तिल-जल से तर्पण भी श्राद्ध का विकल्प, गाय को चारा खिलाने का भी विधान
श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार समर्पण महत्वपूर्ण
जयपुर। पितृपक्ष में पितरों की तृप्ति के लिए लोग तर्पण, पिंडदान और अन्नदान कर रहे हैं। हालांकि, हर व्यक्ति के लिए विधि-विधान से श्राद्ध करना संभव नहीं होता। ऐसे लोगों के लिए धर्मग्रंथों में यथाशक्ति सरल विकल्प बताए गए हैं। ज्योतिषाचार्य डॉ. महेन्द्र मिश्रा ने बताया कि गया, पुष्कर, हरिद्वार-कनखल, बद्रीनाथ, प्रयागराज और काशी जैसे तीर्थों में पितरों के निमित्त श्राद्ध का विधान है। वहां जाना संभव न हो तो नदी, तालाब या कुएं के जल से श्रद्धापूर्वक तर्पण किया जा सकता है। धन या सामग्री का अभाव होने पर यथाशक्ति अन्नदान, तिल अर्पण अथवा तिल मिश्रित जल से जलांजलि देने का विधान है। गाय को एक दिन का चारा खिलाना भी श्राद्ध का विकल्प माना गया है।
उन्होंने बताया कि कुछ भी संभव न हो तो वृक्ष के समीप जाकर पितरों से श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की जा सकती है। रामायण में भगवान राम द्वारा वनवास के दौरान इंगुदी, बेर और बेल से श्राद्ध करने का उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि श्राद्ध में सामग्री से अधिक श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार समर्पण महत्वपूर्ण है।

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