जब-जब कागज पर लिखा मैंने मां का नाम, कलम अदब से बोल उठी हो गए चारों धाम
बदलते दौर में मां की नई भूमिका
दैनिक नवज्योति ने मदर्स डे को खास बनाने के लिए विशेष टॉक शो आयोजित किया।
कोटा। लफ़्ज कम पड़ जाते हैं माँ की शान में,
वो खामोशी से पूरी किताब लिख देती है।
रविवार 10 मई को दुनिया भर में मदर्स डे मनाया जाएगा। यह दिन उस अनमोल रिश्ते को समर्पित है, जिसके बिना जीवन की कल्पना अधूरी है—मां। मां केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन की पहली गुरु, संस्कारों की आधारशिला और संघर्षों में सबसे मजबूत सहारा होती है। दैनिक नवज्योति की ओर से इस दिन को स्पेशल बनाने के लिए मदर्स डे स्पेशल टॉक शो का आयोजन किया गया। । नई पीढ़ी की माताएं और बदलती पालन पौषण शैली, आधुनिक मां बच्चों की परवरिश पहले से अलग तरीके से कैसे कर रही है विषयक इस टॉक शो में गृहिणी से लेकर डाक्टर, इंजीनियर,एन्ट्रप्रैन्योर, बुक राइटर, शिक्षक,वकील, बिजनसवुमन, एस्ट्रोलोजर, अधिकारी, कर्मचारी अर्थात हर फील्ड से जुडी मदर्स को आमंत्रित किया गया। इस टॉक शो में महिलाओं ने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया जिसे वह स्वयं महसूस कर रही हैं। तकनीक के इस युग में घर गृहस्थी व नौकरी और व्यवसाय के साथ ही अपने बच्चों को शिक्षा व संस्कार देने का काम एक मां किस तरह से कर रही है। सबके साथ संतुलन बनाते हुए हाईटेक पेरेंटिंग के बारे में मदर्स ने बताया कि वे किस तरह से अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं। जिसमें वे बच्चों के साथ भी समय बिता पा रही हैं और अपना काम भी कर रही हैं। प्रस्तुत हैं टॉक शो के कुछ अंश ।
कंट्रोलिंग नहीं कनेक्टिव पेरेंटिंग हो
बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी वैसे तो माता पिता दोनों की होती है। लेकिन बच्चे का सबसे अधिक जुड़ाव मां से होता है। बच्चों पर निगाह रखना व उनसे सम्पर्क बनाए रखना जरूरी है। कंट्रोलिंग से अधिक उनसे कनेक्टिव पेरेंटिंग की जाए तो बच्चा सही ढंग से ग्रोथ कर पाता है। जितना अधिक समय दिया जाएगा बच्चों को उतना ही अधिक समझा जा सकेगा और बच्चे भी अपनी मां को उतने ही बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। पिता से अधिक समय मां बच्चों के साथ रहती है। इस कारण से मां की जिम्मेदारी बच्चों के प्रति बढ़ जाती है। पिता भी किसी न किसी रूप में बच्चों के साथ अपना उतना ही जुड़ाव रखेंगे तो बच्चा पारिवारिक रूप से भी स्ट्रांग होगा।
-कीर्ति भाटी,गृिहणी (इंजी)
मां को देखकर ही सीखते हैं बच्चे
बच्चों का वैसे तो अधिकतर समय अपनी मां के साथ ही बीतता है। इस काण वे उन्हें देखकर ही सीखते हैं। मां जिस तरह का व्यवहार घर परिवार व बच्चों के साथ करती है। बच्चे भी वैसा ही व्यवहार करते हैं। कामकाजी महिलाएं घर के साथ काम में व्यस्त रहती हैं तो बच्चे उनके काम को भी समझने लगते हैं। बच्चे पहले से अधिक एडवांस हैं। ऐसे में छोटे बच्चों को अंडर एस्टीमेट नहीं किया जा सकता। उन्हें भावनात्मक सहयोग बनाए रखना जरूरी है।
-ऋचा गौतम, सहायक अभियंता व स्वास्थ्य अधिकारी, नगर निगम कोटा
काम के साथ बच्चे भी महत्वपूर्ण
घर पर रहकर तो महिलाएं बच्चों की देखभाल करती ही हैं। लेकिन कामकाजी महिलाओं को अपना काम करने के साथ ही बच्चों की भी देखभाल करनी होती है। एक मां के लिए काम के साथ उनके बच्चे भी महत्वपूर्ण हैं। बच्चों को यदि मां समय नहीं देगी तो वे उनसे दूर हो सकते हैं। ऐसे में मां के लिए बच्चों से जुड़ाव विशेष रूप से इमोशनल जुड़ाव अधिक होगा तो बच्चे का विकास सही ढंग से हो सकेगा।
-मीनाक्षी गुप्ता,ब्यूटीशियन
बच्चों को शुरूआत से ही समझना होगा
बच्चों को शुरूआत से ही समझना और समझाना होगा। कॉलेज व विवि में आने के बाद उन्हें समझाना उतना आसान नहीं है। मां का बच्चे से जुड़ाव होगा तो वह उनकी हर बात मां से शेयर कर सकेंगे। वरना हालत यह है कि बच्चे मांता पिता से अधिक शिक्षकों से अपनी बात शेयर करते हैं। बच्चा मां के बाद अपनी टीचर से अधिक सीखता है। ऐसे में आवश्यकता है कि बच्चों को माता पिता अधिक समय दें। उनकी बात को सुने और समझे। उनसे भावनात्मक जुड़ाव रखें। मां जिस तरह का व्यवहार बच्चों से करती हैं बच्चा वही सीखता है।
-प्रो. अनुकृति शर्मा,कोटा यूनिवर्सिटी
बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करें
बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करें, में घर पर तो बच्चों को संभालती हूं। साथ ही मे शहर स्थित नारी निकेतन की अधीक्षक होने के नाते वहां पर आने वाले बच्चों को भी संभालती हूं। साथ ही घर के काम भी करती हूं। कई बार घर पर आने के बाद बच्चे बोलते है कि मम्मी आप तो हमारे तरफ ध्यान नहीं देती हूं। वहां पर आॅफिस के बच्चों से ज्यादा प्यार करती हूं। कई बार मेरा बड़ा बेटा किताबे पढ़ता है तो मेरा मानना है कि छोटा भी उसको देखकर पढ़ाने लगाता हैं। वहीं बच्चों के साथ इमोशनल टच होना चाहिए। बच्चों के साथ क्वालिटी समय बिताये और उनको समझे।
-अंशुल मेहंदी रत्ता, अधीक्षक नारी निकेतन कोटा
मां ही बच्चे की पहली गुरु
एक बच्चे के लिए उसकी मां ही पहली गुरु होती है। बच्चा सबसे पहले मां के सम्पर्क में आता है। बच्चे को भावनात्मक रूप से बचपन से ही समझना होगा। माता पिता जितना अधिक समय बच्चों के साथ बिताएंगे बच्चों का उनसे उतना ही अधिक गहरा जुड़ाव होगा। बच्चों को अंडर एस्टीमेट नहीं करना चाहिए कि वे कुछ नहीं समझते हैं।ौ आज के बच्चे सब कुछ समझते हैं। बस जरूरत बच्चों को समझने की है। उनसे किसी ने किसी रूप में जुड़ाव बना रहना चाहिए।
-डॉ. स्मृति भटनागर,साफ्ट स्किल ट्रेनर
बच्चों की मित्रवत बनकर रहे मां
मां वो शक्स है जिसमें बच्चे का पूरा संसार बसता है। ऐसे में आवश्यक है कि माता पिता विशेष रूप से मां को अपने बच्चों की मित्रवत बनकर रहना होगा। साथ ही एक सीमित दायरा भी रखना होगा। बच्चों की बात को सुनना और समझना तो है ही उनसे जुड़ाव भी रखना है। पहले की तुलना में वर्तमान में एकल परिवारों में मां अपने बच्चों को अधिक समय दे पाती है। बच्चों का अपने माता पिता से जितना अधिक सम्पर्क रहेगा बच्चे उतना ही तनाव मुक्त रहेंगे। इसका कारण वे अपनी हर बात उनसे शेयर कर सकेंगे।
-डॉ. सारिका अंकित सारस्वत, सेबी स्मार्ट ट्रेनर एन्ड ट्रेडर
मां ने ही सिखाया मां का महत्व
जीवन में आज जो कुछ भी पाया है वह सब मां की वजह से है। मां ने ही जिस तरह के संस्कार व शिक्षा दी उसी का परिणाम है कि शादी के बाद जब मां बनी तो उसका महत्व समझ आया। बच्चे भगवान को तो साक्षात रूप में नहीं देख पाते लेकिन उनके लिए मां ही भगवान के रूप में सामने रहती है। बच्चे के स्वस्थ विकास के लिए मां का उसके पास होना बहुत जरूरी है।
-बरखा जोशी, अंतरराष्ट्रीय कथक नत्यांगना
बच्चों को हैल्दी वातावरण की जरूरत
हर बच्चा एक जैसा नहीं हो सकता। बच्चों की एक दूसरे से तुलना भी नहीं करनी चाहिए। बच्चों की भावनाओं को समझते हुए वे जो करना चाहते हैं उन्हें करने देना चाहिए। बच्चों को हतोत्साहित नहीं प्रोत्साहित करना होगा। बच्चों को हैल्दी वातावरण देने की जरूरत है। बच्चा घर में बात करेगा तो उसे अपनी बात कहने के लिए बाहर नहीं जाना होगा। बच्चा अपने माता पिता को देखकर सीखता है। विशेष रूप से मां का अपने बच्चे व परिवार में व्यवहार अच्छा होगा।
- डॉ. सोमा शर्मा ,एमडी रेडियोलॉजिस्ट
बच्चे को मां से बेहतर कोई नहीं समझता
बच्चे को मां से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। बच्चा मां की इच्छा से ही संसार में आता है। इसलिए बच्चा मां की जिम्मेदारी अधिक होता है। मां जैसी केयर करती है बच्चा वैसा ही बनता है। मां का उससे अटेचमेंट होना काफी महत्व रखता है। बच्चे को वही सब सिखाना है जो उसके भविष्य में काम आएगा। बच्चे को कभी भथी निराश नहीं होने देना है। पिता से ज्यादा समय मां बच्चे के साथ रहती है। ऐसे में मां ही बच्चे को बेहतर पेरेंटिंग दे सकती है।
- संजना खंडेलवाल ,आईटी प्रेफेशनल व आॅथर
पढ़ाई के साथ-साथ सोशल एक्टिविटि में भी शामिल करें
मैं पिछले कई सालों से कम्प्यूटर इंस्टीट्यूट का संचालन करती हूं। आप जो कर रहे हैं वैसा ही बच्चा करेगा। यदि आप रील देख रहे हैं तो वह रील देखना शुरू कर देगा। आज यह कहना कि एआई के वक्त में बच्चे का स्क्रीन टाइम कैसे कम करें तो मैं कहूंगी कि आप उसके सामने अच्छे गजटस देखिए उसका फायदा बच्चे को भी मिलेगा। हम बच्चें को पढ़ाई के साथ-साथ सोशल एक्टिविटि में भी शामिल करें। बच्चों को ज्यादा से ज्यादा फैमिली से अटैच करें।
- विभा शर्मा ,डायरेक्टर सीएसटी इंस्टीट्यूट कोटा
हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग नहीं,मन से जुड़ें
में पेशे से सीए हूं। सौभाग्यशाली मानती हूं कि बेटे की वजह से में दुबारा मदर बनी यानी की दादी बनी हूं। आजकल की तकनीक को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। वहीं माता पिता को भी स्मार्ट बना चाहिए। शुरूआत से ही बच्चे को सोशल लाइफ में शामिल करे। मेरा मानना है कि अपनी जॉब मत छोड़ो अपना कंट्रोल बच्चे पर रखों। चाहे मेरा कितना ही बड़ा क्लाइंट कॉल करे यदि उस समय पर बच्चों का कॉल आ जाता है तो मैं तो बच्चों को कॉल पहले अटैेंट करती हूं।
- निमीषा मेघवानी ,चार्टड एकाउन्टेन्ट
जॉब को छोड़ा, बच्चों की परवरिश पर ध्यान
मेरे दो बेटियां है जिनकी परवरिश में कर रही हूं। हमारे दिन की शुरूआत सुबह पूजा से होती हैं। मेरा मानना है कि भगवान की स्तुति करने से हर समस्या का समाधान मिल जाता हैं। मैंने एमबीए किया उसके बाद प्राइवेट नौकरी की। उसके बाद शादी हो गई जिसके चलते जॉब को छोड़ा और बच्चों की परवरिश पर ध्यान दिया। उसके बाद फिर दुबारा मैंने सरकारी नौकरी की तैयारी जिसके बाद मेरा सलेक्शन हुआ आज भी मैं अपनी बेटियों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताती हूं।
- प्रगति शर्मा ,असिस्टेंट एकाउंट आॅफिसर
नकारात्मक गपशप से बचें
मेडिकल फील्ड़ से हूं। गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल बदलावों के कारण चिंता और डर होना सामान्य है। गर्भधारण के दौरान जब बेबी आये तो मेंटल फिजिकल को विस्तार से समझाये, गर्भधारण के दौरान मन में डर, चिंता और चिड़चिड़ापन आना सामान्य है, लेकिन इसे स्थायी न होने दें। जैसे हम शरीर के लिए 'डाइट' चुनते हैं, वैसे ही दिमाग के लिए भी 'डाइट' चुनें। डरावनी फिल्में, हिंसक खबरें या नकारात्मक गपशप से बचें। इसकी जगह ऐसी चीजें पढ़ें या देखें जो प्रेरणादायक और शांत हों।
- डॉ. लेखा सोनी
जॉब के साथ बच्चों को समय देना जरूरी
मैंने बेटों की परवरिश करने के लिए जॉब छोड़ी, मैं तो यहीं कहना चाहूंगी कि हर पेरेंटस अपने बच्चों को सपोर्ट करते हैं और जॉब के साथ-साथ बच्चों को भी टाइम देना चाहिए। उनसे घर में बातचीत करनी चाहिए उनकी जरूरत को समझाना चाहिए। पेरेंटस को बच्चों से खुलकर बातचीत करनी चाहिए। बच्चों के साथ फे्रंडली व्यवहार करना चाहिए। बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से जुडे रहने की जरूरत है।
-श्वेता , ज्योतिषाचार्य
मां का बच्चे से कनेक्ट होना आवश्यक
एक मां को अपने बच्चे को समझने के लिए उससे कनेक्ट होना आवश्यक है। बच्चों की भावना को समझना और उनकी बात को सुनने से बच्चे का अपनी मां से जुड़ाव स्वत: ही हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि बच्चों को घर परिवार में हैल्दी माहौल दिया जाए। बच्चों को माता पिता समय नहीं दे पाते हैं इस कारण से वे अपनी बात नहीं कह पाते और तनाव में रहने लगते हैं। मां बच्चों को अच्छी तरह से समझ सकती है। इसलिए वह उसकी पहली गुरु होती है।
-डॉ. गगनदीप कौर ,कॉ फाउंडर यूएस अकेडमी
केमिकल फ्री डाइट और अन्य चीजें जरूरी
बच्चों के इमोशनल सपोर्ट के साथ केमिकल फ्री डाइट और अन्य चीजें जरूरी हैं। मैं खुद ही बेटी के लिए केमिकल फ्री खाना बनाती हूं। क्योकि आज के समय में बाजार में विभिन्न प्रकार की केमिकल युक्त क्रीम सहित अन्य चीजें आ रही हैं। जिसके चलते वहां शरीर के लिए नुकसानदायक हैं। इसी के चलते मैंने खुद का ही कई ब्रांड बना लिए। हम सभी परिवार के लोग समय निकालकर एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं। बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं।
-डॉ. मयंका शर्मा, एन्ट्रप्रेन्योर बच्चों के प्रोडक्ट बनाती हैं
वर्किंग और प्रोफेशनल लाइफ में बैलेंस जरूरी
पेशे से वकील हूं। पर वर्किंग और प्रोफेशनल लाइफ को बैलेंस करके अपने बच्चे को पूरा समय देती हूं। में सुबह से स्कूल में बच्चे को ड्रॉप करने जाती हूं। उसके बाद उसको लेने जाती हूं। इसी के साथ बच्चा कहीं भी ट्यूशन नहीं जाता हैं। में खुद ही पढ़ाती हूं। इसके बाद बच्चे के साथ क्रिकेट खेलती हूं। किसी भी वक्त बच्चा हमसे कुछ भी प्रश्न करता है तो उसे हम प्यार से समझते हैं। बच्चा जानता है कि मम्मी और पापा हमेशा मेरे से प्यार से ही बात करते हैं चाहे कैसे भी स्थिति हो। चाहे मेरे में लाख कमियां पर में प्रतिदिन उनमें सुधार करती हूं, और परफ्ेक्ट मदर बनाने की कोशिश करती हूं।
-ऐश्वर्या सुवालका ,वकील
बच्चे जैसे देखते हैं वैसा ही सीखते हैं
बच्चे जैसे देखते है वैसा ही सीखते हैं। घर में बाई आती है रूटीन के काम करके चली जाती हैं। जिस दिन बाई नहीं आती है उस दिन पूरे काम में खुद ही करती हूं। जिसको बच्चे देखते हैं। इसी के जरिया में बच्चों को ये दिखाना चाहती हूं कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता हैं। वहीं में सीएस यानी की कंपनी सेके्रटरी से संबंधित वर्क करती हंू। मेरा मानना है कि बच्चों को हर प्रकार के काम सिखाएें।
-देविका लखोटिया ,सीएस

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