मौनी अमावस्या पर शंकराचार्य को संगम स्नान से रोके जाने का मामला तूल पकड़ा, प्रशासन पर संविधान उल्लंघन के आरोप

देशभर में लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन किया जाएगा

मौनी अमावस्या पर शंकराचार्य को संगम स्नान से रोके जाने का मामला तूल पकड़ा, प्रशासन पर संविधान उल्लंघन के आरोप

मौनी अमावस्या पर प्रयागराज संगम में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी को संगम स्नान से रोके जाने और साधु-संतों के साथ कथित मारपीट पर राष्ट्रीय विवाद खड़ा हो गया। जयपुर में प्रेस वार्ता में गौमाता राष्ट्रमाता अभियान और गो-संसद ने प्रशासन पर भेदभाव और सनातन धर्म का अपमान करने का आरोप लगाया, दोषियों पर कार्रवाई और स्वतंत्र जांच की मांग की।

जयपुर। मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर प्रयागराज संगम में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी को संगम स्नान से रोके जाने और साधु-संतों के साथ कथित मारपीट की घटना ने अब राष्ट्रीय स्तर पर विवाद का रूप ले लिया है। इस प्रकरण को लेकर गौमाता राष्ट्रमाता अभियान एवं गो-संसद से जुड़े पदाधिकारियों ने शनिवार को जवाहर कला केंद्र, जयपुर में प्रेस वार्ता आयोजित कर प्रशासनिक कार्रवाई को सनातन धर्म का अपमान और संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन बताया।

प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए गौमाता राष्ट्रमाता अभियान के प्रभारी एवं गौ सेवादिश- पश्चिम भारत, बाबूलाल जांगिड ने कहा कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी कोई राजनीतिक पदाधिकारी नहीं, बल्कि एक प्राचीन सनातन मठ के पीठाधीश्वर हैं। ऐसे में उन्हें बिना किसी लिखित आदेश, निषेधाज्ञा अथवा स्पष्ट कारण के संगम स्नान से रोकना पूर्णतः मनमाना और असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि यह घटना किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी सनातन परंपरा और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर आघात है।

गो-संसद के प्रदेश सह प्रभारी, राजस्थान, ताराचंद कोठारी ने बताया कि प्रशासन ने ‘प्रोटोकॉल’ और ‘भीड़ के खतरे’ का हवाला देकर शंकराचार्य जी को संगम क्षेत्र में प्रवेश से रोका, जबकि उपलब्ध वीडियो फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उस समय वहां कोई असामान्य भीड़ मौजूद नहीं थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उसी समय अन्य धार्मिक समूहों को संगम स्नान की अनुमति दी गई, जो प्रशासन की भेदभावपूर्ण कार्यप्रणाली को दर्शाता है।

गो-संसद के प्रदेश सह सचिव, राजस्थान, देवकीनंदन पुरोहित ने कहा कि शंकराचार्य जी को एक समय पर अकेला छोड़ दिया गया और बिना वर्दी वाले अज्ञात व्यक्तियों द्वारा घेरकर उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा का गंभीर उल्लंघन है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शंकराचार्य जी के शिष्यों, जिनमें महिलाएं, वृद्धजन और नाबालिग शामिल थे, के साथ दुर्व्यवहार एवं बल प्रयोग किया गया।

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प्रेस वार्ता में पदाधिकारियों ने वीडियो साक्ष्यों का हवाला देते हुए दावा किया कि एक वर्दीधारी पुलिसकर्मी द्वारा एक साधु की चोटी पकड़कर जमीन पर घसीटते और मारपीट करते हुए स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वक्ताओं ने कहा कि साधु की चोटी पकड़ना केवल शारीरिक हिंसा नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं का जानबूझकर किया गया अपमान है, जिससे देशभर के श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हुई हैं।

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पदाधिकारियों ने प्रशासन से पूरे मामले पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण देने, बिना शर्त माफी मांगने, दोषी पुलिसकर्मियों को जांच पूरी होने तक निलंबित करने तथा स्वतंत्र व समयबद्ध जांच कराने की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शीघ्र न्याय नहीं मिला तो देशभर में लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन किया जाएगा।

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