राजस्थान निकाय चुनाव : राहुल गांधी के संगठन सृजन पर कुंडली मारकर बैठे नेताओं का मखौल, चुनिंदा नेता ही चुनाव लड़ने-जीतने के लिए काफी

राहुल की बात पर कितना ध्यान

राजस्थान निकाय चुनाव : राहुल गांधी के संगठन सृजन पर कुंडली मारकर बैठे नेताओं का मखौल, चुनिंदा नेता ही चुनाव लड़ने-जीतने के लिए काफी
चुनाव में प्रत्याशी चयन ने राहुल गांधी के संगठन सृजन मिशन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पर्यवेक्षकों की रायशुमारी रिपोर्ट के बावजूद सिंबल पुराने नेताओं और गहलोत-डोटासरा खेमे के करीबी नेताओं को मिले। इससे कार्यकर्ताओं और ब्लॉक-जिला अध्यक्षों में नाराजगी है। सवाल है—क्या यह रणनीति 2028 के विधानसभा चुनाव में भी दोहराई जाएगी?

जयपुर। राहुल गांधी कांग्रेस संगठन सृजन के जरिए ब्लॉक और जिला इकाइयों को मजबूत बनाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव में प्रत्याशियों की घोषणा ने इस मिशन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लंबे समय से कुंडली मारकर बैठे नेता प्रत्याशी तय कर रहे हैं। पर्यवेक्षकों ने विधानसभा क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं से रायशुमारी कर रिपोर्ट दी थी, फिर भी प्रदेश कांग्रेस ने सिंबल लेटर उन नेताओं के हाथ में सौंप दिए, जो पहले विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं।

इनमें अधिकांश अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ गोविन्द डोटासरा के सिपहसालार हैं। इससे आम कार्यकर्ता नाराज हैं, क्योंकि ब्लॉक और जिला संगठन का महत्व नजर नहीं रहा। सवाल उठता है कि क्या हारे-जीते विधायक प्रत्याशियों की सहमति से उम्मीदवार घोषित करना राहुल के मिशन को मजबूत कर रहा है या कमजोर। यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यही नजारा 2028 के विधानसभा चुनाव में भी दोहराया जा सकता है।

गहलोत-डोटासरा का दबदबा

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ गोविन्द डोटासरा राजस्थान में ताकतवर रूप में नजर आए हैं। निकाय चुनाव के प्रत्याशी चयन में उनके करीबी नेताओं की प्रमुख भूमिका साफ दिखी।

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कार्यकर्ताओं की नाराजगी

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पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट अनसुनी कर सिंबल पुराने नेताओं को दिए गए। ब्लॉक-जिला अध्यक्ष हाशिए पर रहे, जिससे संगठन की भावना को ठेस पहुंची है।

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राहुल की बात पर कितना ध्यान

राजस्थान के नेता राहुल गांधी की बात को कितनी तवज्जो देते हैं, इसकी झलक प्रत्याशी घोषणा में साफ नजर आई। चुनिंदा नेता ही चुनाव लड़ने-जीतने के लिए काफी समझे जा रहे हैं।

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