जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल : साहित्य का उत्सव, जिसने बदल दी दुनिया में शहर की पहचान
आर्थिक संरचना को किस तरह प्रभावित करता आया है
बीते लगभग दो दशकों में यह आयोजन जयपुर के सामाजिक व्यवहार, सांस्कृतिक आत्मबोध और आर्थिक संरचना को किस तरह प्रभावित करता आया है।
जयपुर। 15 जनवरी से जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल एक बार फिर शहर में लौट रहा है। कुछ दिन के लिए ही सही, लेकिन जयपुर की पहचान पिंक सिटी या हेरिटेज डेस्टिनेशन से बदलकर ग्लोबल कल्चरल हब के रूप में हो जाएगी। सवाल यह नहीं कि यह बदलाव बुरा है या अच्छा-सवाल यह है कि इस बदलाव ने शहर के भीतर क्या बदला और किसके लिए। यह स्टोरी को किसी उत्सव की तारीखों और मंचों तक सीमित नहीं रखती। यह देखने की कोशिश करती है कि बीते लगभग दो दशकों में यह आयोजन जयपुर के सामाजिक व्यवहार, सांस्कृतिक आत्मबोध और आर्थिक संरचना को किस तरह प्रभावित करता आया है।
एक छोटे साहित्यिक जमावड़े से वैश्विक शोकेस तक: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत एक अपेक्षाकृत सीमित और आत्मीय साहित्यिक पहल के रूप 2006 में हुई थी, जहां लेखक और पाठक लगभग एक ही घेरे में खड़े दिखाई देते थे। शुरुआती वर्षों में यह उत्सव बहसों, विचारों और पुस्तकों के इर्द-गिर्द घूमता था, बिना किसी भारी चमक-दमक के। समय के साथ यह आयोजन फैलता चला गया। अंतरराष्ट्रीय लेखकों की आमद, बड़े मीडिया हाउसेज की दिलचस्पी और प्रायोजकों की मौजूदगी ने जेएलएफ को एक वैश्विक मंच बना दिया। आज इसे दुनिया के सबसे बड़े साहित्यिक आयोजनों में गिना जाता है। लेकिन इसी यात्रा में यह सवाल भी उठा, क्या आकार बढ़ने के साथ इसकी आत्मा भी सुरक्षित रही?
जब शहर एक आयोजन के हिसाब से सांस लेने लगता है
जेएलएफ के दिनों में जयपुर का शहरी जीवन एक अलग लय में चलता है। होटल भरे रहते हैं, टैक्सी और आॅटो चालकों को अतिरिक्त सवारियां मिलती हैं, कैफे और रेस्तरां देर रात तक खुले रहते हैं। कई स्थानीय दुकानदारों और सेवा प्रदाताओं के लिए ये कुछ दिन साल के सबसे फायदेमंद दिन होते हैं। लेकिन यह तस्वीर पूरी नहीं है। पुराने शहर के कई इलाकों, छोटे व्यवसायों और आम नागरिकों के जीवन में यह उत्सव सिर्फ ट्रैफिक, सुरक्षा घेराबंदी और बढ़ती भीड़ के रूप में प्रवेश करता है। शहर को मिलने वाला आर्थिक लाभ समान रूप से बंटता नहीं और यहीं से इसके उत्सव होने के दावे पर सवाल खड़े होते हैं।
उत्सव और शहर के लोग: एक दूरी जो बढ़ती गई
एक समय था जब जेएलएफ को एक ऐसा मंच माना जाता था जहां कोई भी छात्र, पाठक या नागरिक आकर लेखकों को सुन सकता था। धीरे-धीरे यह भावना कमजोर पड़ी है। आज बहुत से आम जयपुरिया इसे अपने लिए नहीं, बल्कि बाहर से आए लोगों के लिए आयोजित ईवेंट के रूप में देखते हैं। भाषा, विषयों की प्रस्तुति और आयोजन का कुल माहौल एक ऐसे दर्शक वर्ग को ध्यान में रखता दिखता है जो पहले से सांस्कृतिक पूंजी से लैस है। सवाल यही है, क्या साहित्य का उत्सव केवल उन्हीं लोगों के लिए होता है, जो पहले से साहित्य तक पहुंच रखते हैं?
स्थानीय भाषाएं, मंच पर उपस्थिति या हाशिए की भूमिका?
जयपुर जैसे शहर में, जहां हिंदी और राजस्थानी साहित्य की सशक्त परंपरा रही है, यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। जेएलएफ ने अंतरराष्टÑीय पहचान अवश्य हासिल की है, लेकिन इस पहचान की भाषा मुख्यत: अंग्रेजÞी रही है। हिंदी और राजस्थानी लेखकों की मौजूदगी अक्सर सीमित सत्रों या प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व तक सिमटती दिखाई देती है। यह विरोधाभास साफ है, स्थानीय शहर, स्थानीय भाषा और वैश्विक उत्सव के बीच संतुलन कहीं न कहीं डगमगाता हुआ दिखता है।
साहित्य से तमाशा: उत्सव का बदलता मिजाज
आज जेएलएफ में साहित्य के साथ-साथ राजनीति, फिल्म और सेलेब्रिटी कल्चर एक बड़ी भूमिका निभाता है। बड़े नाम, वायरल होने वाले सत्र और विवाद-ये सब अब उत्सव का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं। यह बदलाव पूरी तरह नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। हर बड़ा सांस्कृतिक आयोजन समय के साथ बदलता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन परिवर्तनों में साहित्य केंद्र में बना हुआ है, या वह एक आकर्षक बैकड्रॉप भर रह गया है?
एक खुला सवाल है जे एल एफ
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ने जयपुर को वैश्विक सांस्कृतिक नक्शे पर महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। इसने शहर के लिए अवसर भी बनाए हैं और नई पहचानों के द्वार भी खोले हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ असुविधाजनक सवाल भी उभरे हैं, स्थानीय बनाम वैश्विक, जन-उत्सव बनाम एलीट आयोजन, साहित्य बनाम ब्रांडिंग। शायद जेएलएफ को समझने का सबसे ईमानदार तरीका यही है कि उसे किसी निष्कर्ष में बांधने के बजाय, एक चलते हुए संवाद के रूप में देखा जाए, ऐसा संवाद जो जयपुर शहर, उसके लोगों और उसके साहित्य से लगातार सवाल करता रहे।

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