क्या वास्तव में ग्रीन पटाखे पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं? जानिए 40 प्रतिशत कम प्रदूषण के दावे की सच्चाई
दिल्ली-एनसीआर में 7 और 8 नवंबर को ग्रीन पटाखों की अनुमति
नई दिल्ली। दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच ग्रीन पटाखों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने राजधानी में 7 और 8 नवंबर को निर्धारित समय पर ग्रीन पटाखे चलाने की अनुमति दी है। दावा है कि ये सामान्य पटाखों के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाते हैं, लेकिन क्या ये वास्तव में पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं? ग्रीन पटाखों को विकसित करने की जिम्मेदारी वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की प्रयोगशाला नीरी (NEERI) को दी गई है। इनके निर्माण में ऐसे रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पारंपरिक पटाखों की तुलना में प्रदूषण कम हो। निर्धारित मानकों के अनुसार, इनमें पीएम कणों का उत्सर्जन करीब 30 प्रतिशत तक कम होना चाहिए।
CSIR-NEERI ने तीन तरह के ग्रीन पटाखे विकसित किए हैं। इनमें स्वास (SWAS), स्टार (STAR) और सफल (SAFAL) शामिल हैं। इनके निर्माण में अलग-अलग तकनीकों और रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। संस्थान के मुताबिक, इनसे प्रदूषण में 30 से 40 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। हालांकि, ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण मुक्त नहीं हैं। दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के 2022 के एक शोध में इनके जलने से अल्ट्राफाइन पार्टिकल्स निकलने की बात सामने आई थी। ये बेहद सूक्ष्म कण सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं।
सामान्य पटाखों की तुलना में इनमें कुछ हानिकारक रसायनों पर रोक और धुएं का उत्सर्जन कम करने के प्रावधान हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रीन पटाखों का इस्तेमाल भी वायु प्रदूषण को पूरी तरह रोकने का समाधान नहीं है।

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