पढ़ाई लिखाई से ही नहीं, खेलकूद से भी बनते हैं नवाब

विशेषज्ञों ने कहा बच्चों के बौद्धिक विकास के साथ खेलकूद भी जरुरी

पढ़ाई लिखाई से ही नहीं, खेलकूद से भी बनते हैं नवाब

एक विद्यार्थी अपने बाल्यकाल से ही बहुमुर्खी होता है। उसके मन मे उठने वाली जिज्ञासा और उत्कंठा सदैव ही उसे विभिन्न राहों के प्रति आकर्षित करतीं है।

कोटा। एक जमाना हुआ करता था जब सरकारी स्कूलों में बच्चों के खेलने-कूदने के लिए स्पोर्टस आॅवर हुआ करता था। आधे घंटे का ये वो समय होता था जो बच्चों के खेलने-कूदने के लिए होता था और बच्चा पढ़ाई से ध्यान हटाकर अपने शरीर और मानसिक विकास पर ध्यान देता था लेकिन ये सब गुजरे जमाने की बात हो चुकी है और आज हर बच्चा सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाह रहा है। यहीं वजह है कि आज किसी भी बड़े या नामचीन शहर में इंजीनियर और डाक्टर तो खूब मिल जाएंगे लेकिन उसी शहर में खिलाड़ियों की संख्या ना के बराबर होगी। हम कोटा शहर की ही बात करें तो यहां के खेल प्रेमियों और खेल विशेषज्ञों का कहना है कि कोटा की जनसंख्या का एक प्रतिशत हिस्सा भी आज खेल के मैदान तक नहीं पहुंच पाता है।  

बच्चों पर पढ़ाई का बोझ हावी
वरिष्ठ शिक्षक जॉय मुखर्जी बताते हैं विगत कुछ सालों से बच्चों पर पढ़ाई का बोझ इस कदर हावी होने लगा है, माता-पिता और उसके गुरुजन उससे इतनी अपेक्षाएं रखने लगे हैं कि बच्चें को सिवाय पढ़ाई के कुछ और नजर आता ही नहीं है और यहीं कारण है कि गुजरे कुछ सालों में बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास थम सा गया है। आज बच्चा शारीरिक व्यायाम और खेलों को तो भूल सा गया है। लेकिन किसी को भी इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि एक बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए पढ़ाई के साथ-साथ खेल भी जरुरी है। अन्यथा वो पढ़ाई के दबाव में किसी मानसिक बीमारी का शिकार भी हो सकता है। यह कहना है खेल विशेषज्ञों और कुछ वरिष्ठ शिक्षकों का। 

बच्चों को मानसिक रूप से बलशाली बनाता है खेल
मुखर्जी का कहना है कि एक विद्यार्थी अपने बाल्यकाल से ही बहुमुर्खी होता है। उसके मन मे उठने वाली जिज्ञासा और उत्कंठा सदैव ही उसे विभिन्न राहों के प्रति आकर्षित करतीं है। जो कि उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास में बेहद महत्वपूर्ण होतीं है। रामायण व महाभारत काल मे भी अगर हम देखें तो पाएंगे कि गुरुकुल केवल अध्ययन-अध्यापन तक सीमित नहीं थे वरन विभिन्न प्रकार के क्रीड़ा व शारीरिक कुशलता का केंद्र भी होते थे। इन सभी गुरुकुलों में अध्ययनरत विद्यार्थियों को ना केवल मानसिक रूप से शक्तिशाली अपितु शारीरिक रूप से भी बलशाली बना उनका सर्वांगीण विकास करवाया जाता था। इसी प्रकार वर्तमान में, केवल मानसिक विकास को ही सफलता का पैमाना मान खेलकूद को बिल्कुल ही हेय व गौड़ मान लिया गया है। अभिभावक अपने बच्चे को नम्बरों की होड़ से अलग ही नहीं कर पा रहें हैं। उनके लिए बालक के 99 प्रतिशत अंक अधिक मायने रखते है बजाय उस बालक के मानसिक स्वास्थ्य के। 

खेलकूद और सामाजिक संयोजनों से होती आत्मबल में वृद्धि
इसी प्रकार जिला एथलेटिक्स संघ के विशाल शर्मा का कहना है कि आजकल के बालक स्कूल, घर, ट्यूशन, उसके बाद माता-पिता के इच्छा अनुसार आईआईटी और नीट की तैयारी में ना सिर्फ अपना बहुमूल्य बचपन गंवा रहा है अपितु विभिन्न प्रकार की मानसिक तनाव, ग्रन्थियों व विकारों से ग्रस्त हो आत्महत्या जैसी दुर्घटना का शिकार हो रहा है। कोटा में ये अब न्यू नार्मल हो चला है। अब हमें किसी बच्चे की तनाव से मृत्यु अंदर तक नहीं हिलाती। बस हम सभी यही सोचतें है कि प्रेशर नहीं झेल पाया। पर कभी ये सोचने की जहमत भी नहीं उठाते कि इन बच्चों की ये दशा इनकी शारीरिक बल व आत्मबल की कमी से हुई है जो कि खेलकूद व अन्य सामाजिक संयोजनों से विकसित होती है।

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स्पोर्ट्स के प्रति अभिभावकों की उदासीनता बच्चों पर भारी
शर्मा का कहना है कि खेल-कूद बालकों के शारीरिक बल साथ ही मानसिक बल में वृद्धि करती है। यदि एक बच्चा 2 घण्टे टीवी और मोबाइल से निकल, किसी मैदान में खेलकूद में व्यतीत करें तो वो बालक अपने एकेडमिक में भी शिखर पर रहता है। ये केवल सोच सोच की बात है कि हम अपने बच्चे को सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली तो अवश्य बनाना चाहते है पर बिना खेलकूद में प्रोत्साहित किये। खेलकूद के प्रति अभिभावकों की उदासीनता सदैव बच्चों पर ही भारी पड़ती है। सभी बच्चों में होता है नैसर्गिक गुण: इनका कहना है कि ये सत्य है कि हर कोई आइंस्टीन नही हो सकता पर ये भी सच है सचिन भी दूसरा नहीं हो सकता। दोनों ही विपरीत ध्रुव हैं पर जो बात दोनों में समान है, वो- दोनों ही अपने अपने क्षेत्र के ध्रुवतारा है। सभी बच्चों में कुछ ना कुछ नैसर्गिक गुण होता है। हो सकता है बच्चा अच्छा खिलाड़ी हो, पेंटर हो, म्यूजिशियन हो, वक्ता हो। और इसी उद्देश्य से एनईपी-2020 लाया गया है जिससे कि बच्चे की बच्चे की असली विधा, क्षमता से उसका परिचय करवाया जा सके और वो अपने कौशल से वंचित ना रहे।

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इनका कहना हैं...
जब तक माता-पिता बच्चों को मैदान दिखाएंगे ही नहीं, उनको खेलने के लिए वहां भेजेंगे ही नहीं तो बच्चों की रूचि खेल में नहीं जाएगी। पढ़ाई अच्छी बात है लेकिन खेल भी जीवन के लिए उतना ही जरुरी है। कई ऐसे खिलाड़ी है जिन्होंने पढ़ाई बहुत कम की है लेकिन उन्होंने खेलों में नाम इतना कमाया है कि सारी पढ़ाई एक तरफ हो गई। 
- विशाल शर्मा, अध्यक्ष, जिला एथलेटिक्स संघ। 

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माता-पिता को बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ उनकी शारीरिक गतिविधि पर भी यानि उनकी खेलों में रूचि पर भी ध्यान देना चाहिए। पढ़ाई करना बहुत अच्छी बात है लेकिन दिन के 24 घंटों में से कुछ समय एक बच्चे को खेल के मैदान पर भी बिताना चाहिए। 
- राकेश शर्मा, सचिव, जिला एथलेटिक्स संघ।  

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