राज काज में क्या है खास, जानें
बढ़ रही है सूची
अब जुबां पर आई बात :
कई बातों को मन मसोस कर दिल में रखा जाता है, लेकिन जब हदें पार हो जाती हैं, तो दिल की बातें जुबां पर आए बिना नहीं रहतीं। अब देखो न, भगवा वाले भाई लोगों के राज में कुछ हाथ वालों की चवन्नी भी रुपए में चल रही थी। किसी को हटाने और लगाने के लिए उनका सिर्फ आंख का इशारा ही काफी है। भगवा वाले संगठन को संभाल रहे भाई साहब को कई दिनों से इसका पता भी था, लेकिन पार्टी के भीतर चल रहे माहौल की वजह से मन मसोस कर बैठने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं था। जब माहौल कुछ बदला-बदला सा नजर आने लगा और हदें पार हो गई, तो शनिवार को सुमेरपुर वाले भाई साहब की दिल की बातें भी जुबां पर आ गर्इं। अब राज के सलाहकारों को कौन समझाए कि इशारों को अगर समझो, राज को राज रहने दो।
चिन्ता में राज के रत्न :
इन दिनों राज के रत्न चिन्ता में डूबे हुए हैं। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन कोसों दूर है। वे न तो ठीक से खा पा रहे हैं और नहीं पी पा रहे। कुछ भाई लोगों के चेहरों पर तो चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी हैं। उनकी नींद उड़ना भी लाजिमी है, चूंकि मामला सात पीढ़ियों का जुगाड़ हाथ खिसकने से जुड़ा हुआ है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि ट्रांसफर इंडस्ट्री में लम्बे हाथ मार चुके कुछ रत्नों पर अब एमएलएल भी भारी पड़ रहे हैं, तभी तो पब्लिक में भी रत्नों के अवगुणों की ज्यादा पब्लिसिटी कर रहे हैं। जब से रिसफलिंग की हवा चली है, तब से राज के नवरत्न भी कुर्सी बचाने के लिए सवामणियां बोल रहे हैं।
बढ़ रही है सूची :
राज के रत्नों और राज का काज करने वालों के बीच छत्तीस का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। राज की कुर्सी से खाई पाटने की जुगत में है, लेकिन उनके नवरत्न कुछ समझना ही नहीं चाहते। राज का काज करने वाले कानून की दुहाई देकर सुशासन के नारे की याद दिलाते हैं। अब देखो न, नवरत्नों की लिस्ट में शामिल होने के लिए जूझ रहे ढूंढ़ाड़ से ताल्लुक रखने वाले भाई साहब को ऊपर वालों ने आंख से समझा दिया, लेकिन उनकी समझ में नहीं आई। गुजरे जमाने में ईडी और एसीबी के चक्कर लगा चुके साहब लोगों से अभी भी उम्मीद कर रहे हैं कि आंख बंद कर चिड़िया बिठा दे, चाहे दूध फट ही क्यूं न जाए। ऐसे में नवरत्नों से पिण्ड छुड़ाने वालों की सूची कम होने के बजाय लम्बी होती जा रही है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि सोमवार से मंगल के वक्री होने से ताल्लुक रखता है। जुमला है कि मंगल के वक्री होने पर ज्योतिष के जानकार भी अपने-अपने हिसाब से ऊर्जा, संघर्ष और सत्ता की राजनीति में उथल-पुथल का संकेत मान रहे हैं। पंडितों की मानें तो, ऐसे में मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक और मकर राशि वाले नेताओं की धड़कने कुछ तेज हो सकती हैं। किसी की कुर्सी डगमगा सकती है, तो किसी की महत्वाकांक्षा अचानक परवान चढ़ सकती है। बयानों के बाण भी उलटे पड़ सकते हैं, पुराने साथी नए समीकरण बना सकते हैं और बंद कमरों की फुसफुसाहटें सुर्खियां बन सकती हैं। सत्ता के गलियारों में सब ठीक है का राग अलापने वाले भी भीतर ही भीतर गणित बिठाए बिना नहीं रहेंगे। मंगल की वक्री चाल के बहाने राजनीतिक पंडितों की दुकान खुब चलेगी और नेताओं की नींद हल्की हुए बिना नहीं रहेगी। चूंकि राजनीति में ग्रहों से ज्यादा डर बदलते ग्रह नक्षत्रों यानी समर्थकों के मूड से ही लगता है।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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