शिक्षक दिवस पर देखिए शिक्षकों की एक उजली तस्वीर, खाली पदों के बीच उम्मीदों से चहकती कक्षाएं
कहीं एक शिक्षक संभाल रहा कई कक्षाएँ
जयपुर। इन दिनों सरकारी स्कूलों की चर्चा टूटी दीवारों, खाली पदों और संसाधनों की कमी और तबेलों जैसे हालात के कारण वहीं से शुरू होकर वहीं समाप्त हो जाती है। लेकिन शिक्षक दिवस पर राजस्थान के सरकारी विद्यालयों की एक दूसरी तस्वीर भी देखने लायक है। ऐसे शिक्षकों की, जिन्होंने संसाधनों की प्रतीक्षा करने के बजाय अपने हिस्से की जमीन को बेहतर बनाने का बीड़ा उठाया। कहीं उन्होंने पौधे लगाए, कहीं महापुरुषों के नाम पर वाटिकाएँ बनाईं, कहीं जनसहयोग से कमरे खड़े किए और कहीं एक से अधिक कक्षाओं की जिम्मेदारी उठाते हुए भी बच्चों का परिणाम बेहतर बनाया।
दौसा जिले के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, राणौली, रामगढ़ पचवारा की तस्वीर इसी जिजीविषा की मिसाल है। पिछले पांच वर्षों में विद्यालय केवल क्रमोन्नत नहीं हुआ, इसमें अब हरियाली, फूल-पौधे, छायादार वृक्ष और अलग-अलग नामों वाली वाटिकाएँ दिखाई देती हैं। विद्यालय का परिसर बताता है कि शिक्षा केवल ब्लैकबोर्ड पर लिखे पाठ का नाम नहीं; बच्चे जिस वातावरण में सीखते हैं, वह भी उनकी शिक्षा का हिस्सा है। पूरे प्रदेश में ऐसे 2500 से अधिक स्कूल हैं, जिन्हें शिक्षकों ने बदल दिया है।
24 अप्रैल 2021 को प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यभार संभालने वाले सूरज कुमार बुनकर ने स्थानीय समुदाय को विद्यालय से जोड़ने की कोशिश की। जनसहयोग से विद्यालय में निर्माण कार्य हुए, परिसर को संवारा गया और नामांकन बढ़ाने पर जोर दिया गया। बुनकर के अनुसार इन वर्षों में विद्यालय ने शत-प्रतिशत परीक्षा परिणाम भी दिया। वे अब कार्यवाहक प्रधानाचार्य के रूप में विद्यालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
इस उपलब्धि का दूसरा पहलू अधिक गंभीर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य में शिक्षक-व्याख्याताओं के 86,369 पद रिक्त हैं। प्रधानाचार्य एवं समकक्ष स्तर पर ही 5,445 पद खाली हैं। यानी हजारों विद्यालय स्थायी नेतृत्व के बजाय कार्यवाहक व्यवस्था पर चल रहे हैं। कई जगह शिक्षकों को अपनी निर्धारित कक्षा और विषय से आगे बढ़कर दूसरी कक्षाएँ भी संभालनी पड़ रही हैं। संस्कृत शिक्षा में भी तस्वीर चिंताजनक है। संस्कृत विद्यालयों और महाविद्यालयों में 1,814 पद रिक्त बताए गए हैं। पिछले वर्षों में शिक्षकों की संख्या भी घटती रही है। लेकिन इन आंकड़ों के बीच राणौली जैसे विद्यालय एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं—सरकारी स्कूल की सबसे बड़ी पूंजी उसकी इमारत नहीं, उसका प्रतिबद्ध शिक्षक है। शिक्षक दिवस शायद इसी अदृश्य श्रम को देखने का दिन है; क्योंकि बहुत से शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ा रहे, वे अपने हाथों से स्कूल और बच्चों—दोनों का भविष्य गढ़ रहे हैं।
शिक्षकों ने पीढ़ियों को गढ़ा है :
पिछले 79 वर्षों में राजस्थान के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों ने केवल पीढ़ियों को पढ़ाया नहीं, बल्कि प्रदेश का नागरिक समाज गढ़ा है। रेगिस्तानी ढाणियों से आदिवासी अंचलों और छोटे गांवों तक उन्होंने पहली पीढ़ी को अक्षरज्ञान दिया, बेटियों को स्कूल तक पहुंचाया, वैज्ञानिक सोच विकसित की, सामाजिक भेदभाव को चुनौती दी और हजारों बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, प्रशासक, सैनिक, खिलाड़ी, साहित्यकार और जिम्मेदार नागरिक बनने की राह दिखाई। राजस्थान आज शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, साहित्य, खेल और सार्वजनिक जीवन में जो स्थान रखता है, उसके पीछे लाखों शिक्षकों का दशकों का अनदेखा श्रम भी है। सच तो यह है कि आधुनिक राजस्थान केवल योजनाओं और इमारतों से नहीं बना—उसे कक्षाओं में खड़े शिक्षकों ने भी बनाया है।

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