सख्ती के अभाव में भड़क रही लापरवाही की आग, खेतों में खुलेआम जलाए जा रहे फसल अवशेष

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गंभीर असर

सख्ती के अभाव में भड़क रही लापरवाही की आग, खेतों में खुलेआम जलाए जा रहे फसल अवशेष
खेतों में लगाई जा रही आग तेज हवाओं के चलते गांवों और आबादी क्षेत्रों तक पहुंच रही है।

कोटा। हाड़ौती अंचल में फसल अवशेष जलाने की घटनाएं खतरा बनती जा रही हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद किसान खेतों में पराली और सूखे अवशेषों में आग लगा रहे हैं। प्रशासनिक स्तर पर सख्ती नहीं होने के कारण यह लापरवाही अब बड़े खतरे का रूप लेती जा रही है। हालात यह हैं कि खेतों में लगाई जा रही आग तेज हवाओं के चलते गांवों और आबादी क्षेत्रों तक पहुंचने लगी है, जिससे ग्रामीणों में दहशत का माहौल है। वहीं पराली जलाने की बढ़ती घटनाओं के कारण वायु प्रदूषण में भी इजाफा हो रहा है। यानी हवा भी प्रदूषित हो रही है।

 

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यहां पराली की आग ने लिया विकराल रूप

गत दिनों कोटा जिले के रामगंजमंडी क्षेत्र में एक खेत में लगी आग ने कुछ ही देर में विकराल रूप ले लिया था। तेज हवा के कारण आग आसपास के कई खेतों तक फैल गई थी। आग से खेतों में रखे सूखे अवशेष, लकड़ियां और कृषि सामग्री जलकर राख हो गई। सूचना मिलने पर नगर पालिका की दमकल टीम मौके पर पहुंची और करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया था। यदि दमकल समय पर नहीं पहुंचती तो आग पास की आबादी तक पहुंच सकती थी। इसी तरह गत दिनों सांगोद क्षेत्र में भी खेत में लगी आग पशुओं के बाड़े तक पहुंच गई थी। ग्रामीणों ने अपने स्तर पर पानी और मिट्टी डालकर आग बुझाने का प्रयास किया, लेकिन तेज हवा के कारण आग लगातार फैलती रही। बाद में दमकल टीम ने पहुंचकर आग पर नियंत्रण पाया। घटना में पशुओं के चारे और बाड़े को नुकसान पहुंचा है।

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रोक के आदेश केवल कागजों तक सीमित

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फसल अवशेष जलाने पर एनजीटी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्पष्ट प्रतिबंध लगाया हुआ है। इसके बावजूद जिले में नियमों का पालन नहीं हो रहा। ग्रामीणों का आरोप है कि जिम्मेदार विभाग केवल बैठकों और आदेशों तक सीमित हैं। जमीनी स्तर पर निगरानी और कार्रवाई नहीं होने से लोग बेखौफ होकर खेतों में आग लगा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायत करने के बाद भी अधिकारी मौके पर देर से पहुंचते हैं। जब तक जांच होती है, तब तक आग बुझ चुकी होती है और कार्रवाई के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिल पाते। यही कारण है कि दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही है।

 

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गंभीर असर

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार खेतों में अवशेष जलाने से केवल आग का खतरा ही नहीं बढ़ता, बल्कि इससे पर्यावरण को भी भारी नुकसान होता है। पराली और सूखे अवशेष जलाने से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण बढ़ाता है। इससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती है, क्योंकि आग लगने से जमीन में मौजूद उपयोगी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसान यदि अवशेषों को जलाने के बजाय जैविक खाद बनाने या आधुनिक मशीनों के उपयोग की ओर बढ़ें तो इससे मिट्टी की गुणवत्ता भी सुधरेगी और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी।

 

यह है जुर्माने का प्रावधान

-2 एकड़ से कम भूमि पर 5 हजार रुपए

-2 से 5 एकड़ तक 10 हजार रुपए

-5 एकड़ से अधिक भूमि पर 30 हजार रुपए

 

केवल जुर्माने से समस्या का समाधान नहीं होगा। किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकों के प्रति जागरूक करना जरूरी है। इसके लिए गांव स्तर पर अभियान चलाकर किसानों को समझाना जरूरी है।

-त्रिलोकचंद, सामाजिक कार्यकर्ता

 

फसल अवशेष पर आग लगाने पर जुर्माने का प्रावधान है। इसमें सबसे बड़ी समस्या यह है कि आग लगने के बाद मौके पर जाकर जांच करते हैं तो कोई कारण सामने नहीं आते हैं। शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है।

-सुरेश कुमार, पटवारी

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