सात साल की बालिकाओं से लेकर 60 साल के 'पट्टेबाज' बहा रहे पसीना,शोभायात्रा के लिए जोरदार तैयारियां
अनंत चतुर्दशी शोभायात्रा में दिखेगा सनातन शौर्य और कौशल का महासंग्राम
कोटा। अनंत चतुर्दशी के पावन पर्व पर शहर में निकलने वाली ऐतिहासिक और भव्य शोभायात्रा को लेकर कोटा के पारंपरिक अखाड़ों में इन दिनों जो नजारा देखने को मिल रहा है, वह किसी फिल्मी सीक्वेंस से कम नहीं है। सनातन संस्कृति की इस अनूठी परंपरा को जिंदा रखने के लिए शहर के प्राचीन अखाड़ों में युवा पट्टेबाज दिन-रात एक कर रहे हैं। इस बार शोभायात्रा में केवल मलखंभ का जादू ही नहीं, बल्कि लाठी, बर्नेठी, चकरी और ऐसे साहसिक करतब देखने को मिलेंगे कि देखने वालों की सांसें थम जाएंगी!
संवार रहे माटी की कला
पारंपरिक खेल ह्यमलखंभह्ण को राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाने वाली ह्यहरदौल व्यायामशालाह्ण इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। यहां नेशनल कोच व रेफरी गोपाल सिसोदिया के मार्गदर्शन में कड़ा अभ्यास चल रहा है। हैरानी की बात यह है कि कोच सिसोदिया ने ट.ढ.ए.ि की डिग्री और एक शानदार सरकारी नौकरी के अवसर को सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया ताकि वे अपना पूरा जीवन इस प्राचीन खेल को समर्पित कर सकें। आज यहाँ 7 साल की नन्हीं बालिकाओं से लेकर नेशनल मेडलिस्ट युवा तक रोज 4 से 6 घंटे पसीना बहा रहे हैं। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे पारंपरिक गढ़ों को पछाड़ते हुए कोटा के इन धुरंधर खिलाड़ियों ने नेशनल प्रतियोगिताओं में कांस्य पदक जीतकर शहर का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया है। इस बार शोभायात्रा में मात्र 90 सेकंड में 22 डिफिकल्टी एलिमेंट्स और पोल-रोप पर होने वाले हैरतअंगेज करतब मुख्य आकर्षण होंगे।
यहां पर 80 पहलवान
स्वामी विवेकानन्द व्यायाम शाला औद्योगिक क्षेत्र डीसीएम चौराहे के पास, दंडवीर हनुमान मंदिर के समीप स्थित स्वामी विवेकानन्द व्यायाम शाला कोटा की पुरानी संस्थाओं में से एक है। लगभग 1987 से संचालित इस व्यामशाला की स्थापना राधावल्लभ शर्मा ने की थी। इस व्यायामशाला में आज भी पारंपरिक अखाड़े की संस्कृति जीवित है। अनंत चतुर्दशी की तैयारियों के तहत यहाँ शाम से रात तक अखाड़े की सामग्रियों की रंगाई और पारंपरिक अभ्यासों का दौर शुरू हो चुका है। दो दर्जन बालिकाओं सहित करीब 80 सदस्य यहाँ लाठी, गदा और आग के गोलों के साथ अपने अदम्य साहस का प्रदर्शन करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
तड़के ही जुट जाते हैं अखाड़ेबाज
अखाड़े के संचालक राजेन्द्र कुमार लक्षकार ने बताया कि शाम 5 बजते ही अखाड़े बाज जुटने लग जाते है। 10 साल से लेकर 60 साल तक के पट्टेबाज शरीर की कसरत करने के बाद लकड़ियों व तरवारों से कलाबाजीयां करते हुए पहले 5 दिन तक पुराने पैंतरों व अपने अपने तरीके के खेलों के लिए तैयारियों पर लग जाते है। अभी केवल 6 दिन बाकि रह गए है ऐसे में कल से लगभग सभी साथी पट्टेबाज पुरी तरह से आने लग जाएंगे।
कोई लकड़ी तो कोई तलवार से बचा रहा वार
अखाड़े में एक उपर एक के रूप में मानव पिरामिड़ बनाकर एक साथ 3 खिलाड़ी चकरी चला रहे है। कोई अकेले ही चकरी को हवा में उछाल रहा है तो दूसरा आकर उसे फिर से पकड़ कर घुमा रहा है। आपस में लाठी से भिड़ते पट्टे बाज जैसे एक बार तो लगता है कि मानो किसी एक का तो सिर फूट ही जाएगा पर तभी दूसरा भी अपने सिर पर आए वार को पावों की चाल से हटकर अपना वार चल देता है।
तलवार से नींबू काटना मांगता है 'एकाग्रता'
कोटरी स्थित कश्यप बजरंग व्यायाम शाला भी इस परंपरा का एक प्रमुख स्तंभ है। डॉ. रामकुमार द्वारा 1950 में गणेश विसर्जन की परंपरा के साथ शुरू किए गए इस कार्य को 1991 से अखाड़े के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। उस्ताद ओमप्रकाश कश्यप के सान्निध्य में 200 से अधिक खिलाड़ी यहाँ ट्रेनिंग ले रहे हैं। यह अखाड़ा सीने पर भारी पत्थर फोड़ने और खतरनाक करतबों के लिए जाना जाता है। यहाँ तलवार हत्था 'गतका' और तलवार से नींबू काटने की प्रैक्टिस कर रहे विशिष्ट कश्यप ने बताया कि इस खेल में तलवार और मन को एक साथ चलना पड़ता है, हमारी साधना अपने करतब से ज्यादा सामने वाले की जिंदगी के लिए जरूरी होती है। जब तक सौ प्रतिशत एकाग्रता और विश्वास न हो, यह खेल खेलने की अनुमति नहीं दी जाती।

Comment List