बिजली वितरण के निजीकरण के खिलाफ उतरी एआईपीईएफ, कहा- सुधारों का लक्ष्य सस्ती और भरोसेमंद बिजली हो, निजी मुनाफा नहीं
विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025 को वापस लेने की मांग
चंडीगढ। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने बिजली क्षेत्र में भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप सुधारों की वकालत करते हुए बिजली वितरण के किसी भी रूप में निजीकरण का कड़ा विरोध किया है। फेडरेशन ने कहा कि बिजली क्षेत्र में सुधारों का उद्देश्य उपभोक्ताओं को सस्ती, सुलभ, विश्वसनीय और जवाबदेह बिजली उपलब्ध कराना होना चाहिए, न कि निजी मुनाफे को बढ़ावा देना।
एआईपीईएफ के प्रवक्ता वी के गुप्ता ने रविवार को कहा कि वह केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों की बिजली क्षेत्र से जुड़ी नीतियों पर लगातार तकनीकी, वित्तीय और परिचालन संबंधी मुद्दे उठाता रहा है। उन्होंने कहा कि बिजली सुधारों का मुख्य फोकस वहनीयता, पहुंच, विश्वसनीयता, दक्षता और सार्वजनिक जवाबदेही पर होना चाहिए। उन्होंने विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 का भी विरोध करते हुए कहा है कि प्रस्तावित बदलाव वास्तविक संरचनात्मक सुधारों के बजाय बिजली वितरण के निजीकरण का रास्ता खोल सकते हैं।
गुप्ता ने कहा कि एआईपीईएफ की प्रमुख आपत्तियों में एक ही भौगोलिक क्षेत्र में कई बिजली वितरण लाइसेंसधारियों को सार्वजनिक धन से तैयार किए गए एक ही वितरण नेटवर्क का उपयोग करने की अनुमति देने का प्रस्ताव है। फेडरेशन का कहना है कि ऐसी व्यवस्था में निजी कंपनियां अधिक भुगतान करने वाले औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को चुन सकती हैं, जबकि राज्य के स्वामित्व वाली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के पास घरेलू, कृषि और ग्रामीण उपभोक्ता रह जाएंगे, जिन्हें अक्सर सब्सिडी या क्रॉस-सब्सिडी वाली बिजली उपलब्ध करानी पड़ती है।
फेडरेशन के अनुसार इससे सार्वजनिक डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति और कमजोर हो सकती है। इसी कारण उसने समानांतर वितरण लाइसेंस को ‘निजीकरण का पिछले दरवाजे से रास्ता’ बताते हुए कर्नाटक, हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में ऐसे प्रस्तावों का विरोध किया है। उसके अनुसार कर्नाटक और हरियाणा में इस प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया गया है। एआईपीईएफ ने यह सवाल भी उठाया है कि निजी कंपनियां मौजूदा बिजली ढांचे से मिलने वाले लाभ के अनुपात में निवेश करेंगी या नहीं। फेडरेशन के अनुसार बिजली वितरण का अधिकांश नेटवर्क लगभग सात दशकों में सार्वजनिक धन, केंद्र की सहायता और राज्य सरकारों की गारंटी वाले ऋणों से तैयार हुआ है। उसका कहना है कि मौजूदा नेटवर्क के इस्तेमाल के लिए केवल व्हीलिंग शुल्क का भुगतान करना सार्वजनिक बिजली कंपनियों द्वारा किए गए पूंजीगत निवेश, कर्ज और ब्याज के बोझ की पर्याप्त भरपाई नहीं कर सकता।
फेडरेशन ने अलग कृषि डिस्कॉम बनाने के प्रस्तावों का भी विरोध किया है। उसने इन्हें तकनीकी रूप से अनुचित, व्यावसायिक रूप से अव्यवहारिक और वित्तीय रूप से अस्थिर बताया है। इसी तरह आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) डेटा केंद्रों के लिए अलग वितरण लाइसेंस देने के प्रस्तावों पर भी उसने चिंता जताई है। एआईपीईएफ को आशंका है कि ऐसी व्यवस्थाएं भविष्य में लाभकारी उपभोक्ता वर्गों को सार्वजनिक डिस्कॉम से अलग करने की मिसाल बन सकती हैं, जिससे सार्वजनिक बिजली कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ेगा।
फेडरेशन ने बिजली निगमों के वरिष्ठ प्रबंधन पदों पर अनुभवी बिजली इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की नियुक्ति की मांग की है। उसका कहना है कि बिजली क्षेत्र का तकनीकी ज्ञान और लंबा अनुभव रखने वाले पेशेवर सुधारों को बेहतर ढंग से लागू कर सकते हैं तथा सार्वजनिक बिजली कंपनियों की दक्षता और वित्तीय एवं परिचालन स्थिति को मजबूत कर सकते हैं। एआईपीईएफ ने कहा कि बिजली क्षेत्र के तकनीकी विशेषज्ञों की विशेषज्ञता का इस्तेमाल करते हुए राज्य बिजली बोर्डों और सरकारी बिजली कंपनियों की सार्वजनिक सेवा व्यवस्था को कमजोर किए बिना सुधार लागू किए जा सकते हैं। फेडरेशन ने ऐसे भारत-विशिष्ट सुधारों की आवश्यकता बताई, जो देश की बड़ी ग्रामीण आबादी, कृषि क्षेत्र की बिजली खपत, अलग-अलग आर्थिक परिस्थितियों और बिजली वितरण की सार्वजनिक सेवा संबंधी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखें।
फेडरेशन ने विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 को वापस लेने, बिजली वितरण के किसी भी रूप में निजीकरण को उलटने तथा राज्य के स्वामित्व वाली बिजली कंपनियों को मजबूत करने की मांग की है। एआईपीईएफ के अनुसार बिजली क्षेत्र को उपभोक्ताओं की सेवा और आर्थिक विकास में सहयोग पर केंद्रित रहना चाहिए तथा सुधारों का लक्ष्य सस्ती, विश्वसनीय, सुलभ और जवाबदेह बिजली सुनिश्चित करना होना चाहिए। एआईपीईएफ ने स्पष्ट किया कि वह सुधारों के खिलाफ नहीं है, बल्कि ऐसे सुधारों का विरोध करता है जो उसके अनुसार सार्वजनिक बिजली कंपनियों को कमजोर कर सकते हैं या सार्वजनिक धन से तैयार बुनियादी ढांचे का लाभ निजी कंपनियों को पहुंचा सकते हैं। फेडरेशन ने पेशेवर विशेषज्ञता, बेहतर प्रबंधन, तकनीकी आधुनिकीकरण और वित्तीय अनुशासन के माध्यम से बिजली क्षेत्र के पुनर्गठन की वकालत की है।

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