राज काज में क्या है खास, जानें
तबादलों की ट्रेन चली, लेकिन
वादों की पंचायत :
सूबे में पंचायत चुनावों की आहट क्या सुनाई दी, गांवों की राजनीति में वादों का मेला सज गया। सूबे में राज करने वाले दल ने अपने लीडर्स की मौजूदगी में ग्राम विकास संकल्प पत्र जारी कर रुरल के वोटर्स के सामने विकास की ऐसी थाली परोस दी, जिसमें सड़क भी है, पट्टा भी है, रोजगार भी है और गांवों का भविष्य सुधारने का सपना भी। वादों की इस बरसात में गांव वालों के मन में उम्मीदों के अंकुर फूटना लाजमी है। आखिर गांवों के मतदाता भी चाहता है कि उसकी सडक बरसात में तालाब नहीं बने, लेकिन चुनावी मौसम की एक पुरानी बीमारी भी है कि घोषणाओं का बुखार मतदान से पहले तेज चढता है और नतीजे आते-आते कई बार उतरने लगता है। राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में बतियाते हैं कि चुनावी थाली में परोसी गई ये चीजें वोटर्स तक कब पहुंचेगी, ये तो राम ही जाने, मगर भगवा वाले भाई लोगों ने पब्लिक को दिन में सपने दिखाने में कोई कसर नहीं छोडी।
राजनीति की खिड़की और निर्दलीय एंट्री :
गांवों की सरकार के इलेक्शन में टिकट की राजनीति भी कम दिलचस्प नहीं है। इसमें संगठन की परीक्षा तो होती ही है, परिवार की राजनीतिक विरासत, लोकल वर्कर्स की नाराजगी और समर्थकों की ताकत भी एक साथ मैदान में उतर आती है। अब देखो ना, सूबे की राजधानी से सटे जिले में ऐसा ही मामला चर्चा में रहा, जब राज के एक रत्न के बेटे ने निर्दलीय के रुप में ताल ठोक दी। अब इसे राजनीति का संयोग कहे या स्थानीय समीकरणों का प्रयोग, मंत्री के बेटे की निर्दलीय एंट्री ने चुनावी चर्चा को गर्मा दिया। बेचारे भगवा वाले भाई साहबों में अपने बचाव में मुंह खोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी, मगर उनके बयानों का सियासी मायने निकालने वालों के लिए कई परतें हैं।
क्रिकेट का मैच या बयान का बाउंसर :
पॉलिटिक्स में कभी कभी एक बयान इतना लंबा सफर तय करता है कि बोलने वाला कुछ कहता है, सुनने वाला कुछ समझता है और सोशल मीडिया उसे तीसरी मंजिल तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। अब देखो न, सूबे में बीते दिनों सुमेरपुर वाले भाई साहब की क्रिकेट को लेकर की गई टिप्पणी ने भी अपना रंग दिखा ही दिया। बात शुरू हुई एक प्रोग्राम में कही गई बात से और पहुंच गई भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक। अब बेचारे भाई साहब ने अपनी सफाई देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन दिल्ली वालों की लाल आंखें सामान्य होने का नाम ही नहीं ले रहीं। अब भाई साहब को कौन समझाए कि नेताओं को अपना मुंह खोलने पहले अगल-बगल वालों को टटोलना उतना ही जरूरी है, जितना घर से निकलते समय जेब खाली रखना।
तबादलों की ट्रेन चली, लेकिन :
सूबे की ब्यूरोक्रेसी में टंसफर केवल ऑफिस बदलने का नाम नहीं होता। इसके साथ नई जिम्मेदारी, नई कुर्सी, नया कार्यक्षेत्र और कभी-कभी पुराने कामकाज का नया हिसाब भी जुड़ा होता है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि जब डीओपी से ऑर्डर निकलते हैं, तो सचिवालय के गलियारों में चर्चों की रेल चल पड़ती है। पिछले दिनों पंचायत चुनावों की तैयारियों के बीच प्रषासनिक पदस्थापन भी चर्चा में रहा। इस सूची का इंतजार भी किसी चुनावी नतीजे से कम रोमांचक नहीं रहा। फर्क इतना सा था कि पब्लिक पूछ रही थी कि काम कब तक हो जाएगा और गलियारों में चर्चा थी कि कौन कहां जाएगा।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि दिवाली की मिठाई से पहले बकाया की थैली खोलने को लेकर है। जुमला है कि त्योहार आते ही बाजार में मिठाई, कपडेÞ और गिफ्ट की चर्चा बढ़ जाती है, लेकिन राज का काज करने वालों के लिए त्योहार की खुशी का एक दूसरा हिसाब भी होता है, जो लंबित भुगतान से ताल्लुक रखता है। उनके लिए दिवाली का असली उजाला तभी होता होगा, जब बकाया भुगतान की फाइल भी रोशनी देखे।
-एल.एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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