आबादी का विस्फोट देश के लिए चुनौती

पिछले 770 साल में विश्व की जनसंख्या 37 करोड़ से बढ़कर आठ अरब के आसपास जा पहुंची

आबादी का विस्फोट देश के लिए चुनौती

2011 की जनगणना के मुताबिक 2001-2011 तक भारत की आबादी में करीब 17.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। अगर अलग-अलग धर्मों की बात की जाए तो इस दौरान हिंदू आबादी में 16.8 फीसदी, मुस्लिम 24.6 फीसदी, ईसाई 15.5 फीसदी, सिख 8.4 फीसदी, बौद्ध 6.1 फीसदी और जैन आबादी में 5.4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

दुनिया की आबादी को एक अरब तक पहुंचने में बीस लाख वर्ष का समय लगा, परंतु इसे सात अरब तक पहुंचने में केवल 200 साल लगे। पिछले 770 साल में विश्व की जनसंख्या 37 करोड़ से बढ़कर आठ अरब के आसपास जा पहुंची है। भारत की जनसंख्या करीब 140.80 करोड़ है और यह प्रत्येक मिनट बढ़ रही है, क्योंकि औसतन 30 बच्चे हरेक मिनट पर जन्म लेते हैं। चीन में यह औसत 10 रह गई है। संयुक्त राष्टÑ द्वारा जारी एक रपट के मुताबिक, भारत की आबादी 141 करोड़ से अधिक है और 2023 में वह चीन को पार कर जाएगा। आबादी 142.9 करोड़ से अधिक होगी। दुनिया की कुल जमीन का मात्र 2 फीसदी ही भारत के हिस्से में है। पानी सिर्फ 4 फीसदी उपलब्ध है, लेकिन आबादी 18 फीसदी से ज्यादा है।

2011 की जनगणना के मुताबिक 2001-2011 तक भारत की आबादी में करीब 17.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। अगर अलग-अलग धर्मों की बात की जाए तो इस दौरान हिंदू आबादी में 16.8 फीसदी, मुस्लिम 24.6 फीसदी, ईसाई 15.5 फीसदी, सिख 8.4 फीसदी, बौद्ध 6.1 फीसदी और जैन आबादी में 5.4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। उधर, साल 2015 में सामने आए अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी भारत में होगी, जो 30 करोड़ तक पहुंच जाएगी। इसके बावजूद भारत में हिंदू धर्म को मानने वाले ही बहुसंख्यक रहेंगे।

आमतौर पर जनसंख्या वृद्धि की दर को लेकर एक धारणा है कि मुस्लिम समुदाय की प्रजनन दर अधिक होती है। लेकिन स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से किए गए राष्टÑीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े इसके उलट तस्वीर पेश कर रहे हैं। एनएफएचए के ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारत में सभी समुदायों में प्रजनन दर गिर गई है। पिछले दो दशकों की बात करें तो सभी धार्मिक समुदायों में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई है। राष्टÑीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रजनन दर गिरकर 2 फीसदी पर आ गई है। वहीं इस रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में मुस्लिम समुदाय के प्रजनन दर में सबसे तेज गिरावट हुई है। इस सर्वे की मानें तो 1992-93 में मुस्लिम समुदाय में प्रजनन दर जहां 4.4 फीसदी थी। वहीं 2015-16 में घटकर 2.6 फीसदी रह गई। इसके अलावा 2019-21 के सर्वे में ये दर 2.3 फीसदी ही रह गई है।

एक दौर ऐसा आ सकता है, जब एक-एक इंच जमीन, एक बाल्टी पानी, स्वच्छ घी, दूध, फल-सब्जी आदि के लिए भारत में मार-काट के हालात बन सकते हैं! भारत में जनसंख्या असंतुलन के मद्देनजर अव्यवस्था और अराजकता के लिए विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री समेत लगभग सभी बड़े राजनेता आज भी 125-130 करोड़ की आबादी पर ही अटके हैं। कुछ अपडेट मुख्यमंत्री और नेता 135 करोड़ आबादी का उल्लेख करते रहे हैं। किसी को यथार्थ की विस्फोटक स्थितियों की जानकारी ही नहीं है। ऐसे में देश के सबसे बड़े और अधिकतम आबादी वाले राज्य उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चिंता जताते हैं कि एक वर्ग विशेष की आबादी तेज गति से बढ़नी नहीं चाहिए और मूल निवासियों की जनसंख्या लगातार घटनी नहीं चाहिए, तो उन पर हिंदू-मुसलमान के आरोपों की बौछार शुरू हो जाती है।

देश के लिए सबसे कीमती क्या हो सकता है, जिसकी रक्षा करना सरकार का सर्वोपरि कर्तव्य है? निश्चित रूप से भावी पीढ़ियों का भविष्य। लेकिन भावी पीढ़ियों का भविष्य तो वर्तमान जनसंख्या विस्फोट और असमान नागरिक संहिता ने धूमिल करके रख दिया है। जिस देश की सरकारों के एजेंडे पर जनसंख्या नियंत्रण दूर-दूर तक न हो, जिस देश की सरकारें मजहब को देश के भविष्य से अधिक महत्व देती हो, जहां समान नागरिक संहिता न हो, जिस देश का संविधान मजहब के अनुसार नागरिक अधिकार निर्धारित करता हो, जहां की राजनीतिक पार्टियां धर्म-पंथ को राष्ट्रीयता से ऊपर रखती हो, जिस देश में लोकतंत्र का अर्थ कुछ भी करने की स्वतंत्रता हो, उस देश का भविष्य कैसा होगा, सोचा जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र और वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के मुताबिक, दुनिया की आबादी फिलहाल 795.95 करोड़ से ज्यादा है, जो इसी साल के अंत या 2023 के शुरू में 800 करोड़ के पार जा सकती है। दुनिया में प्रति मिनट औसतन 270 बच्चों का जन्म हो रहा है। विश्व स्तर पर यह बढ़ोतरी मानवता के पक्ष में नहीं है। दरअसल भारत के संदर्भ में बढ़ती आबादी ‘वर्ग विशेष’ के लिए भी खतरनाक है, क्योंकि वह अपेक्षाकृत अशिक्षित, गरीब, कुप्रथाओं में जकड़ा है। वह बच्चों को अपनी ‘ताकत’ मानता रहा है, लेकिन पालन-पोषण को लेकर मोहताज है। यदि एक वर्ग की आबादी बढ़ती रहे और दूसरी तरफ  ईसाई, पारसी, जैन आदि अल्पसंख्यक समुदायों की आबादी की बढ़ोतरी नकारात्मक रहे, तो आबादी का ऐसा असंतुलन देशहित में नहीं है। 
-डॉ. सुरभि सहाय
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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