अनुवाद सिर्फ शब्दों को दूसरी भाषा में बदलना नहीं यह भावनाओं को समझाने का काम : पूनम सक्सेना
साहित्य के वैश्विक आदान-प्रदान के लिए यह जरूरी
जेएलएफ के दूसरे दिन लेखिका और अनुवादक पूनम सक्सेना ने एक विचार मंथन सत्र के दौरान अनुवाद के काम की तुलना भगवान के काम से की। उन्होंने भाषा की शक्ति, अनुवाद की जटिलताओं और हिंदी सिनेमा की बदलती भाषा पर बात की।
जयपुर। जेएलएफ के दूसरे दिन लेखिका और अनुवादक पूनम सक्सेना ने एक विचार मंथन सत्र के दौरान अनुवाद के काम की तुलना भगवान के काम से की। उन्होंने भाषा की शक्ति, अनुवाद की जटिलताओं और हिंदी सिनेमा की बदलती भाषा पर बात की। सक्सेना ने कहा कि अनुवाद सिर्फ शब्दों को दूसरी भाषा में बदलने का काम नहीं, बल्कि इसमें किसी टेक्स्ट में छिपे सांस्कृतिक संदभोंर्, भावनात्मक बारीकियों और सामाजिक वास्तविकताओं को समझाना शामिल है। कभी-कभी कुछ शब्दों का दूसरी भाषा में अनुवाद करने से वह सटीक भावना या असर नहीं आ पाता, फिर भी मुझे लगता है कि साहित्य के वैश्विक आदान-प्रदान के लिए यह जरूरी है। हालांकि उन्होंने माना कि अनुवादक अक्सर मूल रचना की पूरी गहराई और बारीकियों को पकड़ने में नाकाम रहते हैं, लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह प्रक्रिया भाषाई और भौगोलिक सीमाओं के पार साहित्य और विचारों के आदान-प्रदान के लिए बहुत जरूरी है।
सत्र के दौरान सक्सेना ने हिंदी सिनेमा में भाषा के विकास पर भी बात की और बताया कि कैसे फिल्मों के डायलॉग और कहानियां समय के साथ बदली हैं। शुरुआती हिंदी फिल्में उर्दू और साहित्यिक हिंदी से बहुत ज्यादा प्रभावित थीं, जिससे उनमें एक खास गीतात्मकता थी। वहीं आज का सिनेमा बदलती सामाजिक सोच, शहरी प्रभावों और वैश्विक प्रभाव को दिखाता है। उन्होंने कहा कि इस बदलाव ने कहानियों को बताने और दर्शकों के समझने के तरीके को काफी हद तक बदल दिया है। चर्चा में उन साहित्यिक कृतियों की यात्रा पर भी बात हुई, जिन्हें फिल्मों में ढाला गया है। खासकर गुलशन नंदा के उपन्यासों को कैसे कटी पतंग और कई अन्य सफल हिंदी फिल्मों में पिरोया गया। सक्सेना ने लिखित कहानियों को विज़ुअल कहानी कहने में अनुवाद करने में आने वाली चुनौतियों पर जोर दिया। जहां फिल्म निर्माताओं को स्क्रीन के लिए किरदारों, भावनाओं और विषयों की फिर से व्याख्या करनी पड़ती है।

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