ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: विकास, सुरक्षा और विवाद, रणनीतिक ताकत बनाम पर्यावरण की चिंता

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की रणनीतिक अहमियत

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: विकास, सुरक्षा और विवाद, रणनीतिक ताकत बनाम पर्यावरण की चिंता

ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट भारत की समुद्री रणनीति को मजबूती देगा। यह व्यापार, सुरक्षा और हिंद-प्रशांत दृष्टि के लिए अहम है, हालांकि पर्यावरण व आदिवासी प्रभावों पर संतुलन जरूरी है।

जयपुर । ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट को नीति आयोग ने 2021 में एक मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर योजना के रूप में आगे बढ़ाया। इसके तहत इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, आधुनिक टाउनशिप और गैस-सोलर आधारित पावर प्लांट विकसित किए जाने हैं। इस प्रोजेक्ट को अंडमान एंड निकोबार आइलैंड्स इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लागू कर रहा है। ऊपरी तौर पर यह एक आर्थिक विकास परियोजना दिखती है, लेकिन रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह एक डुअल यूज प्रोजेक्ट है-यानी नागरिक सुविधाओं के साथ-साथ इसका सैन्य उपयोग भी संभव है। शांति के समय यह प्रोजेक्ट व्यापार बढ़ाएगा और संकट के समय सैन्य बढ़त देगा। ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए बेहद अहम है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक है। भारत का करीब 60% समुद्री व्यापार और चीन का लगभग 80% ऊर्जा व व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। 

संतुलन की तलाश

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की समुद्री रणनीति और हिंद-प्रशांत विजन का अहम हिस्सा है। यह देश की सुरक्षा, व्यापार और वैश्विक कूटनीति को मजबूती दे सकता है। लेकिन साथ ही, इतने नाजुक पर्यावरण और आदिवासी समाज की कीमत पर विकास करना दीर्घकाल में नुकसानदेह साबित हो सकता है। जरूरत है पारदर्शी निर्णय, वैज्ञानिक पर्यावरण प्रबंधन और स्थानीय समुदायों को साथ लेकर चलने की। तभी ग्रेट निकोबार सच में भारत की रणनीतिक ताकत भी बनेगा और प्राकृतिक धरोहर भी बची रहेगी।

पर्यावरण को लेकर क्या गलत या बढ़ा-चढ़ाकर कहा जा रहा है?

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कुछ बातें जरूरत से ज्यादा सरलीकृत या गलत तरीके से पेश की जा रही हैं:
पूरा द्वीप खत्म हो जाएगा-असल में विकास द्वीप के सीमित हिस्से तक केंद्रित है, पूरा ग्रेट निकोबार नहीं।
कोई पर्यावरणीय अध्ययन नहीं हुआ-पर्यावरण प्रभाव आकलन किया गया है, हालांकि इसकी गुणवत्ता और पारदर्शिता पर सवाल जरूर हैं।
सिर्फ सैन्य प्रोजेक्ट है-यह पूरी तरह सैन्य नहीं, बल्कि नागरिक-सैन्य मिश्रित (डुअल यूज) परियोजना है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा हो सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असली मुद्दा विकास बनाम पर्यावरण नहीं, बल्कि कैसे विकास किया जाए है।

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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है?

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ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट से भारत की ना सिर्फ सिंगापुर और कोलंबो पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी, बल्कि मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य में हमारी सर्विलांस काफी ज्यादा मजबूत हो जाएगी। मलक्का, ये वो संकरा समुद्री रास्ता है, जिसे चीन सबसे ज्यादा डरता है। भारत अंडमान-निकोबार से युद्ध के समय चीन के सप्लाई चेन को ब्लॉक कर सकता है, जिससे चीन का करीब 80 प्रतिशत कारोबार ही ठप पड़ जाएगा और इसीलिए चीन इस प्रोजेक्ट से खौफजदा है। अंडमान और निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से मलक्का स्ट्रेट से मलक्का स्ट्रेट सिर्फ 500-600 किलोमीटर दूर है। जबकि अंडमान-निकोबार का सबसे दक्षिणी छोर इंदिरा पॉइंट, जो ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित है, मलक्का स्ट्रेट के प्रवेश द्वार के बेहद करीब है। यहां से इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप की दूरी सिर्फ 140-160 किलोमीटर है। जबकि, ग्रेट निकोबार से मलक्का स्ट्रेट की मुख्य शिपिंग लेन सिर्फ 75-80 किलोमीटर दूर है। 

कितना एरिया प्रभावित होगा?

ग्रेट निकोबार द्वीप का कुल क्षेत्रफल: लगभग 1,045 वर्ग किलोमीटर
प्रोजेक्ट से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित क्षेत्र: करीब 130-160 वर्ग किलोमीटर
(इसमें पोर्ट, एयरपोर्ट, टाउनशिप, पावर प्लांट और उससे जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल है)
यानी कुल द्वीप का लगभग 12-15% हिस्सा
भारत के दूसरे इलाकों से तुलना करें तो यह चंडीगढ़ शहर के कुल क्षेत्रफल: 114 वर्ग किलोमीेटर से थोड़ा सा बड़ा है। 
वहीं वहां से कटने वाले जंगल की बात करें तो वह अरावली के कई छोटे संरक्षित वन क्षेत्रों को मिलाकर जितना एरिया कवर होता है उतना ही जंगल कटेगा। अगर 150 वर्ग किलोमीटर में जंगल कटता है। आसपास दूसरे जंगल, आबादी, सड़कें, विकल्प मौजूद होते हैं, जो इकोसिस्टम को बनाए रखने में मदद करते हैं। 

पर्यावरण पर संभावित प्रभाव

ग्रेट निकोबार द्वीप जैव विविधता के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। यहां घने उष्णकटिबंधीय वर्षावन, मैंग्रोव, कोरल रीफ और कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। प्रस्तावित विकास से कुछ गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव सामने आ सकते हैं।

वनों की कटाई: हजारों हेक्टेयर जंगल साफ होने से जैव विविधता को नुकसान।
वन्यजीवों पर असर: निकोबार मेगापोड जैसे स्थानिक (एंडेमिक) पक्षियों और समुद्री कछुओं के आवास खतरे में।
आदिवासी जीवन: शॉम्पेन और निकोबारी आदिवासी समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक जीवन पर असर।
भूकंपीय जोखिम: यह इलाका भूकंप और सुनामी के लिहाज से संवेदनशील है, जिससे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर सवाल उठते हैं।

प्रोजेक्ट को रोकने के लिए क्या दलील दी जा रही?

इस प्रोजेक्ट को रोकने के लिए द्वीपसमूह की इकोलॉजिकल कमजोरी और जीएनआई प्रोजेक्ट का पर्यावरण और स्थानीय आदिवासी समुदाय पर पड़ने वाले प्रभाव को उठाया जाता है। इन्हें मुद्दा बनाकर मुकदमेबाजी हो सकती है, पर्यावरण विद हंगामा मचा सकते हैं, ऐसे संगठन अंतर्राष्ट्रीय जांच की मांग कर सकते हैं, ताकि बाहरी शक्तियों को इस क्षेत्र में दखल देने का रास्ता खुले और इस प्रोजेक्ट में लगने वाले फंड को रोकने के लिए कई तरकीबें आजमा सकते हैं। ताकि इस प्रोजेक्ट की रफ्तार को धीमा किया जा सके। चीन के नजरिए से देखें तो निकोबार में भारत की मजबूत हवाई और नौसैनिक क्षमता, मलक्का में उसके लिए खतरा है। यद्ध के समय भारत चीन की इस कमजोरी पर सीधा हमला कर सकता है। इसीलिए इस प्रोजेक्ट को लेकर चीन डरा हुआ है। 

अंडमान और निकोबार का भूगोल बंगाल की खाड़ी के पड़ोस में भारत की समुद्री सीमाओं को मजबूत बनाता है। ये हमें कई देशों की समुद्री सीमा से जोड़ता है, जिनमें बांग्लादेश भी शामिल है। भारत का ये प्रोजेक्ट 10 अरब डॉलर से ज्यादा है और अमेरिका भी इस प्रोजेक्ट को भारतीय नौसेना की बड़ी क्षमता मानता है, इसीलिए अमेरिका के एक्टिविस्ट अंतर्राष्ट्रीय अखबारों में इस प्रोजेक्ट के खिलाफ खूब लिख रहे हैं। लेकिन भारत के लोगों को देश की सुरक्षा के लिए इस सैन्य प्रोजेक्ट के साथ खड़ा रहना चाहिए और ऐसे तत्वों का विरोध करना चाहिए, जो गलतफहमी फैला रहे हैं। हो सकता है, पर्यावरण को लेकर कुछ खतरें हों, लेकिन एक बात हमेशा याद रखने की जरूरत है कि देश हित से बढ़कर कुछ नहीं है और दुनिया का कौन सा देश अपने हित के लिए पर्यावरण की परवाह कर रहा है?

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