डिलीवरी ब्वाय की कमजोर जेब, लेकिन मजबूत संकल्प ने खड़ी की नींव
'थोड़ा खुद के लिए, बाकी समाज के लिए' के मंत्र से शुरू हुआ सफर, शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और सेवा के क्षेत्र में सैकड़ों लोगों को जोड़ा
कोटा। समाज में बदलाव की बात करना आसान है, लेकिन बदलाव की शुरुआत अपने जीवन से करना आसान नहीं। इसके लिए संसाधनों से ज्यादा जरूरत होती है संकल्प की। ऐसी ही कहानी है आशीष कपूर और उनके द्वारा खड़ी की गई 'नीव फाउंडेशन' की। वर्ष 2015 में जब इस संस्था की शुरुआत हुई, तब न बड़ी आर्थिक ताकत थी और न ही संसाधनों की भरमार। था तो केवल एक विश्वास जरूरतमंद तक मदद पहुंचानी है और बच्चों को शिक्षा से जोड़ना है। आशीष कपूर ने शिक्षा को बदलाव का सबसे प्रभावी माध्यम माना। उनका मानना है कि किसी जरूरतमंद को मदद देना जरूरी है, लेकिन यदि किसी बच्चे को शिक्षा का अवसर मिल जाए तो वह अपने पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है। इसी सोच ने नीव फाउंडेशन की बुनियाद रखी।
पुराने कपड़ों से शुरू हुई सेवा की पहली सीढ़ी
शुरुआती दिनों में आशीष कपूर लोगों से पुराने लेकिन उपयोगी कपड़े एकत्र करते और उन्हें जरूरतमंद बस्तियों तक पहुंचाते थे। इसके साथ बच्चों के लिए किताबें जुटाना और
उन्हें पढ़ाना भी शुरू किया। यह काम छोटा समाज में बदलाव की बात करना आसान है, लेकिन बदलाव की शुरुआत अपने जीवन से करना आसान नहीं। इसके लिए संसाधनों से ज्यादा जरूरत होती है संकल्प की। ऐसी ही कहानी है आशीष कपूर और उनके द्वारा खड़ी की गई 'नीव फाउंडेशन' की। वर्ष 2015 में जब इस संस्था की शुरुआत हुई, तब न बड़ी आर्थिक ताकत थी और न ही संसाधनों की भरमार। था तो केवल एक विश्वास जरूरतमंद तक मदद पहुंचानी है और बच्चों को शिक्षा से जोड़ना है। आशीष कपूर ने शिक्षा को बदलाव का सबसे प्रभावी माध्यम माना। उनका मानना है कि किसी जरूरतमंद को मदद देना जरूरी है, लेकिन यदि किसी बच्चे को शिक्षा का अवसर मिल जाए तो वह अपने पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है। इसी सोच ने नीव फाउंडेशन की बुनियाद रखी।
पुराने कपड़ों से शुरू हुई सेवा की पहली सीढ़ी
शुरुआती दिनों में आशीष कपूर लोगों से पुराने लेकिन उपयोगी कपड़े एकत्र करते और उन्हें जरूरतमंद बस्तियों तक पहुंचाते थे। इसके साथ बच्चों के लिए किताबें जुटाना और उन्हें पढ़ाना भी शुरू किया। यह काम छोटा था, लेकिन इसके पीछे सोच बड़ी थी। समस्याएं समझते और उन्हें पढ़ाने का प्रयास करते। धीरे-धीरे लोगों का विश्वास जुड़ने लगा और एक व्यक्ति की पहल सामूहिक प्रयास में बदलने लगी।
डिलीवरी बॉय के रूप में काम करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी और बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला भी नहीं छोड़ा। पिता से मिली शिक्षा के महत्व की सीख उनके लिए प्रेरणा बनी रही। इसी दृढ़ता के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की। इसके बाद नौकरी मिली, जीवन आगे बढ़ा, लेकिन समाज के लिए कुछ करने की इच्छा कम नहीं हुई। वर्ष 2020 का लॉकडाउन नीव फाउंडेशन के सफर में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। दिहाड़ी मजदूरों और जरूरतमंद परिवारों की परेशानी देखकर आशीष कपूर ने अपने घर से ही भोजन बनाकर जरूरतमंदों तक पहुंचाना शुरू किया।
धीरे धीरे मदद के लिए हाथ बढ़ने लगे और स्वयंसेवक जुड़ते गए। कुछ ही समय में घर से शुरू हुई यह भोजन सेवा प्रतिदिन 400 से 500 जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने वाली मुहिम बन गई। आज नीव फाउंडेशन से 600 से अधिक सक्रिय सदस्य जुड़े हुए हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत ये स्वयंसेवक अपने समय, संसाधन और क्षमता के अनुसार संस्था सामाजिक अभियानों में योगदान दे रहे हैं। आशीष कपूर अपने सेवा सफर के का श्रेय अकेले खुद को नहीं देते। वे एक मंत्र को अपने जीवन में विशेष महत्व देते हैं 'स्वल्पं स्वयम्, समस्तं समाजाय', अर्थात थोड़ा अपने लिए और बाकी समाज के लिए। नीव फाउंडेशन की यात्रा में आशीष के माता-पिता के साथ संस्था के स्वयंसेवकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। अंशु मेहता, दीपक कुमार, रजत, स्वाति सिंह, इरशाद, सोहेल, वर्षित, मोनिका, शर्मिला, कीर्ति और शशांक सहित अनेक सहयोगी लगातार संस्था के कार्यों से जुड़े रहे हैं।
कोटा से जयपुर और पुणे तक बढ़ा सेवा का दायरा
आज नीव फाउंडेशन की गतिविधियां कोटा तक सीमित नहीं हैं। संस्थाकोटा, जयपुर और पुणे में विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से काम कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, स्वच्छता और जरूरतमंदों की सहायता के क्षेत्र में संस्था अपने स्वयंसेवकों के सहयोग से लगातार आगे बढ़ रही है। आशीष कपूर आज एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत हैं। पेशेवर जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद समाजसेवा से उनका जुड़ाव बना हुआ है। नौकरी और संस्था की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाकर वे सामाजिक अभियानों को आगे बढ़ा रहे हैं। नीव फाउंडेशन की कहानी इस बात का उदाहरण है कि समाजसेवा की शुरुआत बड़े बजट, बड़े कार्यालय संकल्प या बड़ी टीम से जरूरी नहीं होती। कभी-कभी एक व्यक्ति का छोटा-सा संकल्प ही आगे चलकर सैकड़ों लोगों को जोड़ देता है। जब संवेदना के साथ जुड़ता है तो एक छोटी कोशिश भी किसी की जिंदगी बदल सकती है। और जब उस कोशिश से लोग जुड़ते चले जाएं, तो वही कोशिश समाज के लिए मजबूत 'नीव' बन जाती है।

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