जेएलएफ में चले शब्दों के बाण : बॉलीवुड और सत्ता के रिश्तों पर उठते सवालों के बीच बोले कवि जावेद अख्तर- समाज के बदलाव से तय होता है सिनेमा का नायक, सत्ता से टकराव अकेले फिल्मों की जिम्मेदारी नहीं

कोई भी बड़ा उद्योग पूरी तरह एंटी-एस्टैब्लिशमेंट नहीं होता

जेएलएफ में चले शब्दों के बाण : बॉलीवुड और सत्ता के रिश्तों पर उठते सवालों के बीच बोले कवि जावेद अख्तर- समाज के बदलाव से तय होता है सिनेमा का नायक, सत्ता से टकराव अकेले फिल्मों की जिम्मेदारी नहीं

बॉलीवुड और सत्ता के रिश्तों पर उठते सवालों के बीच मशहूर गीतकार, पटकथा लेखक और कवि जावेद अख्तर ने एक बार फिर अपनी बेबाक, तार्किक और यथार्थवादी सोच से गहरी छाप छोड़ी। उनका मानना है कि सिनेमा, साहित्य और कला को सत्ता से अलग कर देखना एक सरलीकृत दृष्टि।

जयपुर। बॉलीवुड और सत्ता के रिश्तों पर उठते सवालों के बीच मशहूर गीतकार, पटकथा लेखक और कवि जावेद अख्तर ने एक बार फिर अपनी बेबाक, तार्किक और यथार्थवादी सोच से गहरी छाप छोड़ी। उनका मानना है कि सिनेमा, साहित्य और कला को सत्ता से अलग कर देखना एक सरलीकृत दृष्टि है। कला किसी निर्वात में नहीं जन्म लेती, बल्कि समाज के माहौल, भय, दबाव और असुरक्षा से प्रभावित होकर ही आकार लेती है। ऐसे में केवल सिनेमा से यह अपेक्षा करना कि वह हर परिस्थिति में सत्ता से टकराए, पूरे सामाजिक ढांचे की जटिलताओं को नजरअंदाज करने जैसा है। जावेद अख्तर ने स्पष्ट कहा कि कोई भी बड़ा उद्योग या प्रभावशाली मीडिया संस्थान पूरी तरह एंटी-एस्टैब्लिशमेंट नहीं होता। जिस समाज में डर और असहजता का वातावरण हो, वहां खुलकर बोलना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। इसलिए अगर सिनेमा सवाल पूछने से बचता दिखाई देता है तो इसके पीछे केवल फिल्म इंडस्ट्री नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक मानसिकता भी जिम्मेदार है। सत्ता और इतिहास के संदर्भ में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि कोई भी शासक मूल रूप से कम्युनल नहीं होता।

सत्ता का असली धर्म सत्ता ही है। जो विचारधारा सत्ता को मजबूत करती है, वही उसकी नीति बन जाती है। कम्युनलिज्म पर बोलते हुए जावेद अख्तर ने इसे सामाजिक सोच की सबसे बड़ी भूल बताया। उनके अनुसार, किसी पूरे समुदाय को एक ही तराजू में तौलना अन्यायपूर्ण है। आज के सिनेमा, गीतों और भाषा के स्तर पर होने वाली आलोचनाओं पर उन्होंने आत्ममंथन की बात कही। उनका सवाल था कि क्या हमने नई पीढ़ी को भाषा, कविता और साहित्य से जोड़ने की गंभीर कोशिश की है। अगर यह रिश्ता कमजोर हुआ है, तो इसकी जिम्मेदारी केवल सिनेमा पर नहीं डाली जा सकती। समय बदलता है, समाज बदलता है और कला भी उसी के साथ अपना स्वरूप बदलती है। कोई भी स्वर्ण युग कभी वर्तमान में नहीं होता।

अपने निजी जीवन का जिक्र करते हुए जावेद अख्तर ने बताया कि उनकी सोच की बुनियाद मां से मिले संस्कारों में है। बचपन में मां का साया भले ही कम समय के लिए मिला, लेकिन भाषा, अदब और जीवन-मूल्य उन्होंने वहीं से सीखे। प्रगतिशील कवि पिता जांनिसार अख्तर, लेखिका मां सफिया अख्तर और मामा मजाज जैसे रचनात्मक व्यक्तित्वों की विरासत ने उनके विचारों को व्यापक बनाया। प्रगतिशील साहित्य पर चर्चा करते हुए जावेद अख्तर ने कृष्ण चंदर को विशेष रूप से याद किया। उनके अनुसार, कृष्ण चंदर का लेखन नारेबाजी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और आम इंसान के दुख-दर्द की सच्ची अभिव्यक्ति है। यही साहित्य का असली धर्म है- सत्ता के करीब होना नहीं, बल्कि मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना। हिंदी सिनेमा के बदलते नायक पर टिप्पणी करते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि सिनेमा समाज का आईना है। किसान और मजदूर से लेकर एंग्री यंग मैन और आज के आत्मसंतुष्ट, खुले विचारों वाले नायक तक का सफर समाज के बदलाव का प्रतिबिंब है। उनके विचार यह स्पष्ट करते हैं कि सिनेमा, समाज और सत्ता एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं और इन्हें अलग-अलग खानों में बांटकर नहीं देखा जा सकता। 

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