चीन 2030 तक 1000 जे-20 लड़ाकू विमानों का करेगा संचालन : अमेरिका का दबदबा होगा कम, भारत को भी बढ़ानी होगी लड़ाकू विमानों की संख्या

एशिया और वैश्विक सामरिक संतुलन होगा प्रभावित 

चीन 2030 तक 1000 जे-20 लड़ाकू विमानों का करेगा संचालन : अमेरिका का दबदबा होगा कम, भारत को भी बढ़ानी होगी लड़ाकू विमानों की संख्या

चीन 2030 तक करीब 1,000 जे-20 पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट तैनात कर सकता है। इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की वायु बढ़त और भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ेंगी। चीन तेजी से वायुसेना का आधुनिकीकरण कर रहा है, जबकि भारत और अमेरिका अपनी क्षमताएं मजबूत करने में जुटे हैं।

नई दिल्ली। लंदन स्थित थिंक टैंक रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, चीन वर्ष 2030 तक लगभग 1,000 ख-20 पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों का संचालन कर सकता है। यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के हवाई वर्चस्व को चुनौती देने के साथ-साथ भारत के लिए भी एक बड़ी रणनीतिक चिंता बन सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने पिछले पांच वर्षों में अपनी वायु शक्ति को अभूतपूर्व गति से आधुनिक बनाया है।

चीन की बढ़ती हवाई ताकत :

2020 में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयरफोर्स के पास लगभग 50 जे-20 विमान थे। लेकिन 2025 तक यह संख्या बढ़कर करीब 300 हो गई है। आरयूएसआई के अनुमान के अनुसार, चीन वर्तमान में हर साल लगभग 120 जे-20ए और जे-20 एस स्टील्थ फाइटर जेट का उत्पादन कर रहा है। इस दर से उत्पादन जारी रहा, तो 2030 तक चीन के पास करीब 1,000 जे-20 और 900 जे-16 (4.5 पीढ़ी के लड़ाकू विमान) सेवा में हो सकते हैं। इसके अलावा चीन जे-35 नामक एक और स्टील्थ फाइटर जेट विकसित कर रहा है, जिसे वायुसेना और नौसेना दोनों के लिए डिजाइन किया गया है। यह कदम चीन की सैन्य रणनीति में बहु-क्षेत्रीय वर्चस्व स्थापित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

अमेरिका की स्थिति :

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अमेरिका अभी भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के मामले में सबसे शक्तिशाली देश बना हुआ है। अमेरिकी वायुसेना, नौसेना और मरीन कॉर्प्स के पास कुल मिलाकर लगभग 600 एफ-35 फाइटर जेट हैं, जिनमें से लगभग 400 अमेरिकी वायुसेना के पास हैं। इसके अलावा अमेरिका के पास 187 एफ-22 रैप्टर विमान भी हैं, जिन्हें दुनिया के सबसे उन्नत स्टील्थ फाइटर जेट में गिना जाता है। अमेरिका की योजना 2040 के दशक तक 1,700 से अधिक पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान तैनात करने की है। तकनीकी बढ़त, वैश्विक सैन्य ठिकानों और अनुभवी पायलटों के कारण अमेरिका अभी भी वायु युद्ध में महत्वपूर्ण बढ़त बनाए हुए है।

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भारत की हवाई शक्ति और चुनौतियां :

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भारत और चीन के बीच लंबे समय से सीमा विवाद चला आ रहा है, और 1962 के युद्ध के बाद से दोनों देशों के संबंध सामरिक रूप से संवेदनशील बने हुए हैं। ऐसे में चीन की बढ़ती हवाई ताकत भारत के लिए एक गंभीर रणनीतिक संकेत है। भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में लगभग 29 से 31 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42 स्क्वाड्रन की है। अनुमान के मुताबिक, भारत के पास करीब 500 से 660 सक्रिय लड़ाकू विमान हैं, जिनमें एसयू-30 एमकेआई, राफेल, मिराज-2000 और तेजस जैसे विमान शामिल हैं। हालांकि, चीन की तुलना में भारत की संख्या और उत्पादन क्षमता सीमित है। भारत भविष्य में स्वदेशी तेजस एमके-2, एएमसीए (पांचवीं पीढ़ी का स्वदेशी फाइटर जेट) और अतिरिक्त राफेल विमानों के जरिए अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने की योजना बना रहा है, लेकिन इन परियोजनाओं को पूरी तरह प्रभावी होने में अभी समय लगेगा।

एशिया और वैश्विक सामरिक संतुलन होगा प्रभावित :

2030 तक चीन की वायु शक्ति में संभावित वृद्धि एशिया और वैश्विक सामरिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। अमेरिका अभी भी तकनीक और अनुभव में आगे है, लेकिन चीन तेजी से अंतर कम कर रहा है। वहीं, भारत के लिए यह समय अपनी वायुसेना के आधुनिकीकरण, उत्पादन क्षमता और रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत करने का है, ताकि क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन बनाए रखा जा सके।

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