कवि डॉ. पॉपुलर मेरठी से विशेष बातचीत, कहा- मुशायरों की मिट्टी से सोशल मीडिया तक कविता का दायरा बढ़ा
सोशल मीडिया ने कवियों के लिए कई दरवाजे खोले
डॉ. पॉपुलर मेरठी हिंदी-उर्दू के उन लोकप्रिय कवियों में हैं, जिन्होंने कवि सम्मेलन और मुशायरों के कई दौर देखे। उनका अनुभव केवल मंच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बदलते समय, मीडिया और समाज के साथ कविता के रिश्ते को भी उन्होंने बहुत करीब से महसूस किया।
जयपुर। डॉ. पॉपुलर मेरठी हिंदी-उर्दू के उन लोकप्रिय कवियों में हैं, जिन्होंने कवि सम्मेलन और मुशायरों के कई दौर देखे हैं। उनका अनुभव केवल मंच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बदलते समय, मीडिया और समाज के साथ कविता के रिश्ते को भी उन्होंने बहुत करीब से महसूस किया है। इस बातचीत में उन्होंने शायरी के पुराने दौर, सोशल मीडिया के प्रभाव और आज के संवेदनशील माहौल पर खुलकर अपने विचार रखे।
डॉ. पॉपुलर मेरठी बताते हैं कि एक समय ऐसा था, जब कविता और मुशायरा ही अभिव्यक्ति का मुख्य माध्यम हुआ करता था। उस दौर में कवियों को यह चिंता नहीं होती थी कि किस तरह की ऑडियंस सामने बैठेगी। श्रोता कविता सुनने और समझने आते थे। आज के समय में हालात बदल गए हैं। सोशल मीडिया ने कविता को हर हाथ में पहुंचा दिया है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया ने कवियों के लिए कई दरवाजे खोले हैं।
आज अगर कोई कवि कविता पढ़ता है, तो वह कविता कुछ ही पलों में देश-विदेश तक पहुंच जाती है। पहले कवि सम्मेलन और मुशायरों में सीमित श्रोता होते थे, आज सोशल मीडिया पर वही कविता लाखों लोग सुनते हैं। उन्होंने बताया कि देश-विदशों में जाकर मुशायरे पढ़ चुके हैं और वहां भी शायरी के शौकीन बड़ी तादाद में मिलते हैं। डॉ. पॉपुलर मेरठी कहते हैं कि इस बदलाव से कवि और शायरों की पहचान तेजी से बढ़ी है। आज कोई नया कवि भी आता है, तो लोग उसे सुनने आते हैं। और जब कोई बड़ा नाम आता है, तो उसके लिए रास्ते अपने आप बन जाते हैं। वे मुस्कराते हुए कहते हैं। मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म से जुड़ाव ने प्रचार और पहचान, दोनों को आसान बनाया है।
व्यंग्य आज भी असरदार है, बस उसकी भाषा और संकेत बदल गए
उन्होंने इस बात पर जोर देते हैं कि सत्ता और समाज पर लिखते समय आज बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। व्यंग्य उनकी पहचान रहा है, लेकिन मैं मानता हूं कि अब सीधे कहने के बजाय इशारों में कहना ज़्यादा कारगर है। व्यंग्य आज भी असरदार है, बस उसकी भाषा और संकेत बदल गए हैं। अपने बचपन को याद करते हुए वे बताते हैं कि उन्हें कविता का शौक बहुत पहले लग गया था। उनके शिक्षक कविता गाया करते थे और गांव में कवि सम्मेलन होते थे। वहीं से कविता की समझ विकसित हुई। पहले श्रोता शायरी को गंभीरता से समझते थे, आज कई बार हल्के चुटकुलों को ही कविता मान लिया जाता है। यह बदलाव उन्हें चिंतित करता है। डॉ. पॉपुलर मेरठी मानते हैं कविता समय चाहती है, साधना चाहती है। उन्होंने कहा कि समाज की बुराइयों पर अंकुश लगाना कविता का मूल उद्देश्य रहा है, लेकिन आज के दौर में यह काम बहुत सोच-समझकर करना पड़ता है। यही संतुलन एक सच्चे कवि की पहचान है।

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