महिलाएं आजमा रहीं दांव, ताे कहीं पुरूष चला रहे शमशीर
50 वर्षों से अखाड़ों की लाल मिट्टी पर जीवन्त होती प्राचीन शस्त्र कला
कोटा। शाम ढलते ही शहर के अखाड़ों में एक अलग ही रौनक देखने को मिल रही है। ढलते सूरज की सुनहरी धूप के बीच लाल मिट्टी पर गूंजती तलवारों की खनक, लकड़ी और लोहे के टकराने की आवाजें तथा युवाओं की जोशीली हुंकार इस बात की गवाही देती है कि कोटा में पारंपरिक शस्त्र कला और संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं। पिछले 35 से अधिक वर्षों से अनवरत चल रही इस परंपरा के जरिए नई पीढ़ी को शारीरिक सुदृढ़ता, अनुशासन और अपनी प्राचीन विरासत से जोड़ने का अनूठा कार्य किया जा रहा है। अनंत चतुर्दशी जैसे पर्वों पर जब ये खिलाड़ी सड़कों पर अपने हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं, तो पूरा शहर गर्व महसूस करता है।
श्री जय बजरंग व्यायामशाला: 5 दशक पुरानी ऐतिहासिक विरासत
शहर के सबसे पुराने और लाइसेंसशुदा अखाड़ों में शुमार श्री जय बजरंग व्यायामशाला, चमलेश्वर महादेव मंदिर, गोरधनपुरा का अपना विशिष्ट ऐतिहासिक महत्व रहा है। 70 के दशक में नहर के किनारे एक चबूतरे पर हनुमान जी की प्रतिमा के सामने से शुरू हुआ यह सफर आज तक अनवरत चल रहा है। अखाड़े के संचालक शंकर सिंह जादौन बताते हैं कि शुरुआती दौर में कसरत के लिए जलपान की व्यवस्था आपसी सहयोग या मंदिर में आने वाले चढ़ावे से ही करनी होती थी।
कई अखाड़ों के लिए शुरूआती दंगल का मैदान
आज शहर के प्रमुख अखाडों की स्थापना का सफर भी यहा से ही शुरू हुआ था। एक समय था जब पट्टा बुर्ज, महंत गोपाल दास और कोटड़ी की वर्तमान कश्यप व्यायामशाला के सभी नामचीन खिलाड़ी व पट्टेबाज़ इसी व्यायामशाला से अपने हुनर का प्रदर्शन करते थे। गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन करते हुए यहाँ से तैयार हुए पट्टेबाजाें ने शहर के विभिन्न क्षेत्रों में नए अखाड़ों की नींव रखी। गुरु श्रीकृष्ण उस्ताद के सानिध्य में गुलाब तंवर, शंकर गांधी और शंकर सिंह जादौन जैसे खिलाड़ियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और कोटा में पहलवानी को नया आयाम दिया।
काली टेक के बालाजी अखाड़े में 35 वर्षों से जारी है साधना
शहर के काली टेक के बालाजी अखाड़े में पिछले 35 वर्षों से पारंपरिक शस्त्र कला और संस्कृति को सहेजने का कार्य निरंतर जारी है। वर्ष 1990 में गुरु बाबूलाल गुर्जर द्वारा स्थापित इस अखाड़े में अनुशासन और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलता है। वर्तमान में अखाड़े के सबसे पुराने उस्ताद महावीर गुर्जर के सानिध्य में यह परंपरा आगे बढ़ रही है, जिन्होंने इसकी स्थापना से लेकर अब तक अध्यक्ष पद की कमान संभाल रखी है। उनके मार्गदर्शन में कभी इस अखाड़े में करीब 500 लोग खेलने के लिए जुटते थे, और वर्तमान में भी 200 से अधिक शागिर्द यहाँ नियमित रूप से अखाड़ा खेल रहे हैं।
तलवार बाजी रोमांच ही नही साधना का खेल
शाम ढलते ही काली टेक के बालाजी मंदिर परिसर में पट्टेबाजों और खिलाड़ियों का तांता लग जाता है। प्रांगण के एक कोने में 5 से 6 वर्ष के नन्हे-मुन्ने बच्चे लकड़ी की छोटी-छोटी छड़ें थामे पट्टा बाजी की शुरुआती बारीकियां सीखते नजर आते हैं, जिनकी आंखों में बड़े पहलवान बनने का सपना चमक रहा है। थोड़ा आगे बढ़ने पर युवा खिलाड़ी आशीष गुर्जर तलवारबाजी की तीव्र प्रैक्टिस करते हैं। आशीष बताते हैं कि वे बचपन से अपने पिता के साथ अखाड़े में आते रहे हैं और तलवार का यह खेल जितना खतरनाक है, उससे कहीं अधिक रोमांचक और गौरवशाली है।
अखाड़े में मुख्य शस्त्र प्रशिक्षक अशोक गुर्जर के मार्गदर्शन में युवाओं और बालिकाओं को तलवारबाजी, पट्टा बाजी, बनेठी और सीने पर पत्थर फोड़ने जैसे हैरतअंगेज करतबों का नियमित अभ्यास कराया जा रहा है। पिछले 5 वर्षों से बालिकाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण भी शुरू किया गया है, जिसमें 30 से अधिक बालिकाएं पूरी तल्लीनता से यह प्राचीन कला सीख रही हैं।
राजस्थान का पहला महिला अखाड़ा
कोटा ने सनातन संस्कृति के संरक्षण में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। बालाकुंड केशवपुरा क्षेत्र में स्थित 'संतोष सुमन महिला अखाड़ा' राजस्थान का पहला पंजीकृत महिला अखाड़ा होने का गौरव रखता है। इसकी नींव साल 1998 में स्वर्गीय सीता देवी सुमन ने रखी थी। चार बच्चों की माँ होने के बावजूद उन्होंने जूडो-कुश्ती सीखकर समाज में एक मिसाल कायम की।
साल 2001 में इसे आधिकारिक लाइसेंस प्राप्त हुआ। वर्तमान में उनकी बहू संतोष सुमन इस अखाड़े की मुख्य महिला गुरु के रूप में कमान संभाले हुए हैं। अनंत चतुर्दशी की तैयारियों के तहत यहाँ प्रशिक्षण ले रही 180 से 250 महिला पहलवान लाठी, तलवारबाजी, आग की बनेठी, त्रिशूल और गदा संचालन जैसे साहसिक करतब सीख रही हैं। यहाँ की बालिकाओं ने राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पदक जीतकर कोटा का नाम पूरे देश में रोशन किया है।
राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर गाड़ चुकी हैं झंडे
यह अखाड़ा केवल पारंपरिक प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की बालिकाओं ने जूडो-कुश्ती और अन्य कलाओं में राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड और कांस्य पदक जीतकर कोटा का नाम पूरे देश में रोशन किया है। संध्या के समय आरती के पश्चात शुरू होने वाला यह अभ्यास और महिला सशक्तिकरण का यह अनूठा रूप शहरवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

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