सरकारी बेड़े में ईवी का अभाव, पेट्रोल-डीजल पर हर साल खर्च हो रहे 11 करोड़ से अधिक
286 सरकारी वाहनों में 249 वाहन अब भी पेट्रोल-डीजल पर निर्भर
जयपुर। सरकारी वाहनों के संचालन में पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की सरकारी कवायद के बीच राजस्थान के सरकारी वाहन बेड़े की तस्वीर अलग ही कहानी बयां कर रही है। राज्य के मोटर गैराज विभाग के आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक चार साल में सरकारी वाहनों के पेट्रोल-डीजल पर 44.34 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हुए हैं। इनमें पेट्रोल पर करीब 4 करोड़ 59 लाख 69 हजार 570.11 रुपए और डीजल पर 40 करोड़ 34 लाख 95 हजार 333.61 रुपए खर्च किए गए। यानि हर साल पेट्रोल-डीजल पर 11 करोड़ रुपए से अधिक राशि खर्च हो रही है।
वाहन बेड़े में इलेक्ट्रिक की हिस्सेदारी बेहद कम :
मोटर गैराज विभाग के नियंत्रण, निरीक्षण अथवा संचालन में कुल 286 वाहन हैं। इनमें 178 पेट्रोल, 71 डीजल और महज 17 इलेक्ट्रिक वाहन शामिल हैं। यानी कुल सरकारी वाहन बेड़े में करीब 94 फीसदी वाहन अभी भी पारंपरिक ईंधन पर निर्भर हैं। सीएनजी श्रेणी का एक भी वाहन दर्ज नहीं है।
इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ाने की जरूरत : सरकारी वाहन बेड़े में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या महज 17 होना इस पूरे आंकड़े का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। इनमें से 2 गाड़ी मुख्यमंत्री, 5 राजस्थान हाउस दिल्ली और 10 गाडियां सचिवालय में संचालित हो रही है। एक तरफ ईंधन खर्च लगातार करोड़ों में है, वहीं दूसरी ओर इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बेहद सीमित है। ऐसे में सरकारी वाहनों को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने से ईंधन खर्च घटाने के साथ प्रदूषण कम करने में भी मदद मिल सकती है।
खर्च के साथ बदलता दिखा ईंधन का ट्रेंड :
शुरुआती वर्ष में डीजल वाहनों पर खर्च पेट्रोल की तुलना में काफी अधिक था, लेकिन इसके बाद डीजल खर्च में गिरावट आई और पेट्रोल मद का खर्च बढ़ा। 2023-24 में पेट्रोल पर सबसे ज्यादा 1.24 करोड़ और 2022-23 में डीजल पर 14.43 करोड़ रुपए खर्च हुए। इससे सरकारी परिवहन व्यवस्था में ईंधन के बदलते उपयोग का संकेत मिलता है।

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