नेत्र विभाग को मोतियाबिंद, धूल फांक रही ग्रीन लेज़र मशीन

रोज दर्जनों गंभीर मरीज मायूस लौट रहे

नेत्र विभाग को मोतियाबिंद, धूल फांक रही ग्रीन लेज़र मशीन
जयपुर या निजी में जाएं, संभाग के सबसे बड़े अस्पताल में रेटिना सर्जरी विशेषज्ञ ही नहीं।

कोटा। हाड़ौती संभाग के सबसे बड़े महाराव भीमसिंह अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में सुविधाओं और डॉक्टरों की भारी कमी के कारण चिकित्सा व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। आलम यह है कि अस्पताल में वर्ष 2019 में लाखों रुपये की लागत से खरीदी गई आधुनिक 'ग्रीन लेजर' मशीन पिछले कई वर्षों से धूल फांक रही है क्योंकि इसे चलाने के लिए प्रशिक्षित डॉक्टरों की उपलब्धता ही नहीं हो पाई। जिला मुख्यालय तथा संभाग के इस सबसे बड़े केंद्र पर रेटिना (आंख के पर्दे) की सर्जरी तक की सुविधा नहीं है, जिससे रोजाना ओपीडी में आने वाले दर्जनों गंभीर मरीजों को मायूस लौटना पड़ता है।

4 डॉक्टरों के भरोसे पूरा संभाग, प्रमाण पत्र बनाने में ही बीत रहा समय
एमबीएस का नेत्र विभाग वर्तमान में मात्र 4 डॉक्टरों के भरोसे चल रहा है, जिससे काम का अत्यधिक दबाव रहता है। विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार मीणा ने बताया कि विभाग का अधिकांश समय रोजाना आने वाले दिव्यांग प्रमाण पत्र, बनाने व मेडिकल जांच में ही बीत जाता है। क्योंकि एक मरीज की गहन जांच में करीब एक घंटा लगता है। यहां जिले से आने वाले सामान्य पेशेन्ट भी ज्यादा रहते है।

ओसीटी एंजियोग्राफी' मशीन का इंतजार
डॉ. मीणा ने बताया कि विभाग के पास वर्तमान एडवांस चिकित्सा पद्धति के अनुसार आवश्यक अत्याधुनिक 'ओसीटी विद एंजियोग्राफी' (डउळअ) मशीन उपलब्ध नहीं है। इसके अभाव में आंख के पर्दे की जटिल बीमारियों से ग्रसित मरीजों का सटीक डायग्नोसिस और पूर्ण इलाज संभव नहीं हो पाता। इसके अलावा विट्रोक्टोमी मशीन, एडवांस्ड माइक्रोस्कोप और इनडायरेक्ट ऑप्थैल्मोस्कोप जैसे आवश्यक उपकरणों की भी अनुपलब्धता है। फिलहाल विभाग के एक सीनियर डॉक्टर तीन महीने की विशेष रेटिना ट्रेनिंग पर गए हुए हैं, जिनकी वापसी अगस्त माह में संभावित है, जिससे भविष्य में कुछ राहत की उम्मीद है।

आखिर क्यों जरूरी है यह इलाज कोटा में?
कोटा संभाग में मधुमेह (शुगर), उच्च रक्तचाप (बीपी) और जेके लोन अस्पताल में होने वाली समय पूर्व (प्रीमच्योर) डिलीवरी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, जिसके कारण इस इलाज की महत्ता बढ़ गई है।

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प्रीमच्योर बच्चों के लिये जरूरी
जेके लोन अस्पताल में सबसे ज्यादा डिलीवरी होती हैं। जन्म के बाद कई नवजात शिशुओं, विशेषकर समय पूर्व पैदा होने वाले बच्चों की आंखों के पर्दे में 'रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमच्योरिटी' (फडढ) नामक गंभीर बीमारी होने का खतरा रहता है। प्रति माह करीब 100 से 150 बच्चों की फंडस स्क्रीनिंग की जाती है। यदि शुरुआती दिनों में ग्रीन लेजर थेरेपी न मिले, तो बच्चा हमेशा के लिए दृष्टिहीन हो सकता है। मुकम्मल व्यवस्था न होने से इन मासूमों और उनकी प्रसूता मां को तुरंत जयपुर के एसएमएस अस्पताल (चरक भवन) रैफर करना पड़ता है, जिससे उन्हें सफर की भारी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है।

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शुगर व बीपी के मरीजों की रोशनी बचाना
लंबे समय तक शुगर रहने से 'डायबिटिक रेटिनोपैथी' और बीपी के कारण 'हाइपरटेंसिव रेटिनोपैथी' की बीमारी हो जाती है। इसमें आंख के पर्दे की नसें कमजोर होकर फटने लगती हैं और खून उतर आता है। इस स्थिति में अंधापन रोकने के लिए ग्रीन लेजर मशीन से पर्दे की सिकाई की जाती है, जो फिलहाल बंद है। स्थानीय स्तर पर इस अव्यवस्था से मरीजों में भारी आक्रोश है और उन्हें निजी अस्पतालों के महंगे इलाज का शिकार होना पड़ रहा है।

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 हमारे यहां दैनिक ओपीडी के अलावा ऑपरेशन व मेडिकल सर्टिफिकेशन के भी काम होते है। विशेषज्ञ मिलने पर यह सुविधा यहां शुरू हो सकेगी।
-डॉ अशोक मीणा , विभागाध्यक्ष , नेत्र रोग विभाग एमबीएस अस्पताल

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