महात्मा गांधी- लाल बहादुर की जयन्ती : राजस्थान में खोया बापू का चश्मा, पहले खाली रहा लाल का पंडाल-दूसरी बार उमड़ा सैलाब

असहयोग आन्दोलन की अलख जगाने 8 मार्च, 1921 को अजमेर आए थे

महात्मा गांधी- लाल बहादुर की जयन्ती : राजस्थान में खोया बापू का चश्मा, पहले खाली रहा लाल का पंडाल-दूसरी बार उमड़ा सैलाब
महात्मा गांधी ने स्वाधीनता आंदोलन और देश भ्रमण के दौरान तीन बार 1921, 1922 और 1934 में राजस्थान की यात्रा की थी। असहयोग आन्दोलन की अलख जगाने के लिए आठ मार्च, 1921 को अजमेर आए थे।

जयपुर। महात्मा गांधी ने स्वाधीनता आंदोलन और देश भ्रमण के दौरान तीन बार 1921, 1922 और 1934 में राजस्थान की यात्रा की थी। असहयोग आन्दोलन की अलख जगाने के लिए आठ मार्च, 1921 को अजमेर आए थे। अजमेर में जनसभा के दौरान मंच पर भारी भीड़ होन के कारण भगदड़ मच गई, जिससे उनका चश्मा गिरकर टूट गया था। तब स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मिलकर गांधीजी को सुरक्षित निकाला था।

अजमेर से हरिजन फंड के लिए 1172 रुपए जुटाए थे :

गांधी और डॉ.अम्बेडकर के बीच साम्प्रदायिक पंचाट के मामले में विवाद होने पर गांधी ने देशव्यापी दलित उद्धार आन्दोलन चलाया था। उसी कड़ी में 5 जुलाई, 1934 को बापू अजमेर के जादूघर हरिजन बस्ती आए थे। अजमेर नगर पालिका ने बापू के आह्रान पर निचली जातियों के लिए बड़ा तालाब खोल दिया था। इस यात्रा के दौरान उन्होंने हरिजन फंड के लिए 1172 रुपए से अधिक की राशि जुटाई थी। गांधी अध्येता डॉ.शैलेन्द्र मौर्य कहते हैं कि बापू की राजस्थान यात्रा स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण रही हैं। अजमेर में वे एक विधवा की शादी में जाने के साथ ही हरिजन फंड के लिए भी राशि जुटाई थीं।

जब गांधी ने ब्यावर में एक नौजवान से कहा- मैं हार गया

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गांधी जब ब्यावर पहुंचे तो 24 साल के एक नौजवान पं.चन्द्रशेखर ने गांधी को चुनौति देते हुए कहा कि मुझसे शास्त्रार्थ कीजिए... इस पर गांधी ने हंसते हुए कहा कि तुम घोषणा कर दो कि गांधी बिना शास्त्रार्थ के ही हार गया। बाद में पं.चन्द्रशेखर आगे चलकर पुरी के शंकराचार्य बने और स्वामी निरंजनदेव तीर्थ कहलाए। वे 1964 से 1992 तक शंकराचार्य रहे। इससे पहले अखिल भारतीय रामराज्य परिषद के मंत्री भी रहे। गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रो.जनक सिंह मीणा कहते हैं कि गांधी वर्ष 1901 में जयपुर रेलवे स्टेशन भी उतरे थे। उनकी स्मृति में उनका एक स्टेच्यू बनाया गया था।

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शास्त्रीजी के वजन के बराबर सोना दिया था- छोटी सादड़ी के नागरिकों ने :

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शास्त्रीजी की सादगी और विनम्रता का आलम था कि युद्ध के दौरान ही युद्ध फं ड के लिए वहां के नागरिकों ने शास्त्री जी को 56 किलो सोने से तौला था, जिसने देश की सुरक्षा में राजस्थान के योगदान को अमर कर दिया। गौरतल् को है कि वे भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री थे, वे 9 जून 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे।

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