अंतरिम भरण-पोषण के बकाए पर 12 महीने की सीमा अवधि आदेश पारित होने की तिथि से होगी लागू

अदालत किसी मामले में पूर्व प्रभाव से अंतरिम भरण-पोषण का आदेश

अंतरिम भरण-पोषण के बकाए पर 12 महीने की सीमा अवधि आदेश पारित होने की तिथि से होगी लागू
राजस्थान हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(3) के तहत भरण-पोषण के बकाये की वसूली को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 12 महीने की सीमा अवधि पुराने महीनों से नहीं, बल्कि उस तिथि से गिनी जाएगी जब वास्तव में भरण-पोषण का आदेश पारित हुआ और राशि देय हुई।

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(3) के तहत भरण-पोषण के बकाये की वसूली को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है, कि जब अदालत किसी मामले में पूर्व प्रभाव से अंतरिम भरण-पोषण का आदेश देती है, तो 12 महीने की सीमा अवधि पुराने महीनों से नहीं, बल्कि उस तिथि से गिनी जाएगी जब वास्तव में भरण-पोषण का आदेश पारित हुआ और राशि देय हुई। जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने यह महत्वपूर्ण आदेश हेतराम की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया है। प्रतिवादी पत्नी और उसकी नाबालिग पुत्री ने एसीजेएम न्यायालय, घड़साना (श्रीगंगानगर) में धारा 125(3) सीआरपीसी के तहत आवेदन कर 2,20,000 रुपये के अंतरिम भरण-पोषण के बकाये की वसूली की मांग की थी।

निचली अदालत ने 04 जून 2022 को आदेश दिया था कि पत्नी को 05 अगस्त 2020 (आवेदन की तिथि) से 5,000 रुपये प्रति माह की दर से अंतरिम भरण-पोषण दिया जाए। इस प्रकार, बकाये की गणना लगभग 22 महीनों (अगस्त 2020 से जून 2022 तक) के लिए की गई थी।  पति (याचिकाकर्ता) ने इस रिकवरी का विरोध करते हुए तर्क दिया, कि कानून के अनुसार 12 महीने से अधिक पुराने बकाये की वसूली नहीं की जा सकती। निचली अदालत की ओर से वसूली के लिए कृषि भूमि कुर्क करने का वारंट जारी करने के बाद पति हाईकोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा, जब तक अदालत का आदेश नहीं आ जाता, तब तक पत्नी के पास भरण-पोषण की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता। 

अधिकार का सृजन : कोर्ट ने माना कि 04 जून 2022 के आदेश से पहले वह राशि कानूनी रूप से देय या वसूली योग्य नहीं थी। आदेश आने के बाद ही पूर्व तिथि से बकाया राशि वसूलने का अधिकार पुख्ता हुआ। सीमा अवधि की गणना चूंकि पत्नी ने आदेश पारित होने के तुरंत बाद 27 जून 2022 को ही रिकवरी के लिए आवेदन कर दिया था, इसलिए यह आवेदन एक महीने के भीतर यानी पूरी तरह सीमा अवधि के दायरे में था। हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया, कि यदि आदेश पारित होने के बाद तय समय सीमा के भीतर रिकवरी की अर्जी दी जाती है, तो केवल इस आधार पर आपत्ति नहीं की जा सकती कि बकाया लंबी अवधि (जैसे 22 महीने) का है। इस निर्णय से पारिवारिक मामलों में भरण-पोषण पाने वाली महिलाओं को बड़ी राहत मिली है।

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