सुप्रीम कोर्ट का आर्टिकल 142 का उपयोग: बंगाल चुनाव से पहले 'पूर्ण न्याय' का आदेश

बंगाल रोल रिवीजन में वोटर को शामिल करने के लिए SC ने आर्टिकल 142 का इस्तेमाल किया

सुप्रीम कोर्ट का आर्टिकल 142 का उपयोग: बंगाल चुनाव से पहले 'पूर्ण न्याय' का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल किया ताकि यह पक्का किया जा सके कि प्रोसेस की टाइमलाइन की वजह से पश्चिम बंगाल में कोई भी योग्य वोटर वोटर रोल से छूट न जाए, और राज्य विधानसभा चुनावों से पहले यह एक बहुत बड़ा दखल है।

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सशक्त बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया कि समय सीमा की बाधाओं के कारण कोई भी पात्र मतदाता मताधिकार से वंचित न रहे।

सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट और ज्यूडिशियल मैनपावर

अदालत ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया है कि 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद भी सप्लीमेंट्री (पूरक) लिस्ट जारी रखी जाए। यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में 'लॉजिकल डिसकम्पेन्सी' जैसे तकनीकी कारणों से लगभग 80 लाख मामलों का निपटारा होना अभी बाकी है। कोर्ट ने माना कि मौजूदा गति से इन दावों को निपटाने में 80 दिन लग सकते हैं, जो चुनाव की संभावित तारीखों के हिसाब से बहुत अधिक है।

काम में तेजी लाने के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को झारखंड और ओडिशा के मौजूदा व सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की मदद लेने का अधिकार दिया गया है। कोर्ट ने इसे "युद्ध स्तर पर" पूरा करने का निर्देश दिया है।

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चुनावी शुद्धता और समावेशिता

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बेंच ने स्पष्ट किया कि पहचान के सबूत के तौर पर आधार, एडमिट कार्ड और सर्टिफिकेट मान्य रहेंगे। इस हस्तक्षेप का मुख्य उद्देश्य चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच "भरोसे की कमी" को पाटते हुए मतदाता सूची की पवित्रता बनाए रखना है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अनुच्छेद 142 के तहत दिए गए इन निर्देशों को भविष्य के लिए 'मिसाल' (Precedent) नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह केवल बंगाल की "असाधारण स्थिति" के लिए है।

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