नौनिहालों को गुणवत्ता परोस रहीं, खुद 'कुपोषण' जैसी दिहाड़ी पर मजबूर
पूरे साल का भुगतान नहीं मिलता
विडंबना: नाममात्र की वेतन वृद्धि ने तोड़ी कुक-कम-हेल्परों की उम्मीद।
कोटा। सरकारी स्कूलों में जब दोपहर की घंटी बजती है, तो सैकड़ों मासूम चेहरों पर मुस्कान खिल उठती है वहीं राजस्थान सरकार एक ओर 'स्वस्थ बचपन' का नारा देती है और स्कूलों में मिड-डे मील की गुणवत्ता सुधारने के लिए नियम बनाती है। लेकिन दूसरी ओर उस भोजन को पकाने वाले कुक कम हेल्पर के साथ बजट में मानदेय की वृद्धि उनके लिए पर्याप्त नहीं हैं। जिले के सरकारी स्कूलों में कार्यरत करीब 1891 कुक-कम-हेल्पर पूरी निष्ठा के साथ विद्यार्थियों को पोषण परोस रहे हैं, लेकिन सरकार उनके खुद के परिवार के पोषण और आर्थिक सुरक्षा को लेकर पूरी तरह मौन साधे हुए है।
गुणवत्ता की शर्त, पर मानदेय में 'कंजूसी'
स्कूलों में पोषाहार तैयार करने वाली ये महिलाएं भोजन की शुद्धता, पोषण और साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखती हैं। दालों के चयन से लेकर बच्चों को परोसने तक, हर कदम पर 'क्वालिटी' सुनिश्चित की जाती है। लेकिन जब बात इन महिलाओं की मेहनत के बदले 'क्वालिटी लाइफ' की आती है, तो सरकार की ओर से मात्र 170 रुपये की मासिक वृद्धि की गई है जो कि नाकाफी हैं।पोषाहार तैयार करने वाली कुक कम हेल्पर पोषाहार तैयार करने के दौरान पूरा गुणवत्ता व पोषण का पूरा ध्यान रखती है। सरकार की ओर से हाल ही में उनके मानदेय में मात्र 170 रुपए मासिक की बढ़ोतरी की गई है। अब उन्हें पहले 2297 रुपए की बजाय 2467 रुपए प्रतिमाह मिलेंगे।शहर सहित जिले के विभिन्न स्कूलों में कार्यरत कुक कम हेल्पर वर्तमान में बढ़ती महंगाई के दौरान मिलने वाला वेतन बहुत ही कम क्योकि खाद्य सामग्री, रसोई गैस, तेल, दाल और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं।
10 माह का ही मिलता है मानदेय
कुक कम हेल्परों की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उन्हें पूरे साल का भुगतान नहीं मिलता। गर्मी, दीपावली और शीतकालीन अवकाश के दौरान उन्हें मानदेय नहीं दिया जाता, जिससे साल में केवल 10 माह की ही आय मिलती है। इस स्थिति में उनकी औसत मासिक आय और भी कम हो जाती है। वहीं बड़ा सवाल ये है कि अन्य विभागों में भी कर्मचारियों सहित अधिकारियों को अवकाश के भी पैसे मिलते है पर कुक कम हेल्परों को क्यों नहीं मिलते हैं। ये बात सोचने वाली हैं।
अकुशल मजूदरी से भी कम मानदेय
यदि दैनिक मजदूरी के हिसाब से तुलना करें तो कुक कम हेल्परों को करीब 82.23 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान मिलता है, जबकि मनरेगा मजदूरों को लगभग 281 रुपए प्रतिदिन मिलते हैं। इस तरह कुक कम हेल्परों का मानदेय अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी के मुकाबले भी काफी कम है। कुक कम हेल्परों का कहना है कि मानदेय बढ़ाने की मांग को लेकर कई बार अधिकारियों को ज्ञापन दे चुके। सरकार तक बात पहुंचाई लेकिन उनकी समस्या को अनदेखा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार को उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करते हुए मानदेय में बढ़ोतरी करनी चाहिए।
बनाने से लेकर परोसने तक की जिम्मेदारी
सरकारी विद्यालयों में पोषाहार तैयार करने वाली इन महिलाओं का कार्य सुबह से शुरू होकर दोपहर तक चलता है। कुक कम हेल्पर भोजन बनाना, बच्चों को परोसना, बर्तन साफ करना और अन्य कार्यों में पूरा दिन निकल जाता है। इतनी मेहनत के बावजूद उन्हें मिलने वाला मानदेय उनके श्रम के अनुरूप नहीं है। हर वर्ष बजट से पहले इन महिलाओं को उम्मीद रहती है कि उनके मानदेय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती है।
इनका कहना है
सरकारी स्कूलों में पोषाहार बनाने वाले कुक कम हेल्परों को वेतन केंद्रीय सरकार द्वारा मिलता हैं।
-रूपसिंह मीणा, प्रारंभिक डीईओ कोटा
मैं स्कूल में कुक कम हेल्पर का कार्य करती हंूं। पर सरकार द्वारा बजट में बढ़ाया गये पैसे हमारे लिए पर्याप्त नहीं हैं। वहीं हम लोग तो न्यूनतम मजूदरी से भी कम पर कार्य कर रहीं हैं।
-कमला बाई , परिवर्तित नाम
स्कूलों में पोषाहार बनाने के दौरान पूरी गुणवत्ता व पोषाहार का ध्यान रखती हूं। पर हम लोगों को वेतन काफी कम मिलता हैं। जिससे घर चलना बहुत ही मुश्किल भरा रहता हैं।
- पर्वती बाई , परिवर्तित नाम

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