वर्ल्ड किडनी डे : सिक्स पैक की चाहत, सप्लीमेंट्स का अंधाधुंध सेवन युवाओं में किडनी फेल्योर का बना कारण
खराब लाइफस्टाइल, अनियंत्रित शुगर और ब्लड प्रेशर भी है किडनी के दुश्मन
वर्ल्ड किडनी डे पर विशेषज्ञों ने चेताया कि खराब लाइफस्टाइल, अनियंत्रित शुगर-बीपी और जिम में बिना डॉक्टर सलाह प्रोटीन सप्लीमेंट्स लेने से युवाओं में किडनी फेल्योर बढ़ रहा। डॉ. सौरभ जैन के अनुसार भारत में हर साल 2-2.5 लाख मरीजों को ट्रांसप्लांट की जरूरत होती, लेकिन डोनर की कमी।
जयपुर। आज के समय में खराब लाइफस्टाइल, अनियंत्रित शुगर और ब्लड प्रेशर के कारण किडनी की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि अब कम उम्र के युवा भी गंभीर रूप से किडनी फेल्योर का शिकार हो रहे हैं। इसके साथ ही देश और राजस्थान में अंगदान की भारी कमी के कारण लाखों मरीजों का जीवन दांव पर लगा है। वर्ल्ड किडनी डे के अवसर पर जानते हैं कि कैसे हम अपनी किडनी को बचा सकते हैं और अंगदान के जरिए किसी को नया जीवन दे सकते हैं।
बिना डॉक्टरी सलाह के सप्लीमेंट्स सेवन बन रहा जानलेवा :
यूरोलॉजिस्ट और किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. सौरभ जैन ने बताया कि ओपीडी में किडनी फेल्योर के युवा मरीजों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है। इसका एक बहुत बड़ा कारण जिम में बिना किसी डॉक्टर की निगरानी के अंधाधुंध प्रोटीन पाउडर और सप्लीमेंट्स का सेवन करना है। शरीर की प्रोटीन पचाने की एक सीमा होती है। क्षमता से ज्यादा सप्लीमेंट्स लेने ज्यादा असर किडनी पर पड़ता है। सप्लीमेंट्स लेना तभी सुरक्षित है जब वह ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट और एक योग्य डॉक्टर की उचित निगरानी में लिया जाए, अन्यथा यह शौक सीधा डायलिसिस तक ले जाता है।
देश और राजस्थान में अंगदान की भारी कमी :
किडनी की बीमारियों के इस बढ़ते दौर में अंगदान की स्थिति बेहद चिंताजनक है। आंकड़ों की बात करें तो भारत में हर साल लगभग दो से ढाई लाख मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट की सख्त जरूरत होती है, लेकिन डोनर्स की कमी के कारण सालभर में बामुश्किल तेरह से चौदह हजार मरीजों को ही नई किडनी मिल पाती है। राजस्थान की स्थिति भी गंभीर है जहां एक अनुमान के मुताबिक हर साल लगभग ग्यारह हजार लोग एंड-स्टेज किडनी फेल्योर का शिकार होते हैं। डोनर्स की कमी के कारण मरीजों को सालों तक वेटिंग लिस्ट में रहना पड़ता है और कई मरीज डायलिसिस पर ही दम तोड़ देते हैं।
अलग ब्लड ग्रुप में भी ट्रांसप्लांट संभव :
डोनर्स की कमी के बीच एबीओ इनकम्पैटिबल यानी अलग ब्लड ग्रुप ट्रांसप्लांट की तकनीक वरदान साबित हो रही है। मेडिकल साइंस इतनी उन्नत हो चुकी है कि अब मरीज और डोनर का ब्लड ग्रुप अलग होने पर भी विशेष प्रक्रिया से सफलता पूर्वक किडनी ट्रांसप्लांट किया जा सकता है।

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