भारत ने दिखाई कूटनीतिक मजबूती

द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा

भारत ने दिखाई कूटनीतिक मजबूती

चीन के किंगदाओ में शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों के रक्षा मंत्रियों का सम्मेलन हाल ही संपन्न हुआ।

चीन के किंगदाओ में शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों के रक्षा मंत्रियों का सम्मेलन हाल ही संपन्न हुआ। भारत के दृष्टिकोण से यह सम्मेलन न केवल कूटनीतिक बल्कि रणनीतिक रूप से भी अहम रहा। क्षेत्रीय सुरक्षा और द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने का एक प्रमुख अवसर भी सिद्ध हुआ। आतंकवाद पर जारी संयुक्त घोषणापत्र पर भारत के हस्ताक्षर नहीं करने से उसे रद्द करना पड़ा। जो भारत की आतंकवाद के प्रति कूटनीतिक दृढ़ता की परिचायक है। सिंह की सम्मेलन में शिरकत ऐसे समय पर हुई जब वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीति में तेजी के साथ कई बदलाव देखने को मिल रहे हैं। यूक्रेन-रूस के बीच युद्ध जारी है। हाल ही ईरान और इजराइल के बीच युद्ध विराम हुआ है, लेकिन तनाव तो फिर भी जारी है।

चीन की बढ़ती आक्रामकता और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव जैसे मुद्दे चिंता का विषय बने हुए हैं। ऐसे में इस क्षेत्रीय संगठन के मंच पर भारत को अपने दृष्टिकोण और रणनीतिक हितों को स्पष्ट करने का अवसर मिला। सम्मेलन में भारतीय रक्षा मंत्री ने आतंकवाद के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा कि कुछ देश आतंकवाद को राज्य नीति के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यह विशेष रूप से पाकिस्तान को दिया गया तीखा राजनीतिक संदेश था। चीन का नाम लिए बगैर दुनिया को आगाह किया कि आतंकवाद पर दोहरे मापदंड अपनाने से बचना चाहिए।

चीन के प्रभाव वाले इस क्षेत्रीय संगठन में और उसकी ही अध्यक्षता में आयोजित हुए सम्मेलन में संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर सिंह ने पाकिस्तान के आतंकवादी मंसूबों को छिपाने के चीनी प्रयासों पर भी पानी फेर दिया। जबकि संगठन का मुख्य उद्देश्य आतंक और अलगाव के खिलाफ रणनीति बनाने और उनका समाधान निकालने का है। ऐसे में इन मुद्दों को लेकर संगठन में साफ दरारें दिखाई दीं। बता दें कि पाकिस्तान की शह पर पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत की ओर से शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर दौरान चीन ने पाकिस्तान को हथियार और खुफिया सूचनाएं देकर उसकी बड़ी मदद की थी। आश्चर्य इस बात का भी रहा कि दस सदस्यीय देशों वाले इस संगठन के संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर नहीं करने वाला भारत अकेला देश रहा।

संगठन में हर सदस्य के पास वीटो पावर है। वह इस पर हस्ताक्षर करे या ना करे। किसी एक के भी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर न होने पर वह पारित नहीं होता। भारत को उम्मीद थी कि इस प्रस्ताव में पहलगाम आतंकी हमले का हवाला शामिल होगा। लेकिन आश्चर्य बलूचिस्तान का हवाला जरूर था, लेकिन पहलगाम का कोई हवाला ही नहीं था। एक खास बात भारत ने जिस तरीके से आतंकवाद के मुद्दे को उठाया उसे उम्मीद थी रूस की ओर से मिलने वाले समर्थन से उसके पक्ष में संतुलन बहाल होगा। लेकिन रूसी मौन जरूर खला। यह भी सत्य है कि पाकिस्तान पूरी तरह चीनी सुरक्षा के कवच में आ चुका है।

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दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अपने दूसरे कार्यकाल में नजरिया बदल गया है। उनका अब पाकिस्तान के प्रति झुकाव दिख रहा है। ऐसे में भारत को अब विभिन्न वैश्विक मंचों पर अपने दम पर अपनी आवाज को प्रभावी तरीके से सतत उठाते रहना होगा। सम्मेलन के इतर भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अन्य सदस्य देशों के अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ताएं हुईं। सिंह की चीनी रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जून से हुई बातचीत में सीमा के स्थाई सीमांकन सहित चार प्रमुख कदमों पर जोर दिया गया। जो चार सुझाव मिले उनमें सीमा पर स्थापित तंत्र सक्रिय कर स्थाई हल निकाला जाने, स्थिरता के लिए अच्छे पड़ोसी जैसे हालात बनाने की जरूरत, एलएसी से वर्तमान व्यवस्थाओं के माध्यम से सैनिकों की वापसी, तनाव कम करने पर जोर दिया गया।

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सीमांकन मुद्दों पर प्रगति हासिल करने के लिए विभिन्न स्तरों पर परामर्श जारी रखने पर सहमति बनी। लेकिन चीन की अब तक की गतिविधियों को देखते हुए भारत को सदैव सतर्क बने रहना होगा। सिंह की रूस के रक्षा मंत्री आंद्रे बेलोसौव से हुई बातचीत में सुखोई-30 एमकेआई विमानों को अपग्रेड करने और एस-400 मिसाइल सिस्टम की शेष दो यूनिटों की जल्दी आपूर्ति पर बातचीत हुई। दरअसल भारत के पास करीब ढाई सौ सुखोई विमान हैं। इनको अपग्रेड करने के लिए बातचीत चल रही है। रूस इन विमानों के लिए अत्याधुनिक एएल41 इंजन देने को तैयार है, जो सुखोई57 में इस्तेमाल हो रहा है। इससे इन विमानों को नया जीवन मिल जाएगा।

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कुल मिलाकर भारत, एससीओ मंच को कनेक्टिविटी हब की तरह देखता है जो चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के मुकाबले एक वैकल्पिक संरचना खड़ी कर सकता है। इस बार सम्मेलन में भारत की ओर से चीन और पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से संतुलित संदेश दिया गया। संवाद के लिए तत्परता और आक्रामकता के विरुद्ध अपना स्पष्ट रुख जाहिर किया।

-महेश चंद्र शर्मा
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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