दौसा और बूंदी में चप्पल पर छिड़ा चुनावी संग्राम : निर्दलीय बोले-हमें ये निशान नहीं चाहिए, बदलो चुनाव चिन्ह

नियम के हिसाब से ही बंट रहे निशान

दौसा और बूंदी में चप्पल पर छिड़ा चुनावी संग्राम : निर्दलीय बोले-हमें ये निशान नहीं चाहिए, बदलो चुनाव चिन्ह
निकाय चुनाव में दौसा और बूंदी के कुछ निर्दलीय प्रत्याशियों को चुनाव चिन्ह के रूप में चप्पल मिलने से नाराजगी। प्रत्याशियों ने निशान बदलने की मांग उठाई। उनका कहना है कि चप्पल को शुभ नहीं मानते और जनता के बीच इसे लेकर वोट मांगने में असहजता होगी।

जयपुर। निकाय चुनाव में उम्मीदवार वोट मांगने के लिए गलियों की खाक छान रहे हैं, लेकिन दौसा ओर बूंदी में कुछ निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए चुनावी सफर शुरू होने से पहले ही चप्पल सिरदर्द बन गई है। चुनाव चिन्ह के रूप में चप्पल मिलते ही कई प्रत्याशियों की त्यौरियां चढ़ गईं। अब उनका कहना है कि जनता से वोट मांगने जाएंगे तो हाथ में चप्पल लेकर कैसे जाएं, निशान बदलवाओ! मामला राज्य निर्वाचन आयोग की चुनाव चिन्ह सूची से जुड़ा है। निर्दलीय प्रत्याशियों के मुताबिक आयोग की सूची में अलमारी पहले और चप्पल दूसरे नंबर पर है। चुनाव चिन्ह आवंटन की प्रक्रिया में इसी क्रम के चलते कई उम्मीदवारों के हिस्से में चप्पल आ गई। बस फिर क्या था, चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही प्रत्याशियों का मूड ऑफ हो गया। उम्मीदवारों का तर्क है कि चुनाव में निशान ही उनकी पहचान बनता है। ऐसे में अगर मनपसंद चिन्ह न मिले और ऊपर से ऐसा निशान मिल जाए जिसे वे शुभ नहीं मानत, तो परेशानी होना स्वाभाविक है।

चप्पल देखकर प्रत्याशियों का पारा चढ़ा :

निर्दलीय प्रत्याशियों ने चुनाव चिन्ह बदलने की मांग उठाते हुए कहा कि नामांकन के समय उन्होंने अपनी पसंद के चिन्ह मांगे थे। उनका सवाल है कि जब उन्होंने चप्पल को पसंद में चुना ही नहीं, तो फिर उनके हिस्से में यही निशान क्यों आया। उम्मीदवारों का कहना है कि चुनाव चिन्ह महज एक निशान नहीं होता, बल्कि मतदाताओं के बीच प्रत्याशी की पहचान बन जाता है। इसलिए वे ऐसा चिन्ह चाहते हैं, जिसे लेकर वे पूरे उत्साह के साथ जनता के बीच जा सकें।

पसंद का निशान मांगा, लेकिन सूची ने दे दी चप्पल :

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नामांकन के दौरान कुछ प्रत्याशियों ने अपनी पसंद के अलग-अलग चुनाव चिन्ह भर दिए थे। लेकिन पेंच यहां फंस गया कि उनके पसंद किए गए कुछ निशान राज्य निर्वाचन आयोग की निर्धारित 40 चुनाव चिन्हों की सूची में थे ही नहीं। ऐसे में रिटर्निंग अधिकारी के पास भी विकल्प सीमित थे। आयोग की सूची में जो चिन्ह उपलब्ध हैं, उसी के आधार पर आवंटन किया जा रहा है।

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नियम के हिसाब से ही बंट रहे निशान :

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मामले पर दौसा रिटर्निंग अधिकारी संजू मीणा ने स्पष्ट भी किया कि चुनाव चिन्हों का वितरण राज्य निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन के अनुसार किया जा रहा है। उपलब्ध चुनाव चिन्हों की सूची में जो क्रम तय है, उसी आधार पर प्रत्याशियों को चिन्ह आवंटित किए जा रहे हैं। यानी फिलहाल प्रत्याशियों की नाराजगी अपनी जगह और आयोग के नियम अपनी जगह। अब देखना दिलचस्प होगा कि दौसा और बूंदी की चप्पल चुनावी मैदान में उतरती है या प्रत्याशियों की मांग पर इसका रंग-रूप बदलता है। फिलहाल इतना जरूर है कि निकाय चुनाव में इस बार वोट से पहले ही चप्पल ने खूब चर्चा बटोर ली है।

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