दवा लिखी और समझो हो गए चक्करघिन्नी
पर्ची से लेकर सील- साइन की जटिल प्रक्रिया ने बढ़ाई मुसिबत
कोटा। संभाग के सबसे बड़े महाराव भीमसिंह अस्पताल में उपचार के लिए आने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। वार्डों में भर्ती गंभीर मरीजों के परिजनों को डॉक्टर द्वारा लिखी जाने वाली जरूरी दवाइयां, केनुला, आईवी सेट, सिरिंज, सेफ्ट्रैक्सोन, ओंडा, सेफ्ट्रोकजोन, एम्ब्रोसील सिरप और दर्द निवारक एंटीबायोटिक्स तक अस्पताल के काउंटर से समय पर नहीं मिल पा रही हैं। दवाइयों के अभाव में तीमारदारों को सुबह से लेकर दोपहर तक अस्पताल के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। जैसे ही चिकित्सक द्वारा दवा लिखी जाती है, वैसे ही तीमारदारों के पैरों में 'चकरी' फिरना शुरू हो जाती है।
आईपीडी की हरी पर्ची में उलझन और लंबी कागजी प्रक्रिया
यहाँ भर्ती मरीजों के लिए रोजाना दवा लिखने के नियम के चलते परिजनों को रोज यही लंबी प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है। वार्ड से 'हरे पर्चे' पर लिखी दवा लेने के लिए सुबह से दोपहर 3 बजे तक नई ओपीडी स्थित दवा काउंटर के चक्कर काटने पड़ते हैं। इसके बाद बाकी रह गई दवाओं पर क्रॉस लगा दिया जाता है।
रात को जेराक्स के लिए खतरा में परिजन
क्रॉस लगी हुई पर्ची की पहले बाजार या अस्पताल परिसर में फोटोकॉपी करानी पड़ती है। शाम के 6 बजे बाद समय अस्पताल की एकमात्र जेरोक्स की दुकान बंद हो जाने से परिजनों को बाहर अंधेरे में भटकना पड़ता है, जिससे सड़क सुरक्षा का भी गंभीर खतरा रहता है। ऐसे में महिला व बुजुर्ग परिजनों को सडक पार करके जेरोक्स के लिए भटकना पडता है।
तीमारदारों की असली परीक्षा
कमरा नंबर 101 (नो-ड्यूज): फोटोकॉपी और पर्ची लेकर परिजन कमरा नंबर 101 पर जाते हैं, जहां 'नो-ड्यूज' फॉर्म दो प्रतियों में तैयार होता है।
कमरा नंबर 31 (एमओआईसी सत्यापन): इसके बाद फॉर्म को लेकर कमरा नंबर 31 में जाना पड़ता है, जहाँ लंबी कतार में लगकर सील-साइन कराने होते हैं।
जन औषधि व लाइफ लाइन स्टोर: अंत में सील-साइन कराकर वापस कमरा नंबर 101 और फिर प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र या भामाशाह काउंटर स्थित लाइफ लाइन मेडिकल स्टोर से दवाइयां मिलती हैं।
13 दिन में 32 बार जेरोक्स, चप्पले घिसने पर मिलती है 1 दिन की दवा
भर्ती मरीज के परिजन निर्भय सिंह ने बताया कि वे पिछले 13 दिनों में अपने पिता के इलाज के लिए अब तक 32 से ज्यादा बार जेरोक्स करा चुके हैं। हर रोज कम से कम दो से तीन बार दवा की पर्ची लेकर यही प्रोसेस करने पडते है। हर वार्ड में परिजनों की यही परेशानी है।
वहीं फरीदा का कहना है कि यहाँ तो बस चक्कर काटने वाला ही इलाज करा सकता है, एक कमरे से दूसरे कमरे तक चप्पलें घिसने के बाद एक दिन की दवा मिल पाती है। अगले दिन या अगली पर्ची पर फिर वही काम शुरू हो जाता है।
एक ही स्थान पर जेरोक्स, सील-साइन और नोट सप्लाई की हो व्यवस्था
एक मरीज और उसके तीमारदार के वास्तविक संघर्ष को देखते हुए, अस्पताल प्रशासन को राहत के लिए निम्नलिखित कदम तुरंत उठाने चाहिए। खानपुर से आए तिमार दार बँटी शर्मा ने बताया की ही खिड़की कमरा नंबर 101 के आसपास ही जेरोक्स मशीन, नोट सप्लाई फॉर्म तैयार करने और एमओआईसी/इंचार्ज की सील-साइन की व्यवस्था एक ही काउंटर या छत के नीचे की जाए। इससे तीमारदारों को एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग तक नहीं दौड़ना पड़ेगा।
लॉन्ग-टर्म प्रिस्क्रिप्शन
भर्ती मरीजों को केवल एक दिन की दवा का मांग पत्र देने के बजाय कम से कम 2 से 3 दिन की दवा एकसाथ या डिजिटल अप्रूवल का सिस्टम बनाया जाए, ताकि रोज-रोज की कागजी दौड़भाग से मुक्ति मिल सके।
अस्पताल प्रशासन का पक्ष
अस्पताल में पहले जेरोक्स की मशीनें थीं जो अब कंडम हो चुकी हैं। सील-साइन के लिए वैकल्पिक रूप से 101 कमरे के पास ही व्यवस्था करवाने के लिए आगे बातचीत करेंगे।
-डॉ. कर्नेश गोयल, उपाधीक्षक, एमबीएस अस्पताल
यह सब प्रक्रियाएं पारदर्शी तरीके के लिए जरूरी है। यह सरकार के निर्देरनुसार व्यवस्थाओं का संचालन कर रहे हैं।
-डा. राकेश सिंह अधीक्षक एमबीएस

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