राज काज में क्या है खास, जानें
बधाई के मायने
हवा और रुझान :
हवा और रुझान का पता नहीं चलता कि वह कब और किधर घूम जाए। अब देखो न सूबे में शहरी सरकारों के चुनावी रिजल्ट के बाद भगवा वाले भाई लोगों के जमीन पर पैर नहीं टिक रहे। हर किसी के मुंह से निकलता है कि अब तो हवा का रुख ही बदल गया है। सूबे में होने वाली गांवों की सरकारों की चुनावी जंग में भी हवा का रुख भगवा वालों की तरफ ही है। लेकिन हाथ वाले भाई लोग भी गांवों की सीटों पर अपनी हवा बरकरार रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर गुड़ बांटा जा रहा है तो सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नम्बर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर आने वाले भाई साहब गुनगुना रहे हैं कि मेरे कस्बे का चुनाव भी तेरे इश्क जैसा है, हवा इधर की थी, रुझान उधर का निकला।
तरीका-ए-मैसेज :
इधर राज के एक रत्न का बात करने का तरीका काफी फैमस हो रहा है। राज का काज करने वालों के साथ पार्टी के वर्कर भी अब उन्हें मैसेज वाले मंत्रीजी के नाम से जानने लगे हैं। शेखावाटी की माटी में जन्मे राज के यह रत्न खो-खो के बड़े शौकीन और मालधड़ी से मारने में माहिर हैं। चर्चा है कि वे मोबाइल पर बात करने के बजाय सिर्फ टेक्स्ट मैसेज को ही तवज्जो देते हैं। अब बेचारे वो भी क्या करे, उनके पास कोई चारा भी तो नहीं है। एक बार मोबाइल टेप के फेर में आकर बिना मतलब पसीने बहा चुके हैं। सो दूध का जला हुआ छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है।
नेताजी का उवाच :
नेताजी के मुंह से कब क्या निकल जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। भरोसा भी क्यों करें, वो नेता ही क्या जो उवाच नहीं करे, चाहे उसका अर्थ कुछ भी निकले। अर्थ निकालने वाले अपने हिसाब से निकालते रहे, उसका नेताजी पर कोई असर भी नहीं पड़ता। अब देखो न राज के एक रत्न का एक दौरे में मास्टरनियों के कपड़ों को लेकर ऐसा उवाच निकला कि आधी आबादी वालों से पिण्ड छुड़ाना मुश्किल हो गया। नेताजी को कतई उम्मीद नहीं थी कि उनके उवाच इतना असर दिखेगा कि गाड़ी में बैठकर भागने में ही भलाई समझी। और तो और दो सौ कोस से भी दिन रात सफाई देनी पड़ गई। अब बड़बोले नेताजी को कौन समझाए कि रतनगढ वाले भाभड़ा जी सीख लेते तो, यह दिन नहीं देखने पड़ते। नंबर दो की कुर्सी सम्भालने वाले हरि जी भाई साहब ने 35 साल पहले अपने श्रीमुख से निकले शब्दों को कई सालों तक भुगता था।
बधाई के मायने :
सूबे में भगवा वाली पार्टी के प्रभारी ने अटारी वाले भाई साहब को बधाई क्या दे दी कई खेमों के नेताओं की नींद ही उड़ गई। एक खेमे के नेता उंचा-नीचा ज्यादा ही हो रहे हैं, न वो ढंग से खा रहे है और नहीं पी रहे हैं। बेचारों की समझ में नहीं आ रहा कि आखिर माजरा क्या है। अब इन भाई लोगों को कौन समझाए कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। दिल्ली में बैठे गुजराती बंधु अपने हिसाब से काम करते हैं, घाटा होने से पहले ही काम के तरीकों को बदल देते हैं। दिल्ली वालों के इशारों पर पिछले दिनों कई सदरों में हुई अगवानी ने भी मैसेज देने में में कोई कसर नहीं छोड़ी। भाई लोग भी बधाई और अगवानी के मायने निकालने में कोई कंजूसी नहीं बरत रहे। चूंकि राजस्थान को राइज जो करना है। इसके मायने समझने वाले समझ गए, ना समझे वा अनाड़ी है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि हाथ वाले भाई लोगों में अचानक पैदा हुए जोश को लेकर है। जुमले को लेकर इन्दिरा गांधी भवन में बने भाई लोगों के ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स में काफी कानाफूसी है। जुमला है कि दो साल पहले ही आंदोलन तेज करने के पीछे कोई न कोई राज है। सुगबुगाहट तो यहां तक है कि हाथ वाले भाई लोगों को वहम है कि सामने वालों के खेमे में जो कुछ चल रहा है, उसमें बदलाव के संकेत है। बदलाव होगा या नहीं यह तो दीपावली के बाद ही पता चलेगा, लेकिन सुगबुगाहट खुद हाथ वाले भाई लोगों के ही गले नहीं उतर रही।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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