अस्पताल की चौखट पर बिखरती गृहस्थियां : मंगल सूत्र-मकान गिरवी, टैक्सी बिकी, नौकरी छूटी
2.50 लाख तक के कर्ज में डूबे प्रसूताओं के परिजन
कोटा। मेडिकल कॉलेज की सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के आईसीयू में भर्ती प्रसूताओं की सांसों को बचाने की जंग जितनी कठिन है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल लड़ाई अस्पताल के बाहर उनके परिवार लड़ रहे हैं। अब यह परिस्थितियां सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं रही बल्कि यह उन घरों की कहानी है जहां आर्थिक तंगी के बीच चूल्हे ठंडे पड़ गए। नवजात बच्चे मां की बजाए रिश्तेदारों की गोद में पल रहे और मजदूर पिता, अस्पताल व बिखरती गृहस्थी के बीच टूट रहा है। परिवार की आखिरी जमा पूंजी, जेवर, मंगलसूत्र, मकान, वाहन और भविष्य तक गिरवी रखे जा चुके हैं। अस्पताल की चौखट पर बैठे इन परिवारों की जिंदगी मानो ठहर गई है। उनकी सुबह डॉक्टरों की रिपोर्ट से शुरू होती है और रात इस चिंता के साथ खत्म होती है कि अगले दिन मरीज की डाइट, घर का राशन और बच्चों की जरूरतों के लिए पैसे कहां से आएंगे। इन परिवारों के लिए अब सबसे बड़ी चिंता इलाज के साथ गृहस्थी बचाने की हो गई है। वे मदद की गुहार लगा रहे हैं लेकिन न सरकार सुन रही है और न ही प्रशासन। दर्द बयां करते हुए परिजनों की आंखें भर आती हैं। पेश है खबर के प्रमुख अंश...
पत्नी के जेवर गिरवी रखे तब राशन आया, अब वो भी खत्म
किशोरपुरा गांव निवासी नरेश की पत्नी पिंकी पिछले 38 दिनों से आईसीयू में भर्ती है। नरेश कहते हैं, मैं मजदूरी करके परिवार चलाता था, लेकिन डेढ़ महीने से अस्पताल में हूं। काम-धंधा छूट गया। घर में 50 किलो गेंहू कर्ज लेकर डलवाए थे, अब वह भी खत्म हो गए। मजबूरी में पत्नी के जेवर गिरवी रख राशन व इलाज में होने वाले खर्च का इंतजाम किया था, लेकिन अब वह सहारा भी खत्म होने वाला है। गांव में दो मासूम बेटियां, बुजुर्ग माता-पिता और छोटा भाई हैं। पत्नी के लिए दूध, दलिया, अंडे, पनीर, जूस और अन्य प्रोटीनयुक्त डाइट का इंतजाम करना पड़ता है। साथ ही मरीज के साथ रहने वाले दो लोगों का भोजन, डायपर और अन्य जरूरतों में अब तक 50 हजार रुपए से अधिक खर्च हो चुके हैं। पत्नी कब ठीक होगी, कोई नहीं बता रहा। डॉक्टर तीन महीने का समय बता रहे हैं, लेकिन तब तक परिवार क्या खाएगा, बच्चों को क्या खिलाऊंगा।
कमाई का एक ही जरिया थी टैक्सी,वह भी बिक गई
4 मई की घटना मोहन की जिंदगी के लिए नासूर बन गई। धन्नी बाई के पति मोहन टैक्सी चलाकर परिवार का गुजारा करते थे, लेकिन वह भी इलाज और घर खर्च के लिए बिक गई। उन्होंने बताया कि यह सिर्फ टैक्सी नहीं बल्कि मेरी रोजी-रोटी थी। डेढ़ माह से पत्नी अस्पताल में भर्ती है, मैं काम पर नहीं जा पा रहा। आमदनी भी ठप हो गई। मां हॉस्टल की मैस में काम करती थीं, वह भी छूट गया। दोनों की कमाई से घर चलता था, लेकिन अब दोनों ही बेरोजगार हैं। घर पर बीमार पिता और दो छोटी बेटियां हैं, जिनकी देखरेख के लिए बहन ससुराल छोड़ यहां आई है। घर का राशन, पिता की दवाइयां, पत्नी की डाइट, जरूरी चीजों के लिए कर्जा लिया था, लेकिन काम-धंधे छूट जाने से चुका नहीं सका। ऐसे में टैक्सी कार बेचकर परिवार चलाना पड़ रहा है। नवजात बच्चे की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है। उसे बारां बहन के घर भेजा है। बेटियों के स्कूल खुलने वाले हैं। फीस, किताबें और अन्य खर्च सामने हैं। सोचकर ही आंखें भर आती हैं कि आगे क्या होगा।
अभी तक 45 हजार खर्च, अब फिर से कर्जा लेना पड़ा
बरड़ा बस्ती निवासी सुशीला के पति ओम प्रकाश कहते हैं, मैं मजदूर हूं। आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है। पिछले डेढ़ माह से मैं और दो मासूम बेटियां अस्पताल की चौखट पर हैं। काम-धंधे छूट गए। डॉक्टर्स के कहने पर पत्नी को डाइट में दूध, दलिया, अंडे, पनीर, अनार, सेव बाजार से लाकर देने होते हैं। इसके अलावा बेटियां व मेरा दो वक्त का भोजन भी बाहर से लाना पड़ता है। प्रतिदिन 300 से 400 रुपए खर्च हो रहा है। अब तक 45 से 50 हजार रुपए खर्च हो चुके हैं, अब गिरवी रखने के लिए कुछ नहीं बचा, सिवाए बाइक के, अब वह भी गिरवी रख पैसों का इंतजाम करने जा रहा हूं। लेकिन, हम रोज खाने-कमाने वाले लोग हैं, तीन माह तक बिना रोजगार के कैसे परिवार संभालेंगे। डॉक्टर्स मरीज को घर ले जाने की बात कहते हैं लेकिन कल रात को ही सुशीला की तबीयत खराब हो गई, वह उल्लिटयां कर रही है, हाथ-पैर सुन्न हो जाते हैं। भरी गर्मी में भी सर्दी से कांपती है। ऐसे हालात में कैसे घर ले जाऊं। सरकार व प्रशासन कोई भी मदद नहीं कर रहा। भीख मांगने की नौबत आ गई। आत्मा रोती है लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है।
मंगल सूत्र और मकान गिरवी, 2.50 लाख का हुआ कर्जा
कसार निवासी किरन के पति सोनू कहते हैं, पत्नी के इलाज में 2.50 लाख का कर्जा हो गया फिर भी किरन पूरी तरह ठीक नहीं है। 8 मई को मेडिकल कॉलेज अस्पताल ने निजी हॉस्पिटल रैफर किया। यहां मेडिसीन में ही 1.50 लाख रुपए खर्च हो गए। वहीं, बच्चे की जांचों का खर्चा भी अलग था। हॉस्पिटल में परिवार के 5-6 लोग रहते थे, रोजाना का भोजन की 500 रुपए का आता था। इस तरह से 8 दिन में ही निजी हॉस्पिटल में 1.80 लाख रुपए खर्च हो गए। प्रशासन व मेडिकल कॉलेज ने कोई मदद नहीं की। पत्नी का मंगल सूत्र व मकान गिरवी रख पैसों का इंतजाम करना पड़ा। 16 मई को छुट्टी कर दी गई। लेकिन तबीयत फिर से बिगड़ गई। 18 मई को ही मेडिकल कॉलेज के एसएसबी में लाए। यहां 10 जून तक भर्ती रही। यहां डाइट, परिवार के सदस्यों का भोजन, पार्किंग सहित अन्य चीजों में 35 से 40 हजार खर्च हो गए।
नौकरी छूटी, जमा पूंजी खत्म अब ब्याज पर 80 हजार लिए
रागिनी के पति लोकेश प्राइवेट नौकरी करते थे। 4 मई के बाद से ही वह अस्पताल में हैं। उन्होंने कहा, एक महीने से ज्यादा समय बीत गया लेकिन पत्नी की तबीयत में सुधार नहीं हुआ। पूरे महीने नौकरी पर नहीं जा सका, तनख्वाह कटी और नौकरी भी चली गई। घर में जो जमा-पूंजी थी वो भी अस्पताल, पार्किंग, मरीज की डाइट सहित अन्य जरूरी कार्यों में खर्च हो गए। घर में माता-पिता, दो बेटियां, एक नवजात है। कमाने वाला मैं अकेला हूं लेकिन बेरोजगार होने से परिवार चलाना मुश्किल हो गया। घर का राशन भी खत्म हो गया। मजबूरी में ब्याज पर 80 हजार रुपए लिए, तब जाकर घर पर राशन आ सका। डॉर्क्ट्स तीन माह तक इलाज जारी रहने की बात कहते हैं, इतने दिनों हम बेरोजगारी की हालत में यहां रहेंगे तो परिवार कैसे चलेगा। सरकार को मदद के लिए आगे आना चाहिए।

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