बेटियों को संबल दें, तुम्हारी जिंदगी से बड़ा कुछ भी नहीं
ससुराल की प्रताड़ना सहने योग्य नहीं तो वह स्थान छोड़ दें, जीवन में आगे बढ़ें
कोटा। वर्तमान में समाज के समक्ष एक अत्यंत गंभीर एवं ज्वलंत मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। शिक्षित , आत्म निर्भर और आधुनिक विचार धारा से युक्त होने के बावजूद कई लड़कियां वैवाहिक जीवन में होने वाले शोषण, प्रताड़ना,एवं मानसिक उत्पीड़न को सहन क्यों करती रहती हैं। वे ससुराल को छोड़कर जीवन में आगे क्यों नहीं बढ़ती। कभी दहेज के नाम, कभी प्रताड़ना के नाम, कभी परिवार के सम्मान के नाम पर, कभी परिवार से अलग होने को कलंक मानने के नाम पर वे अपनी जान तक दे देती हैं। ऐसे हालात का सामना करने के बजाए वह सही और उचित निर्णय क्यों नहीं ले पाती। अक्सर ऐसे हालात में लड़कियां अपने पीहर पक्ष को सभी तरह की जानकारी तो देती हैं लेकिन पीहर पक्ष के परिजन भी उसे केवल सांत्वना भर देते हैं। हालात बदलने का इंतजार भर करवाते हैं लेकिन हालात बदलने में मदद नहीं करते। उसे इसकी जिंदगी के विकट हालात से हटने को नहीं कहते जिनकी वजह से वह कई बार गंभीर और खतरनाक निर्णय ले लेती है। इसी संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय को लेकर दैनिक नवज्योति ने अपने कार्यालय में परिचर्चा का आयोजन किया। परिचर्चा में शहर पुलिस अधीक्षक,अतिरिक्त संभागीय आयुक्त,काउंसलर,एडवोकेट,मानसिक रोग विशेषज्ञ,समाज शास्त्री,स्कूल प्रिंसिपल, डाक्टर ही नहीं सास, बहु सहित ऐसा हालात का सामना कर चुकी बेटियों ने भी हिस्सा लिया। प्रस्तुत हैं परिचर्चा के अंश:-
प्रताड़ना झेलना कोई समाधान नहीं, ससुराल से अलग होकर जीवन बसर कर सकती है
यदि लड़की आत्मनिर्भर है, पढ़ी लिखी है तो तो उसे मानसिक प्रताडना झेलने की जरूरत नहीं है। उसे स्वयं निर्णय लेकर ससुराल से अलग होकर गुजर बसर करना चाहिए।ऐसी स्थितियां अक्सर इसलिए आती है कि बेटियों को यही बताया जाता है कि शादी के बाद ससुराल ही उसका घर है। महिला शिक्षित होने से वह नौकरीपेशा व कामकाजी भी होगी। लेकिन काम व नौकरी के कारण यदि वह घर परिवार में समय नहीं दे पाती या अन्य किसी कारणवश महिला के साथ ससुराल में शोषण होता है तो परिवार को टूटने से बचाने के लिए एक सीमा तक ही उसे सहन किया जा सकता है। अति होने पर उसे लगना चाहिए कि उसे पीहर का सपोर्ट रहेगा। बेटी के पीहर वालों को सामाजिक जकडन को तोडना होगा। आत्महत्या या तलाक लेना समस्या का समाधान नहीं है।
-ममता तिवारी, अतिरिक्त संभागीय आयुक्त
बेटियों को आत्मनिर्भर व सशक्त बनाना होगा
बेटियां शिक्षित होंगी तो नौकरी भी करेंगी। नौकरी करने से वे आर्थिक रूप से तो सक्षम हो जाती हैं लेकिन उन्हें इस तरह की शिक्षा परिवार व समाज में दी जाए जिससे वे सशक्त भी बन सकें। शादी के बाद ससुराल में किसी तरह का शोषण होता है। कोई उसकी स्थिति को समझ नहीं रहा तो उसे आत्महत्या या ऐसा कोई कदम उठाने से पहले वह स्थान छोड़ देना चाहिए। इस स्थिति में उसे परिवार का सपोर्ट जरूर मिलना चाहिए। बेटी को यह कभी नहीं लगना चाहिए कि शादी के बाद पीहर में उसकी कोई जगह नहीं है। महिला को जब कहीं से भी सपोर्ट नहीं मिलता है तब वह तनाव में आकर गलत कदम उठा सकती है। हालांकि हर समय पुरुष ही गलत नहीं होता है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों का कई बार दुरुपयोग भी होता है। बेटियां आत्म निर्भर के साथ सशक्त होंगी तो वे किसी भी परिस्थिति का सामना करते हुए उससे बाहर निकल सकती हैं।
-तेजस्विनी गौतम, पुलिस अधीक्षक कोटा शहर
प्रताड़ना या शोषण की रूट को जानना जरूरी है
लड़कियों को सशक्त बनाना होगा। सोसाइटी में आज हम लड़के व लड़कियों को बराबर शिक्षा दे रहे। समाज पुरूष प्रधान है तो इस सोच को बदलने के लिए पहले आपने आप को आगे आना होगा। जेंडर समानता की बात करें तो ये करीब आगामी वर्ष 2070 में इसमें समानता आ सकती हैं। सोसायटी में देखा जाये तो जिन फैमिली में मेल ने जिम्मेदार ली वहां पर समस्या काफी हद तक खत्म हो जाती हैं। हमें परिवार में एक दूसरे के सम्मान को रखना आना चाहिए। सबका सम्मान हो तो ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है। महिला को सोचना चाहिए कि में अपने पति के पैरेंटस को इज्जत दूंगी तो मेरे पेरेंटस को भी इज्जत मिलेगी। प्रताड़ना या शोषण की रूट को जानना जरूरी है। यदि वास्तव में हालात बेकाबू हो रहे हैं तो उस स्थान से हटना जरूरी है ना कि अपने आप को खत्म कर लेना।
-तविन्दर मीत ग्रोवर, प्रिंसिपल भुवनेश बाल विद्यालय
तलाक समाधान नहीं, समन्वय जरूरी
सहन करना महिला की मजबूरी नहीं है। यह बात महिला को समझना चाहिए। परिवार में भी शिक्षा और समानता की बातें तो सभी करते हैं लेकिन इमोशनल समानता की बातें नहीं की जाती। शादी के बाद महिला उसके साथ गलत होने के बाद भी वह उसका विरोध व सामना नहीं कर पाती। इसका कारण बेटी ने अपनी मां व दादी के साथ जो देखा वह उसे ही जिंदगी समझने लगती है।े जबकि शोषण एक सीमित दायरे तक ही सहन किया जाना चाहिए। लेकिन तलाक किसी समस्या का समाधान नहीं है समंवय बनाए रखना जरूरी है। यदि बेटी के साथ ससुराल छोडने की परिस्थिति बन जाए तो उसे पीहर का सपोर्ट होना चाहिए। जिससे वह अपना जीवन आत्म निर्भर होकर जी सके।
-डॉ. रानू अग्रवाल प्रिंसिपल पैरेंटिग एली प्रे स्कूल
हालात ऐसे कि लड़कियां शादी नहीं करना चाहती
2001 की जनगणना के अनसुार करीब 35 वर्ष की लड़कियां शादी नहीं कर रही हैं। आने वाले समय में ये आंकड़े और भी बढ़ेगे। विभिन्न घटनोंओं को देखकर लड़कियां शादी नहीं कर रही हैं। इन मुद्दों पर खुली चर्चा होनी चाहिए। हर 90 मिनट में एक महिला दहेज की वजह से आत्महत्या कर रही हैं। जिस प्रकार से सोयायटी में महंगी शादियों का चलन स्टेटस सिंबल बन गया हैं। महंगी शादियों से लड़के वालों की अपेक्षा बढ़ती हैं। अपेक्षा पूरी नहीं होने पर फिर विभिन्न प्रकार की हिंसा होती हैं। मेरा मानना है कि लड़कियों को खूब पढ़ाओं पर उनको जरूरत के हिसाब से ही दहेज दो। ं एकल नारी के प्रति समाज की सोच को बदलने के लिए हम कार्य कर रहे हैं।
- चंद्रकला शर्मा, डायरेक्टर एकल नारी शक्ति संगठन
डर, अकेलापन,सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलना बड़ा कारण
पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक इमोशनल होती हैं। शिक्षित व आर्थिक रूप से सक्षम होने के बाद भी ससुराल में शोषण होने पर महिलाएं वहां से नहीं निकल पाती हैं। इसके दस प्रमुख कारण हैं जिनमें डर, अकेलापन,सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलना व जिम्मेदारी बढनाा समेत कई शामिल हैं। लेकिन इन सबके बावजूद भी शोषण झेलना, जीवन समाप्त करना किसी समस्या का समाधान नहीं है। ससुराल में नहीं निभा पाने पर पीहर लौटना ही बेहतर है।
- भुवनेश शर्मा, एडवोकेट, चीफ लीगल एड डिफेंस कॉंसिल
अति होने पर ही लें सख्त निर्णय
पहले संयुक्त परिवार होते थे और अब अधिकतर एकल परिवार होने लगे हैं। जब एक परिवार की बेटी दूसरे परिवार में बहू बनकर जाती है तो किसी की बेटी आपके घर में भी बहू बनकर आती है। जिस तरह के व्यवहार की कल्पना बेटी के ससुराल से की जाती है उसी तरह का व्यवहार बहू के साथ होना चाहिए। सास की विलेन वाली भूमिका पहले होती थी लेकिन अब बहू भी विलेन की भूमिका में हो सकती है। महिला को परिवार में तालमेल बनाकर रखना चाहिए। यदि ससुराल में उसके साथ शोषण की अति हो जाए तो ही उसे शिक्षित व आत्म निर्भर होने पर सख्त व कठोर कदम उठाना चाहिए। आत्म हत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है।
-डॉ. अरुणा अग्रवाल गाइनेकोलाजिस्ट
अन्याय के खिलाफ आवाज बुलन्द नहीं तो शिक्षा किस काम की
में पेशें से एडवोकेट हूं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की तरफ से महिलाओं को नि:शुल्क कानूनी सलाह देती हूं। में यहीं कहना चाहूंगा की पढ़ाई करके डिग्री लेना ही काफी नहीं होता हैं। अन्याय के खिलाफ भी आवाज उठना चाहिये। समाज व परिवार के डर से आप ने अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं की तो आपकी शिक्षा किसी काम की नहीं हैं। इसी के साथ देखने में आता है कि महिलाओं का कार्यस्थल पर शोषण होता हैं। इसके खिलाफ भी उनको आवाज उठानी चाहिये। आपकी शिक्षा का सही उपयोग तब ही होगा जब आप अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करोंगे।
--श्वाति जैन, एडवोकेट लीगल एड डिफेंस कॉंसिल
कानून का सहारा लें
आज हर महिला को कानूनी सहायता मिलती है, उसे पता भी है। लेकिन वह केन्द्र तक पहुंचे तो उसकी विकट स्थितियों में मदद हो सकती है। पीड़ित महिलाओं को उनको अधिकारों व कानूनी जानकारी नि:शुल्क दी जाती हैं। केंद्र का उद्देश्य यही है कि अगर कोई महिला पीड़ित है तो उसके परिवार की समझाइश करके उसकी समस्या का समाधान केंद्र द्वारा ही किया जा सके। महिला सुरक्षा एवं सलाह केंद्र पुलिस प्रशासन व महिला अधिकारिता विभाग द्वारा संचालित है। ये केंद्र शहर के सर्किल आॅफिस में जितने भी पुलिस स्टेशन है वहां पर संचालित होता हैं। केंद्र में े एक विधिक काउंसलर और दूसरा साइकोलॉजिकल काउंसलर बैठता है।
- शिवानी शर्मा , उद्योग नगर पुलिस स्टेशन , एमएसएसके साइकोलॉजिकल काउंसलर
समाज की कथित सीख में बदलाव जरूरी
आर्थिक आत्मनिर्भरता हमेशा भावनात्मक स्वतंत्रता नहीं देती। ळ१ं४ें इङ्मल्ल्िरल्लॅ: यानी की आघात बंधन जिसमें प्यार, डर और अपमान का मिश्रण भावनात्मक निर्भरता पैदा करता है। छीं१ल्ली िऌी’स्र’ी२२ल्ली२२: यानी की असहज बार-बार शोषण से व्यक्ति को लगता है कि वह कुछ बदल नहीं सकती। घर बचाना, समझौता करना जैसी सीख महिलाओं को रिश्ते में टिके रहने के लिए दबाव डालती है। वहीं इसके बाद बदनामी, अकेलेपन, बच्चों, आर्थिक असुरक्षा या परिवार के समर्थन न मिलने का भय। इसके चलते आत्म-सम्मान में कमी, लगातार आलोचना और गैसलाइटिंग से आत्मविश्वास टूट जाता है। वहीं अवसाद, चिंता जैसी मानसिक समस्याएं निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता हमेशा भावनात्मक स्वतंत्रता नहीं देती।
- डॉ. दीपक गुप्ता, आईएमए अध्यक्ष वरिष्ठ मनोचिकित्सक
अपने जीवन से प्यार करें
मैं तो यहीं कहूंगी की डर के आगे जीत है, पर वहीं हम देखते आ रहे है कि और मेरा मानना है कि पुरूष और महिलाओं की आबादी शायद बराबर हैं। वहीं सुसाइड के बारे में मेरा मानना है कि ये जिंदगी कभी भी दोबारा नहीं मिलेगी, इसलिए कभी भी सुसाइड नहीं करे और अपने जीवन से प्यार करे। वहीं अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर के साथ -साथ आत्मरक्षक भी बनाये। वहीं ईश्वर का दिया हुआ जीवन अच्छे से जीये।
-नीलम विजय, कैट वुमन विंग अध्यक्ष
रोग की असली जड़ नहीं देख पा रहे
हम शिक्षा के माध्यम से बच्चे में विवेक जागृत करे, माता-पिता भी इसमें सहयोग करे। विवाह एक बहुत बड़ा निणर्य होता है, दोनों सोच-समझकर करे। शादी हमेशा बराबरी के परिवार में ही करे। वहीं पैरेंटस को भी इस पर बच्चों से चर्चा करनी चाहिए। वहीं उनकी काउंसलिंग भी करवानी चाहिए। विवाह को व्यवसाय ना बनाये, विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार हैं। में पेशे से महिला डॉक्टर हूं। मेरे पास पूरे दिनभर विभिन्न प्रकार की महिलाएं आती है। पर यदि देखा जाएं तो समाजरूपी शरीर में जो तकलीफ होती है वहां महिला-पुरूष की दृष्टि से नहीं देखे। इन तकलीफ से युवा भी पीड़ित हैं। हम ट्विशा शर्मा,अतुल सुभाष सहित अन्य विभिन्न केस की बात कर रहे है ये घटनाएं बहुत ही निंदनीय है पर सच्चाई किसी को पता नहीं हैं।
-डॉ. नील प्रभा,कंसल्टेंट व रेडियोलॉजिस्ट
दबाव या बंधन तोड़ना होगा
शादी के बाद हर बेटी को यही बताया जाता है कि अब ससुराल ही उसका घर है। ऐसे में ससुराल में उसके साथ शोषण होने पर भी वह सामाजिक दबाव में सब कुछ सहन करती रहती है। सामाजिक संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं। लेकिन महिलाओं पर समाज का दबाव या बंधन इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि वह अपनी रक्षा के लिए भी निर्णय नहीं ले सकें। पीहर का सपोर्ट नहीं मिलने व ससुराल में शोषण होने पर ही महिला गलत कदम उठाने को मजबूर होती है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। सामाजिक संस्थाओं को सामाजिक दबाव कम करने की दिशा में भी काम करने की जरूरत है।
-प्रतीक्षा पारीक डायरेक्टर प्रतीक्षा चेरिटेबल फाउंडेशन
शिक्षा के साथ संस्कार देने होंगे
समाज में ऐसा नहीं है कि केवल महिलाएं हीं असुरक्षित हैं। कई बार पुरुष भी इसके शिकार होते हैं। ऐसे में केवल एक पक्ष को सुनकर ही कोई निर्णय नहीं करना चाहिए। बच्चे परिवार में देखकर ही सीखते हैं। ऐसे में उन्हें शिक्षा के साथ संस्कार देने की भी जरूरत है। ससुराल में महिला के साथ यदि कोई गलत व्यवहार होता है तो दोनों परिवारों को आपसी संवाद व समंवय से उसका समाधान निकालना चाहिए। काउंसलिंग की जानी चाहिए। फिर भी यदि बात नहीं बनती है तो गलत कदम उठाने से अच्छा है बेटी को अपने घर आ जाना चाहिए। क्योंकि बेटी का जीवन सबसे महत्वपूर्ण है।
-सरोज मिश्रा, संयोजिका आराधना सेवा संस्थान
सोशल मीडिया के दिखावे के बजाए यर्थाथवाद पर ध्यान दें
वर्तमान में देखने में आ रहा है कि माडर्न महिलाओं के द्वारा आत्महत्या की जा रही हैं। ग्रामीण परिवेश में भी अब इस तरह के मामले आ रहे हैं। वहीं इनके पीछे अनेक कारण होते हैं। वहीं अभी सोशल मीड़िया पर विभिन्न केस आ रहे है जिनमें ट्विशा शर्मा केस की बाते करे उसने शादी के तो वीडियो बढ़कर सोशल मीडिया पर डाले पर जब घर टूटने की बात आई तो उसने एक भी वीडियो नहीं डाला। किसी को बताया भी नहीं । ऐसी स्थिति में यदि उसके माता-पिता उसको साथ रख लेते तो लोग क्या कहेंगे के डर को दूर करना चाहिए। वहीं पैरेंटस को भी अपने बच्चों पर ध्यान देना चाहिए, आपस में एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। दिखावे की जगह पर यर्थाथवाद पर ध्यान देना चाहिए। बच्चों को हर प्रकार की परिस्थिति से रूबर कराना चाहिए।
-ज्योति शर्मा, प्रिंसिपल
बेटी को रखने के लिए पैरेंटस को बड़ा दिल रखना चाहिए
कई बार देखने में आता है कि आत्म निर्भर वाली महिलाएं शोषण सहन करने को तैयार नहीं होती हैं। ऐसी स्थिति में बेटी को रखने के लिए पैरेंटस का दिल बड़ा होना चाहिए। वर्तमान में शिक्षा का स्तर तो बढ़ा है पर संस्कार का नहीं। समाज में परिवर्तन आ रहा है। आगामी वर्ष 2070 में जाकर ये परिवर्तन दिखेंगे। मेरा मानना है कि कोई महिला ससुराल में प्रताड़ित हो रही है तो उसको वहा से निकलने में एक प्रकार को सोशल स्टिग्मा यानी की सामाजिक कलंक महसूस होता हैं। यह सोच समाज ने क्रियेट की है। अभी भी तलाकशुदा महिला के साथ समाज सम्मानजनक व्यवहार नहीं करता हैं। हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे है। सोच बदलनी पड़ेगी।
-सुबोध कुमार , प्रोफेसर गवर्नमेंट आर्टस गर्ल्स कॉलेज
बेटी को मानसिक रूप से ताकतवर बनाना जरूरी
बेटी मानसिक रूप से ताकतवर बनाना जरूरी है। कई बार प्रताड़ना की हद पार होते हम देख चुके हैं। ऐसे मामलों में उसे स्थितियों से लड़ना सिखाना चाहिए। उसे सही निर्णय लेने की ताकत देना चाहिए। सशक्त होने पर वह हर चुनौती का सामना कर सकती है। महिला के साथ ससुराल में शोषण की अति होने पर ही वह मजबूरी में उसे छोड़ती है। ऐसे में उसे पीहर पक्ष का सपोर्ट मिलेगा तो वह जीवन में कुछ कर पाएगी। लेकिन परिवार का सपोर्ट नहीं मिलने व ससुराल में शोषण होने पर वह गलत कदम उठा लेती है। लेकिन महिला सोच ले कि जो उसके साथ हुआ है वह किसी के साथ नहीं होने देगी तो कोई ताकत नहीं है जो उसे ऐसा करने से रोक सके।
-विजय लक्ष्मी गुर्जर खिलाड़ी काउंसलर
यह कहा विशेषज्ञों ने
- जीना मुश्किल हो रहा हो और आत्म निर्भर नहीं हैं तो सबसे पहले आत्म निर्भर हों, यदि आत्म निर्भर हैं और हालात फिर भी सहन करने योग्य नहीं हैं तो तुरन्त ससुराल को छोड़ दें।
- अपने परिवार को अपने वास्तविक हालात से रूबरू कराएं, अकेलेपन, डर, रिश्तेदार समाज क्या कहेगा के निराशाजनक शब्दों से दूर हटें।
- सपोर्ट सिस्टम पर नजर दौड़ाएं, परिवार साथ नहीं दें तो सबसे पहले पुलिस, फिर काउंसलर से सलाह लें।
- सोशल मीडिया का सही उपयोग करना सीखें। दिखावा नहीं करें यथार्त को देखें।
- संवाद और समन्वय जैसे हालात पर भी नजर रखें, वास्तव में स्थितियां बदलने जैसे हालात हों तो इन्तजार भी करें, क्यों कि मानसिक रूप से भावनाएं बदलती रहती हैं।
- स्वतंत्रता और स्वछंदता में अंतर समझना जरूरी, अपनी स्थिति के लिए खुद को ना कोसें, जिंदगी में आगे बढ़ें।
- शिक्षा में आमूल चूल परिवर्तन की जरूरत, मानसिक और भावनात्मक मजबूती को शामिल करें जिससे महिलाएं ऐसी स्थिति का सामना कर पाएं
- तलाक होना, परिवार से दूर रहना, विधवा होना को कलंक मानने जैसी स्थितियों में बदलाव जरूरी।

Comment List