सावधान! नल में पानी आया...पीने लायक है या नहीं, गुणवत्ता परीक्षण का सिस्टम फेल
नौ हजार आबादी क्षेत्रों के पानी में मिले नाइट्रेट, फ्लोराइड, लोहा और लवणता के ज्यादा लक्षण
जयपुर। सुबह उठे, नल खोला...गिलास भरा और पानी पी लिया। रोज की तरह, लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि जो पानी साफ दिखाई दे रहा है, वह पीने के लिए सुरक्षित भी है या नहीं? राजस्थान में इस सवाल को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश की 9 हजार आबादी क्षेत्रों के पानी में गुणवत्ता संबंधी समस्या चिह्नित की जा चुकी है। कहीं पानी में लवणता ज्यादा है, तो कहीं नाइट्रेट और फ्लोराइड व लोहा की समस्या है। यानी पानी आंखों से साफ दिखे, फिर भी उसमें ऐसी चीजें हो सकती हैं, जो शरीर के लिए नुकसानदेह हों। सबसे बड़ी चिंता यह है कि जिस पानी की गुणवत्ता जांचकर लोगों को सुरक्षित पानी उपलब्ध कराना था, उसकी जांच-निगरानी की व्यवस्था ही सुस्त है।
24.52 लाख लोगों के पानी पर सवाल :
अप्रैल 2024 तक प्रदेश की 1,19,215 बस्तियों में से 9,002 बस्तियों को पेयजल गुणवत्ता प्रभावित चिह्नित किया गया था। इन बस्तियों में रहने वाले 4,20,270 परिवार यानी 24,52,582 लोग प्रभावित बताए गए। यानी मामला सिर्फ कुछ गांवों या कुछ हैंडपंपों का नहीं है। लाखों लोगों के रोज पीने और खाना बनाने में इस्तेमाल होने वाले पानी की गुणवत्ता सवालों के घेरे में है।
पानी की जांच के लिए 486 करोड़...खर्च सिर्फ 40 करोड़ :
यहां सवाल और गंभीर हो जाता है। जल जीवन मिशन के तहत पानी की गुणवत्ता जांच और निगरानी के लिए राजस्थान को 486.23 करोड़ रुपए उपलब्ध कराए गए थे, लेकिन जनवरी 2025 तक इनमें से सिर्फ 40.39 करोड़ रुपए यानी 8.31 प्रतिशत ही खर्च हुए। इस पर कैग की रिपोर्ट में भी सवाल उठाए गए है। अर्थात 445.84 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हुए। मतलब साफ है एक तरफ हजारों बस्तियों में पानी की गुणवत्ता पर सवाल हैं और दूसरी तरफ पानी की जांच-निगरानी के लिए उपलब्ध राशि का 91 फीसदी से ज्यादा हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो पाया।
गांव-ढाणी तक पहुंचनी थी जांच :
जेजेएम की राशि से पानी की प्रयोगशालाओं में जांच, नियमित निगरानी, फील्ड टेस्टिंग किट की खरीद और लोगों को प्रशिक्षण जैसी गतिविधियां होनी थीं। आॅडिट में पर्याप्त जल गुणवत्ता परीक्षण नहीं होने, ब्लॉक स्तर की प्रयोगशालाओं की स्थापना में कमी और महिलाओं को फील्ड टेस्टिंग किट से प्रशिक्षण नहीं देने जैसी कमियां सामने आईं।
सलाह भी बेअसर :
जेजेएम के तहत प्रत्येक राज्य को मिलने वाली वार्षिक निधि का अधिकतम दो प्रतिशत हिस्सा पानी की गुणवत्ता जांच और निगरानी के लिए निर्धारित है। इस राशि से प्रयोगशालाओं में पानी की जांच, नियमित निगरानी, फील्ड टेस्टिंग किट की खरीद और कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाना था। इसके बावजूद राजस्थान में इस मद पर खर्च बेहद कम रहा। 2020-21 की वार्षिक कार्ययोजना मंजूर करते समय भारत सरकार के अवर सचिव ने प्रयोगशाला परीक्षण बढ़ाने की सलाह दी थी, लेकिन बेअसर रही।

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