त्योहारों पर चरमराती परिवहन व्यवस्था, सुरक्षित सफर का इंतजार
राष्ट्रीय नीति और सुरक्षित सफर का अधिकार
भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे लोकतांत्रिक देश में नीतिगत सुधारों की घोषणाओं के बीच ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ जैसी योजनाएं राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बनी हैं। इस योजना ने करोड़ों प्रवासी मजदूरों को देश के किसी भी कोने में अपने हिस्से का अनाज पाने की सुविधा दी है। यह सराहनीय कदम है, जिसने प्रशासनिक सीमाओं को तोड़कर गरीब नागरिकों को उनका बुनियादी हक दिया। लेकिन सवाल यह है कि यदि श्रमिक किसी भी राज्य में राशन पा सकता है, तो उसी देश में एक राज्य से दूसरे राज्य तक सुरक्षित, सुगम और सम्मानजनक सफर क्यों नहीं कर सकता? अक्टूबर-नवंबर में दुर्गा पूजा, दिवाली, छठ और शादियों के मौसम में मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, सूरत और हैदराबाद जैसे महानगरों के रेलवे स्टेशन भीड़ और अफरा-तफरी के केंद्र बन जाते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान जाने वाले श्रमिकों की भीड़ प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों को उजागर करती है। यह किसी एक शहर या मार्ग की समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का संकट है।
अर्थव्यवस्था की रीढ़, लेकिन सफर असुरक्षित :
देश के बड़े महानगरों का बुनियादी ढांचा, निर्माण क्षेत्र, कारखाने, लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी सेवाएं प्रवासी श्रमिकों के श्रम पर टिकी हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान पैदल घर लौटते श्रमिकों की बेबसी सामने आई थी, लेकिन 2026 में भी उनके सुरक्षित आवागमन की समस्या का ठोस समाधान नजर नहीं आता। जब अर्थव्यवस्था में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण है, तो एकीकृत राष्ट्रीय प्रवासन पारगमन नीति का अभाव क्यों है? रेलवे हर साल सैकड़ों या हजारों ‘फेस्टिवल स्पेशल’ ट्रेनें चलाने का दावा करता है, लेकिन मांग के मुकाबले इनकी संख्या अपर्याप्त साबित होती है। जनरल डिब्बों में चढ़ने के लिए यात्रियों को जद्दोजहद करनी पड़ती है। दरवाजों पर लटकना, बच्चों को खिड़कियों से अंदर पहुंचाना और पुलिस की लाठियां झेलना कई यात्रियों की मजबूरी बन जाती है। डिब्बों में क्षमता से कई गुना अधिक भीड़ के कारण दम घुटने और भगदड़ जैसी घटनाओं में जान जाने का खतरा रहता है। क्या त्योहार मनाने या पारिवारिक समारोह में शामिल होने के लिए यात्रा करने वाले नागरिक को अपनी जान जोखिम में डाले बिना सफर करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए?
आधुनिक रेल, महंगा टिकट और दलालों का जाल :
एक तरफ रेलवे वंदे भारत, अमृत भारत और बुलेट ट्रेन जैसी आधुनिक रेल सेवाओं पर भारी निवेश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ सामान्य यात्रियों के लिए पर्याप्त जनरल डिब्बों और किफायती यात्रा की व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। रेलवे के आधुनिकीकरण में आम नागरिक की जरूरतों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। तत्काल और नियमित आरक्षण के दौरान आईआरसीटीसी पर सीटें कुछ ही सेकंड में भर जाती हैं और यात्रियों को लंबी वेटिंग लिस्ट का सामना करना पड़ता है। डिजिटल व्यवस्था से अनजान या कम पढ़े-लिखे श्रमिकों के लिए टिकट बुक करना भी कठिन होता है। इसका फायदा टिकटों की कालाबाजारी करने वाले दलाल उठाते हैं। दिन में चार-पांच सौ रुपये कमाने वाले श्रमिक को कन्फर्म टिकट के लिए अपनी महीनों की कमाई खर्च करनी पड़ सकती है। रेलवे से टिकट नहीं मिलने पर निजी बसें विकल्प बनती हैं, लेकिन त्योहारों के दौरान दिल्ली से पटना, सूरत से गोरखपुर और बेंगलुरु से भुवनेश्वर जैसे मार्गों पर किराए कई गुना बढ़ जाते हैं। दो हजार रुपये का टिकट दस हजार रुपये तक पहुंचने की स्थिति में राज्य परिवहन विभागों की जिम्मेदारी और निगरानी पर भी सवाल उठते हैं। गरीब यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाना खुली लूट से कम नहीं है।
राष्ट्रीय नीति और सुरक्षित सफर का अधिकार :
यह संकट प्रशासनिक विफलता के साथ राजनीतिक बेरुखी को भी उजागर करता है। बिहार, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों से बड़े पैमाने पर पलायन होता है, लेकिन श्रमिकों की यात्रा संबंधी परेशानियों के समय जिम्मेदारी अक्सर केंद्र और दूसरे राज्यों पर डाल दी जाती है। दूसरी ओर, जिन राज्यों में ये श्रमिक काम करते हैं, वहां भी संकट के समय उन्हें बाहरी या दोयम दर्जे का नागरिक मानकर छोड़ दिया जाता है। यदि हम ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का दावा करते हैं, तो प्रत्येक नागरिक की सुरक्षित आवाजाही और गरिमा सुनिश्चित करनी होगी। केंद्र सरकार को ऐसी पारदर्शी राष्ट्रीय यात्री प्रबंधन प्रणाली विकसित करनी चाहिए, जो त्योहारों और शादी के मौसम में यात्रियों की संभावित संख्या का आकलन कर ट्रेनों के फेरे और जनरल कोच बढ़ाने की योजना बनाए। तत्काल टिकट प्रणाली को दलालों से मुक्त करने के लिए सुरक्षा ऑडिट और कड़े कानूनी कदम उठाने होंगे। राज्यों के परिवहन निगमों को भी मिलकर अंतरराज्यीय मार्गों पर सस्ती और सुरक्षित बस सेवाएं उपलब्ध करानी चाहिए, ताकि निजी ऑपरेटरों की मनमानी पर रोक लगे। जब तक श्रमिकों को भेड़-बकरियों की तरह सफर करने के लिए मजबूर किया जाता रहेगा, तब तक आधुनिक ट्रेनों, चमकते स्टेशनों और डिजिटल इंडिया के दावे अधूरे रहेंगे। भारत की आत्मा उसके श्रमिकों की गरिमा और सुरक्षित सफर में बसती है। अब तंत्र को अपनी आंखें खोलनी ही होंगी।
- अशोक भाटिया
(वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार)
यह लेखक के अपने विचार हैं

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