हर 36वें बच्चे को आटिज्म, सही समय पर पहचान और थैरेपी से इलाज संभव
वर्ल्ड ऑटिज्म डे आज: न्यूरो डेवलपमेँट से जुड़ी बीमारी है ऑटिज्म, देर से बोलने वाले 50 प्रतिशत बच्चों में ऑटिज्म की समस्या
देरी से बोलने वाले 50 प्रतिशत बच्चों में ऑटिज्म देखने को मिल रहा है। ऑटिज्म जन्मजात भी होता है और कई केसेज में यह जैनेटिक भी होता है।
जयपुर। न्यूरो डेवलपमेंट से जुड़ी बीमारी ऑटिज्म देश में तेजी से बढ़ रही है। हर 36वां बच्चा ऑटिज्म से ग्रसित है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर बच्चा पैदा होने के बाद दो साल की उम्र तक भी न बोले, उसके भाव चेहरे देखकर न बदलकर चीजें देखने में बदले तो उसकी जल्दी से जल्दी न्यूरो डेवलपमेंट थैरेपी शुरू करने की आवश्यकता है। स्पीच डिले यानी देर से बोलना ऑटिज्म का प्रमुख लक्षण है। देरी से बोलने वाले 50 प्रतिशत बच्चों में ऑटिज्म देखने को मिल रहा है। ऑटिज्म जन्मजात भी होता है और कई केसेज में यह जैनेटिक भी होता है। इसकी पहचान करने का एक और असरदार तरीका यह है कि सात से आठ महीने के बच्चे की प्रतिक्रिया पर ध्यान दें। अगर चेहरे न देखकर चीजें देखने में उनकी प्रतिक्रिया बदल रही है तो उनकी जांच जरूर करवानी चाहिए।
पहले बच्चे को ऑटिज्म तो दूसरे में होने की संभावना 10 से 15 प्रतिशत
जेकेलोन अस्पताल के रेयर डिजीज सेंटर के प्रमुख और वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रियांशु माथुर ने बताया कि अगर किसी युगल के पहले बच्चे में ऑटिज्म की पहचान हो चुकी है तो उनके दूसरे बच्चे में भी इसकी समस्या होने की संभावना 10 से 15 प्रतिशत तक होती है। कुछ जेनेटिक टेस्ट जैसे क्रोमोसोम माइक्रो एरे, एग्जोम, सिक्वेंसिंग आदि टेस्ट के जरिए इस बीमारी को डायग्नोज किया जा सकता है। डॉ. माथुर ने बताया कि आजकल की एडवांस थैरेपी से ऑटिज्म का इलाज संभव है। इसके साथ ही एडवांस दवाइयों से भी इस बीमारी में सुधार आता है। अगर इनकी समय पर थैरेपी शुरू की जाए तो इसकी बहुत अच्छे से मैनेज किया जा सकता है। इसके लिए मरीज की न्यूरो डेवलपमेंट थैरेपी की जाती है। इसके अंतर्गत ऑक्यूपेशनल थैरेपी, स्पीच थैरेपी भी शामिल हैं।
पहले बच्चे को ऑटिज्म तो दूसरे में होने की संभावना 10 से 15 प्रतिशत
जेकेलोन अस्पताल के रेयर डिजीज सेंटर के प्रमुख और वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रियांशु माथुर ने बताया कि अगर किसी युगल के पहले बच्चे में ऑटिज्म की पहचान हो चुकी है तो उनके दूसरे बच्चे में भी इसकी समस्या होने की संभावना 10 से 15 प्रतिशत तक होती है। कुछ जेनेटिक टेस्ट जैसे क्रोमोसोम माइक्रो एरे, एग्जोम, सिक्वेंसिंग आदि टेस्ट के जरिए इस बीमारी को डायग्नोज किया जा सकता है। डॉ. माथुर ने बताया कि आजकल की एडवांस थैरेपी से आॅटिज्म का इलाज संभव है। इसके साथ ही एडवांस दवाइयों से भी इस बीमारी में सुधार आता है। अगर इनकी समय पर थैरेपी शुरू की जाए तो इसकी बहुत अच्छे से मैनेज किया जा सकता है। इसके लिए मरीज की न्यूरो डेवलपमेंट थैरेपी की जाती है। इसके अंतर्गत ऑक्यूपेशनल थैरेपी, स्पीच थैरेपी भी शामिल हैं।
पहले बच्चे को ऑटिज्म तो दूसरे में होने की संभावना 10 से 15 प्रतिशत
जेकेलोन अस्पताल के रेयर डिजीज सेंटर के प्रमुख और वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रियांशु माथुर ने बताया कि अगर किसी युगल के पहले बच्चे में ऑटिज्म की पहचान हो चुकी है तो उनके दूसरे बच्चे में भी इसकी समस्या होने की संभावना 10 से 15 प्रतिशत तक होती है। कुछ जेनेटिक टेस्ट जैसे क्रोमोसोम माइक्रो एरे, एग्जोम, सिक्वेंसिंग आदि टेस्ट के जरिए इस बीमारी को डायग्नोज किया जा सकता है। डॉ. माथुर ने बताया कि आजकल की एडवांस थैरेपी से आॅटिज्म का इलाज संभव है। इसके साथ ही एडवांस दवाइयों से भी इस बीमारी में सुधार आता है। अगर इनकी समय पर थैरेपी शुरू की जाए तो इसकी बहुत अच्छे से मैनेज किया जा सकता है। इसके लिए मरीज की न्यूरो डेवलपमेंट थैरेपी की जाती है। इसके अंतर्गत आक्यूपेशनल थैरेपी, स्पीच थैरेपी भी शामिल हैं।
- आंखों से संपर्क बनाने से बचना
दूसरों की भावनाओं को समझने में कठिनाई
दोस्तों के साथ घुलने-मिलने में परेशानी
खेल या सामूहिक गतिविधियों में रुचि की कमी
देर से बोलना सीखना या बोलने की क्षमता का अभाव
शब्दों या वाक्यों को बार-बार दोहराना
किसी विषय पर अधिक बात करना, लेकिन संवाद न बना पाना
संकेतों और हावभावों को समझने में कठिनाई
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