राज काज में क्या है खास, जानें
धड़कन हुई तेज
पहलवान बनाम पहलवान :
सूबे में शहरी सरकारों के चुनाव में दोनों दलों के नेताओं ने पहलवानी-पहलवानी खेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भगवा वाले भाई लोग तो रात-दिन इस खेल में काफी व्यस्त रहे। उनको न तो खाने की फिक्र थी और न पीने की। सभी लीडर ने अपने-अपने हिसाब से इसे खेला और एक-दूसरे को पटखनी देने में पूरा जोर लगाया। पहले तो उन्होंने पांच नदियों वाले पड़ोसी सूबे में दांवपेच लगाए और अब उनकी नजरें मरु प्रदेश पर टिकी हुई हैं। लेकिन सूबे में इस खेल में एक पहलवान ने अभी अपने दांवपेच नहीं बताए हैं। गुजरे जमाने में पहलवान से दूरी बनाए रखने वाले भगवा वाले भाई लोगों की मजबूरी अगले साल होनी वाली अपर हाउस की जंग है, जो पहलवान के बिना नहीं जीत सकते। सो भाई लोगों ने भी इस पहलवान को काबू में लेने का जिम्मा शेखावाटी वाले पहलवान पर छोड़ा है।
कंफ्यूज्ड ही कंफ्यूज्ड :
सूबे में भाजयुमो वाले कुछ भाई लोगों को समझ में नहीं आ रहा कि आखिर माजरा क्या है। वे यह तय नहीं कर पा रहे कि आखिर सलामी धनु राशि वाले साहब को ठोकें या फिर सिंह राशि वाले को गार्ड आॅफ आॅनर दे। पिछले 33 महीनों से ठाले बैठे हार्ड कोर वर्कर्स कंफ्यूज्ड हैं, सो कइयों ने तो ठिकाने की तरफ देखना भी बंद कर दिया। अब इन भाई लोगों को कौन समझाए कि जब मेष और वृश्चिक वाली जोड़ी ही कंफ्यूज्ड हो, तो दूर तलक सोचना, सिर्फ मुंगेरीलाल के सपनों की तरह है, वरना मरु भूमि में तो सबकुछ चौड़े में है कि तराजू का कौन सा पलड़ा भारी है। अब भाजयुमो वाले भाई लोग इसे समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।
धड़कन हुई तेज :
सूबे में इन दिनों बड़े लीडर्स की धड़कने अचानक बढ़ गईं। उपर-नीचे हो रही बीपी को नापने वाले डॉक्टरों के भी समझ में नहीं आ रहा कि कंट्रोल के लिए कौन सी टेबलेट दी जाए। चूंकि लीडर्स पर किसी भी गोली का असर नहीं हो रहा। हाथ वाले भाई लोगों की बीपी तो निकाय चुनावों में बढ़ गई, जब उनके मंसूबों पर पानी फिर गया और अगले राज दावेदारों की पोल खुल गई। भगवा वाले भाई लोगों की बीपी ऊपर वाले ने ऊंची-नीची कर रखी है, जो सिर्फ जयपुर से दिल्ली तक चक्कर लगवाने में ही राजी है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि अगर राज की कुर्सी के लिए एक-दूसरे की टांग खींचते रहे, तो बीपी तो बढ़ेगा, साथ में शुगर भी तोहफे में मिलेगा। पब्लिक का डण्डा अपना असर अलग से दिखाएगा। चूंकि ये पब्लिक है, सब जानती है, अपने नेताओं को पहचानती है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि कुकरमुत्ते, लाल डायरी और अफसरषाही से ताल्लूक रखता है। जुमला है कि जब से निकाय चुनावों के रिजल्ट आए हैं, तब हाथ वाले भाई लोगों का गुस्सा पहले ईवीएम पर सीधे अफसरषाही पर उतरता नजर आया। सबसे पहले जोधपुर वाले भाई ने अपनी जुबान खोली कि कैडर पर कलंक लगा दिया, तो लक्ष्मणगढ वाले भाई साहब एक कदम आगे निकल कर खाकी वाले साहब लोगों को पेड से बांधकर पीटने तक की बात कह दी। अलवर वाले भाई साहब ने तो अफसरों के नाम लाल डायरी में दर्ज करने तक ऐलान कर दिया। अब बेचारे अफसर सोच रहे है कि तबादलों की फाइल से डरें या लाल डायरी से। सियासत में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन अफसरों की कुर्सी अक्सर वहीं रहती है। फर्क बस इतना होता है कि कुर्सी पर बैठने वाले की नजर बदल जाती है। अब अफसरषाही के गलियारों में यह जुमला तेजी से चल रहा है कि चुनाव खत्म हो गए, लेकिन असली रिजल्ट अभी बाकी है क्या।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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