रूस का रवैया

हले तो जेलेंस्की ने वार्ता से इंकार कर दिया फिर बिना शर्त वार्ता को तैयार हो गए।

रूस का रवैया

यूक्रेन पर रूसी हमले को लेकर अमेरिका व अन्य नाटो देश के सख्त रवैया अख्तियार करने के बाद रविवार को रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने एक तरफ तो अपने परमाणु बलों को हाई अलर्ट पर रहने का आदेश दिया तो दूसरी तरफ उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से वार्ता की पेशकश भी कर डाली।

यूक्रेन पर रूसी हमले को लेकर अमेरिका व अन्य नाटो देश के सख्त रवैया अख्तियार करने के बाद रविवार को रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने एक तरफ तो अपने परमाणु बलों को हाई अलर्ट पर रहने का आदेश दिया तो दूसरी तरफ उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से वार्ता की पेशकश भी कर डाली। पहले तो जेलेंस्की ने वार्ता से इंकार कर दिया फिर बिना शर्त वार्ता को तैयार हो गए। देर से ही सही आखिर पुतिन को यह समझ आ गई कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो उसे लेने के देने भी पड़ सकते हैं। युद्ध में कूदने से पहले यदि पुतिन सोवियत संघ के विघटन के कारणों को याद कर लेते तो इस तरह युद्ध छेड़ने की शायद पहल नहीं करते। गौरतलब है कि अफगानिस्तान पर कब्जा जमाने के प्रयासों की वजह से ही सोवियत संघ का बिखराव हुआ था। किसी देश पर कब्जा जमाना तब तक आसान नहीं होता जब तक उस देश की जनता का समर्थन नहीं मिलता। आज यूक्रेन की जनता रूसी सेना से मुकाबला कर रही है और रूस का विरोध भी। फिलहाल यह कहना मुश्किल कि रूस और यूक्रेन के बीच कोई सार्थक वार्ता होती है अथवा नहीं, लेकिन यह वक्त की मांगें हैं कि वार्ता अवश्य शुरू हो और उसका नतीजा सार्थक हो। युद्ध से विवाद सुलजते नहीं, बल्कि मामला और बिगड़ जाता है और आज के युग में तो किन्हीं भी देशों में युद्ध का प्रभाव सारी दुनिया पर पड़ता है और संकट खड़ा हो जाता है। कोरोना महामारी ने वैसे भी सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को चोपट कर दिया था। अर्थव्यवस्था में गति लाने के लिए प्रयासरत दुनिया के सामने यूक्रेन-रूस के बीच का युद्ध भी दुनिया के सामने बड़ा संकट खड़ा करेगा। इस हकीकत से इंकर नहीं किया जा सकता कि रूस-यूक्रेन युद्ध ने विश्व शांति को खतरे में डाल दिया है। इस बार रूस के लिए अमेरिका व उसके सहयोगी देशों के प्रतिबंधों को झेलना आसान नहीं होगा, क्योंकि उसे अन्तरराष्ट्रीय बैंकिंग तंत्र से भी बाहर करने की तैयारी चल रही है। यदि रूस बातचीत के जरिए समस्या का समाधान करने को ईमानदारी से तैयार है तो उसे सबसे पहले यूक्रेन पर हमलों को रोकना होगा। यह उचित नहीं है कि एक तरफ वह वार्ता की पेशकश करें और दूसरी तरफ हमला भी जारी रखें। अभी वह यही कर रहा है तो रूस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अब समय है कि अमेरिका व यूरोपीय देश कैसे भी युद्ध को रोकने के प्रयास करें व दोनों देशों के बीच सार्थक वार्ता का माहौल बनाए। भारत को भी इसमें अपनी अहम भूमिका निभानी चाहिए।

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