लापरवाही की चिंगारी और राख होती जिंदगियां
पटाखा फैक्ट्रियों में होने वाले हादसें हर साल कई लोगों की जान लेते
भारत में पटाखा फैक्ट्रियों में होने वाले हादसें हर साल कई लोगों की जान लेते हैं।
भारत में पटाखा फैक्ट्रियों में होने वाले हादसें हर साल कई लोगों की जान लेते हैं। 1 अप्रैल 2025 को गुजरात के बनासकांठा जिले के डीसा में एक अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण धमाके ने इस खतरे को फिर से सामने ला दिया। इस हादसे में 21 लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हुए। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि मृतकों के शरीर के अंग 200-300 मीटर दूर खेतों में बिखरे मिले। मरने वाले ज्यादातर मजदूर मध्य प्रदेश के हरदा और देवास जिले से थे, जो रोजगार की तलाश में इस जोखिम भरे काम में लगे थे। 2025 में अब तक पटाखा फैक्ट्रियों में हुए हादसों में 40 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। गुजरात की इस घटना में फैक्ट्री अवैध थी और ऐसा माना जा रहा है कि वहां विस्फोटक सामग्रियों का भंडारण और संचालन बिना किसी सुरक्षा मानक के किया गया।
पटाखे बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायन जैसे पोटैशियम नाइट्रेट, सल्फर और एल्यूमीनियम पाउडर बेहद ज्वलनशील होते हैं। इनका असुरक्षित इस्तेमाल या भंडारण छोटी-सी चिंगारी को भी विनाशकारी विस्फोट में बदल सकता है। मजदूरों को इन खतरनाक सामग्रियों को संभालने की कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई थी और संभवत वहां अग्निशमन उपकरण या आपातकालीन निकास भी नहीं थे। यह हादसा सुरक्षा नियमों की अनदेखी और अवैध संचालन का नतीजा है। त्योहारों के मौसम में पटाखों की मांग बढ़ने से उत्पादन का दबाव बढ़ता है और मालिक मुनाफे के लिए सुरक्षा को नजरअंदाज कर देते हैं। मारे गए मजदूर गरीब और अशिक्षित थे, जिनके पास रोजगार के सीमित विकल्प थे, जो सामाजिक और आर्थिक असमानता को उजागर करता है। देश में विस्फोटक नियम 2008 इस उद्योग को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून है, जो विस्फोटक अधिनियम 1884 के तहत बनाया गया। यह नियम पटाखों के निर्माण, भंडारण, परिवहन और बिक्री के लिए विस्तृत दिशानिर्देश देता है। इसके तहत फैक्ट्रियों को लाइसेंस लेना अनिवार्य है, जिसमें विस्फोटक की मात्रा, भंडारण की जगह और सुरक्षा उपायों का उल्लेख है। नियमों में यह भी प्रावधान है कि खतरनाक सामग्रियों को संभालने वाले मजदूरों को प्रशिक्षित किया जाए और फैक्ट्रियों में अग्निशमन उपकरण, आपातकालीन निकास और उचित दूरी के मानक पूरे किए जाएं। गुजरात की घटना में इन नियमों की पूरी तरह अनदेखी हुई, क्योंकि फैक्ट्री अवैध थी और किसी भी मानक का पालन नहीं किया गया। यह नियम सैद्धांतिक रूप से मजबूत है, लेकिन इसका जमीनी कार्यान्वयन कमजोर है।
लाइसेंसिंग में भ्रष्टाचार, नियमित निरीक्षण की कमी और सजा में देरी इसकी प्रभावशीलता को कम करती है। हादसों के बाद मजदूरों को मिलने वाली सहायता अक्सर नाकाफी होती है। आमतौर पर राज्य सरकारें मृतकों के परिवारों को 2-5 लाख रुपये और घायलों को 50 हजार से 1 लाख रुपये देती हैं। यह राशि परिवारों की आजीविका के लिए पर्याप्त नहीं है, खासकर जब मजदूर अकेले कमाने वाले हों। मुआवजा नीतियों में सुधार जरूरी है, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था में देरी और असमानता रहती है। अवैध फैक्ट्रियों के मालिकों से मुआवजा वसूलना मुश्किल होता है, जिससे सरकार पर बोझ पड़ता है। मजदूरों के अधिकारों के लिए एक मानकीकृत नीति चाहिए, जिसमें तत्काल सहायता, चिकित्सा और पुनर्वास शामिल हो। सरकार और कंपनियां इस दिशा में पर्याप्त कदम नहीं उठा रही हैं।
ज्यादातर फैक्ट्रियां असंगठित क्षेत्र में हैं, जहां मजदूरों का बीमा या सामाजिक सुरक्षा नहीं होती। कानूनी सख्ती का असर भी सीमित है। विस्फोटक नियम 2008 के तहत उल्लंघन पर सजा का प्रावधान है, लेकिन कुछ ही मामलों में कार्रवाई हुई है। लिहाजा अवैध फैक्ट्रियां और नियमों की अनदेखी बदस्तूर जारी है। ज्यादातर मामलों में सजा में देरी होती है या मुआवजा देकर मामला खत्म कर दिया जाता है। कानूनी प्रक्रिया को तेज और कठोर बनाने की जरूरत है, ताकि मालिकों में जवाबदेही आए। सरकार की मौजूदा नीतियां इस समस्या से निपटने में कमजोर हैं। विस्फोटक नियम 2008 के अलावा हाल के वर्षों में कोई नई राष्ट्रीय नीति या दिशा-निर्देश लागू नहीं हुए। पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन इस उद्योग पर निगरानी रखता है, लेकिन इसके पास कर्मचारियों और संसाधनों की कमी है। देश भर में हजारों फैक्ट्रियों की तुलना में इसके पास तकनीकी अधिकारी नगण्य हैं, जिससे प्रभावी निरीक्षण नहीं हो पाता।
पीईएसओ की भूमिका को मजबूत करने के लिए स्टाफ बढ़ाना, डिजिटल निगरानी शुरू करना और स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल जरूरी है। एक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की जरूरत है, जिसमें नियमित ऑडिट, मजदूरों की ट्रेनिंग और अग्निशमन उपकरण अनिवार्य हों। हादसों को रोकने के लिए तकनीकी सुधार भी जरूरी हैं। कुछ जगहों पर कम ज्वलनशील रसायनों और स्वचालित मशीनों का इस्तेमाल शुरू हुआ है, जिससे जोखिम कम हुआ है। ऐसी तकनीकों को देश भर में लागू करना चाहिए। समाज की भूमिका भी अहम है। पटाखों की मांग कम करने से उत्पादन का दबाव घटेगा। यह सिर्फ नियमों का मसला नहीं, बल्कि उन परिवारों की जिंदगी का सवाल है जो एक पल में उजड़ जाते हैं। समय आ गया है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
-देवेन्द्रराज सुथार
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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