भ्रष्टाचार के आरोप की पुष्टि के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं करना गंभीर : हाईकोर्ट
जस्टिस अशोक कुमार जैन ने विवेक शर्मा की याचिका पर दिए आदेश
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एसबीआई के अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में एसीबी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आरोपों की पुष्टि होने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं करना गंभीर है। इससे लगता है कि एसीबी ने आरोपियों को बचाने का प्रयास किया है। वहीं अदालत ने एसबीआई के उप महा प्रबन्धक व मुख्य प्रबन्धक-एचआर के खिलाफ रिश्वत से जुडे मामले की एफआईआर दर्ज कर जांच करने के आदेश दिए हैं। जस्टिस अशोक कुमार जैन ने यह आदेश विवेक शर्मा की याचिका पर दिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि एसीबी के महानिदेशक ने मामले में एफआईआर की बजाय प्रारंभिक शिकायत ही दर्ज करने का निर्देश दिया, जबकि मामले में मांग सत्यापन व ट्रेप कार्यवाही के बाद एसीबी को एफआईआर दर्ज करना जरूरी था। एसीबी ने प्रारंभिक सत्यापन के बाद एफआईआर दर्ज कर नियमित जांच की बजाय मामला बंद करने का प्रयास किया। याचिका में अधिवक्ता मोहित खंडेलवाल ने बताया कि याचिकाकर्ता एसबीआई में मुख्य प्रबंधक के पद पर था। उसने भिवाडी ब्रांच में कार्यरत रहते हुए 51 लाख रुपए के फर्जी हाउसिंग लोन की अनियमितता का मामला उजागर किया। मामला उजागर करने पर बैंक के अफसरों ने उसे प्रताड़ित किया और उसके खिलाफ केस दर्ज कराया। वहीं बाद में उस पर लगाए आरोप खत्म करने के लिए 40 लाख रुपए की रिश्वत की मांग का सत्यापन कर बैंक के अफसरों के खिलाफ ट्रेप कार्रवाई कर रकम बरामद की। इसके बावजूद मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की और प्रारंभिक जांच के बाद आरोपी अफसरों को क्लीन चिट देकर याचिकाकर्ता के खिलाफ ही झूठी शिकायत देने पर कार्रवाई शुरू कर दी।
डिफॉल्ट जमानत प्रार्थना पत्रों को लेकर हाईकोर्ट ने दिए दिशा-निर्देश : राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोप पत्र पेश करने के लिए तय अवधि बीतने के बाद पेश होने वाले डिफॉल्ट जमानत प्रार्थना पत्रों को लेकर सभी सत्र न्यायाधीशों को दिशा-निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए हैं। जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने यह आदेश अशोक कुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने डिफॉल्ट जमानत प्रार्थना पत्र पेश होने पर संबंधित अधिकारी या लिपिक प्रार्थना पत्र पर उसे पेश करने की तिथि और समय लिखेगा। इसके अलावा यह भी स्पष्ट रूप से सुनिश्चित किया जाएगा कि संबंधित मामले में आरोप पत्र पेश हुआ है या नहीं। इसके अलावा ऐसे जमानत प्रार्थना पत्रों को सुनवाई के लिए उसी दिन पेश किया जाएगा। याचिका में अधिवक्ता कपिल शर्मा ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ टोडाभीम थाने में बीएनएस और आईटी एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज हुआ था। पुलिस को 90 दिन में आरोप पत्र पेश करना था। जिसकी मियाद गत 6 अगस्त को पूरी हो गई है। इसके बावजूद चिली अदालत ने याचिकाकर्ता की न्यायिक अभिरक्षा को जारी रखा और आरोप पत्र पेश की प्रतीक्षा में मामले की सुनवाई 25 अगस्त तक टाली गई।
प्रेमी युगल को शारीरिक क्षति होने पर पुलिस अधीक्षक होंगे जिम्मेदार
राजस्थान हाईकोर्ट ने डीग पुलिस अधीक्षक को कहा है कि वह याचिकाकर्ता प्रेमी युगल की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा अपने स्तर पर देखे। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि उन्हें शारीरिक क्षति हुई तो इसके लिए एसपी जिम्मेदार होंगे। जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने यह आदेश खुशबु व अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता स्वप्निल सिंह पटेल ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता बालिग हैं और मर्जी से डीग जिले में लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। याचिकाकर्ताओं के परिजन उनके विवाह पंजीकरण से सहमत नहीं है। उन्हें याचिकाकर्ताओं के बारे में जानकारी मिलने पर अब उन्हें धमकाया जा रहा है और जान से मारने की धमकी दी है।

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