दस साल में 11,722 प्रसूताओं की जान बचाई, अस्पतालों में 95 फीसदी की डिलेवरी हो रही जो राष्ट्रीय औसत से ज्यादा

2014-16 में सालाना 3582 गर्भवती प्रसव दौरान दम तोड़ती थी, अब 1536 हुई मातृ मुत्यु दर

दस साल में 11,722 प्रसूताओं की जान बचाई, अस्पतालों में 95 फीसदी की डिलेवरी हो रही जो राष्ट्रीय औसत से ज्यादा

प्रदेश में मातृ मुत्यु दर कम होने की राहत भरी खबर है।

जयपुर। प्रदेश में मातृ मुत्यु दर कम होने की राहत भरी खबर है। सालाना औसतन 18 लाख महिलाओं के प्रसव होते हैं। ऐसे में दस साल पहले जहां हर एक लाख प्रसूताओं में से प्रसव के दौरान 199 महिलाओं की मौत हो जाया करती थी। वह आंकड़ा अब घटकर 87 पर आ गया है। ऐसे में वर्ष 2014-16 में जहां 3582 महिलाएं प्रसव दौरान दम तोड़ देती थी। बीते साल दो हजार प्रसूताओं की जान प्रसव दौरान बचाई गई है, 1536 महिलाओं की जान हालांकि नहीं बचाई जा सकी। सैम्पल रजिस्ट्रेशन सर्वे यानी एसआरएस की रिपोर्ट में यह सुखद आंकड़े सामने आए हैं। प्रसव के दौरान प्रसूताओं की मौत का बड़ा कारण अस्पताल में डिलेवरी नहीं कराना माना जाता है। प्रदेश में शिक्षा के स्तर बढ़ने, स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति जागरूकता के कारण अब 95 फीसदी महिलाओं का संस्थागत प्रसव हो रहा है, जो कि राष्ट्रीय औसत से 7 फीसदी ज्यादा है। देश का संस्थागत प्रसव अभी 88 फीसदी है।

उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान और प्रबंधन :

गर्भवती महिलाओं में एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य जटिलताओं की जल्द पहचान के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच को बढ़ावा दिया जा रहा है। गर्भवती महिला का पहले 12 हफ्तों में पंजीकरण और आवश्यक चिकित्सा जांच अनिवार्य की गई है।  

11, 722 का यह है गणित :

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दस साल यानी वर्ष 2015 की मातृ मुत्यु दर के हिसाब से प्रदेश में अब तक कुल 11722 गर्भवती महिलाओं की जान बचाई गई है। वर्ष 2014 से देखें तो मातृ मुत्यु दर जो 199 थी, वह अब 87 रह गई है। वर्ष वार हर साल होने वाली प्रसूताओं के आंकड़ो और मातृ मृत्यु दर के हिसाब से इन प्रसूताओं को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सका है। 2014 से हर दो साल के आंकड़ों के अनुसार क्रमश: 264, 600, 1508, 2408, 2910, 4032 प्रसूताओं को तब की मातृ मुत्यु दर में हुई कमी के लिहाज से बचाया जा सका है।

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सुरक्षित मातृत्व आश्वासन कार्यक्रम :

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कार्यक्रम में सुरक्षित प्रसव, प्रसवोत्तर देखभाल, नवजात देखभाल, टीकाकरण और लेबर रूम की स्वच्छता पर फोकस रहता है। स्वास्थ्य मित्र, आशा कार्यकर्ता और एएनएम इसकी अहम कड़ी है।

स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार :

ग्रामीण और दूरदराज में पीएचसी और सीएचएसी अस्पताल बढ़े हैं। यहां आपातकालीन प्रसव सेवाएं, सिजेरियन ऑपरेशन, नवजात देखभाल इकाइयां स्थापित की गई हैं। नि:शुल्क इलाज सेवाओं के साथ परिवहन सुविधाएं भी नि:शुल्क हैं।

जागरूकता और समुदाय आधारित कार्यक्रम :

आशा दिवस पीएचसी पर जागरूकता कार्यक्रम होते हैं। गर्भवती उसके परिवारों को मातृ और शिशु स्वास्थ्य के बारे में जानकारी दी जाती है। 

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