ढाई साल से ताले में बंद 2 करोड़ की कैंटीन, भटक रहे विद्यार्थी

आरटीयू में सुविधाओं को तरसे विद्यार्थी

ढाई साल से ताले में बंद 2 करोड़ की कैंटीन, भटक रहे विद्यार्थी

विद्यार्थी यूनिवर्सिटी परिसर में बनी गुमठी व बाहर की थड़ियों पर ही लंच व नाश्ता करने को मजबूर।

कोटा। राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय स्टूडेंटस को बेहतर सुविधाएं देने का दावा करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बिलकुल इसके उलट है। इन दिनों शहर का तापमान 40 से 45 डिग्री चल रहा है, भीषण गर्मी और झुलसा देने वाली गर्म हवाओं के बीच थड़ियों पर अल्पहार करने को मजबूर हैं। जबकि, आरटीयू में 2 करोड़ की लागत से बना कैफेटेरिया ढाई साल से धूल खा रहा है। इसका उद्घाटन भी हो चुका है, इसके बावजूद इसे शुरू नहीं किया गया। विश्वविद्यालय की कथनी और करनी में अंतर साफ नजर आता है। एक तरफ करोड़ों की अत्याधुनिक कैंटिन सालों से ताले में बंद है। वहीं, दूसरी तरफ स्टूडेंटस व स्टाफ भीषण गर्मी में कैम्पस में बनी गुमटीनुमा कैंटिन या बाहर थड़ियों पर चाय नाश्ते के साथ गर्म हवाओं के थपेड़े खा रहे हैं। 

राज्यपाल ने किया था वर्चुअल उद्घाटन
आरटीयू में कोरोनाकाल से पूर्व 2 करोड़ की लागत से कैफेटेरिया का निर्माण कार्य शुरू हुआ किया गया था, जो वर्ष 2020 में यह बनकर तैयार हुआ। इसके एक साल बाद वर्ष 2021 में राज्यपाल द्वारा वर्चुअली अत्याधुनिक कैंटिन का उदघाटन किया था। इसके बाद से ही करोड़ों का कैफेटेरिया धूल खा रहा है। विद्यार्थियों, शिक्षकों और स्टाफ को चाय-नाशते के लिए झुलसा देने वाली गर्मी में इधर-उधर सड़कों पर भटकना पड़ रहा है। 

प्रतिमाह किराया 1 लाख 
विश्वविद्यालय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, आरटीयू के नवनिर्मित कैफेटेरिया का 1 लाख रुपए प्रतिमाह किराया निर्धारित किया गया है। सालाना 12 लाख रुपए किराया व्यवहारिक नहीं होने से कोई भी व्यक्ति कैफेटेरिया का संचालन को तैयार नहीं हुआ। इसके अलावा जीएसटी व बिजली बिल अलग से देय होने के कारण किसी भी संवेदक ने टैंडर प्रक्रिया में भाग लिया। ऐसे में हाईटेक कैंटिन ढाई साल से धूल खा रही है। 

कैसे तय हुआ कैफेटेरिया का किराया
सूत्रों ने बताया कि सरकारी इमारत को जब किराए पर दिया जाना होता है तो सरकारी एजेंसी से उस बिल्डिंग का वैल्यूवेशन कराया जाता है और उसी के आधार पर किराया तय होता है। आरटीयू में भी यही फॉर्मूला अपनाया गया। पीडब्ल्यूडी द्वारा कैफेटेरिया का स्टीमेट निकलवाया गया। अधिकारियों ने बिल्डप एरिया के हिसाब से कैफेटेरिया का एक लाख रुपए प्रतिमाह किराया निर्धारित किया, जो कि विश्वविद्यालय के लिहाज से अव्यवहारिक है। किसी भी व्यक्ति के लिए 12 लाख रुपए सालाना किराया वहन करना व्यवहारिक नहीं है। विशेषज्ञ बताते हैं कि विश्वविद्यालय को नो प्रोफिट नो लॉस की तर्ज पर टैंडर प्रक्रिया अपनाकर विद्यार्थियों के हित में सुविधाएं उपलब्ध करवाना चाहिए, विवि की जिम्मेदारी है। 

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अब आगे क्या
विशेषज्ञ बताते हैं, नियमानुसार तीन बार टैंडर निकालने के बाद भी कोई रेस्पोंस नहीं आता है तो किराया दर घटाने के लिए मामला फाइनेंस कमेटी के समक्ष रखा जाता है। लेकिन, इसके लिए ठोस कारण बताना होता है। कैफेटेरिया का किराया बाजार दर से अधिक है। ऐसे में आरटीयू में यह किराया उचित नहीं है। फाइनेंस कमेटी के पास ही किराया दर घटाने की पावर होती है, क्योंकि इस कमेटी में विवि और सरकार के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। कमेटी के समक्ष मामले से जुड़े सभी पहलु पर चर्चा कर कोई निर्णय लिया जा सकता है। 

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तीन बार निकाले टैंडर, नहीं आए एक भी आवेदन
जानकारी के अनुसार वर्ष 2021 से अब तक आरटीयू प्रशासन द्वारा कैफेटेरिया संचालन के लिए तीन बार टैंडर निकाले जा चुके हैं। इसके बावजूद कोई भी संवेदक कैंटिन चलाने को तैयार नहीं हुआ। हुआ यूं, जब-जब टैंडर निकाले तब आरटीयू द्वारा संवेदकों को 1 लाख रुपए प्रतिमाह किराया दर से अधिक बोली लगाने को कहा गया। सालाना 12 लाख किराया सुनकर किसी ने भी रुची नहीं दिखाई। सूत्र बताते हैं कि सालाना किराया के अलावा  जीएसटी और बिजली बिल अलग से व्यय करना होगा। आरटीयू की बदइंतजामी के चलते विद्यार्थियों को एयरकंडीशनर कैफेटेरिया की सुविधा होने के बावजूद लाभ नहीं मिल रहा। 

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लू के थपेड़ों के बीच लंच करने की मजबूरी
नाम न छापने की शर्त पर बीटेक फाइनल इयर के विद्यार्थियों ने बताया कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद नवनिर्मित कैफेटेरिया को चालू नहीं किया जा रहा। जबकि, उद्घाटन तक हो चुका है। ऐसे में यूनिवर्सिटी परिसर में बनी गुमठी व बाहर की थड़ियों पर ही लंच व नाश्ता करना पड़ता है। इन दुकानों पर न तो गर्मी से बचाव के लिए कोई इंतजाम है और न ही पंखें ठीक से चलते हैं। मजबूरन भीषण गर्मी में झुलसा देने वाली गर्म हवाओं के थपेड़े खाने को मजबूर हो रहे हैं। कैफेटेरिया शुरू करवाने के लिए अधिकारियों से मांग भी की लेकिन सुनवाई नहीं हुई। 

फीस लेने में ही दिखाते हैं फुर्ती
एमबीए स्टूडे्ंट ने बताया कि कोई छात्र फीस भरने में एक दिन लेट हो जाए तो पैनल्टी लगा दी जाती है। जितनी फुर्ती फीस लेने में दिखाते हैं उतनी फुर्ती सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी दिखानी चाहिए। वहीं, बीटेक फाइनल इयर की छात्रा ने कहा, हमें तीन साल हो गए इसके बावजूद कैफेटेरिया का लाभ नहीं मिला। इसके अलावा विश्वविद्यालय में शैक्षणिक सुविधाओं का भी अभाव है।

एक-दूसरे पर ढोल रहे जिम्मेदारी
राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय में कंट्रेक्शन से संबंधित काम सम्पदा प्रभारी के अधीन होते हैं। कैफेटेरिया संचालित क्यों नहीं हो पा रही, इससे संबंधित सवालों के जवाब भी वहीं देंगे। मुझे इसके बारे में कुछ पता नहीं। 
-प्रो. एसके सिंह, वाइस चांसलर, आरटीयू

किसी भी तरह के सवालों के जवाब विश्वविद्यालय के वीसी देंगे। मैं कोई भी जवाब नहीं दूंगा। 
- साकेत माथूर, सम्पदा प्रभारी, आरटीयू

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