पर देश के बाघ-विहीन और कम बाघ घनत्व वाले क्षेत्रों के लिए नई वैज्ञानिक कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इससे एनटीसीए, राज्य वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय और मजबूत होगा और बाघ संरक्षण में भारत की वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका को नई मजबूती मिलेगी।

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