डोनाल्ड ट्रंप के अजीब फैसलों से दुनिया बेचैन

भारतीय आईटी कंपनियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर रोक

डोनाल्ड ट्रंप के अजीब फैसलों से दुनिया बेचैन
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अजीब फैसलों से इन दिनों पूरी दुनिया हैरान है। एक ओर वे रूस से तेल खरीदने वाले भारत, चीन जैसे देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने पर आमादा हैं तो दूसरी ओर वे रूस के साथ डीजल खरीद का समझौता कर रहे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अजीब फैसलों से इन दिनों पूरी दुनिया हैरान है। एक ओर वे रूस से तेल खरीदने वाले भारत, चीन जैसे देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने पर आमादा हैं तो दूसरी ओर वे रूस के साथ डीजल खरीद का समझौता कर रहे हैं और तो और भारतीय आईटी कंपनियां-टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल और कॉग्निजेंट के साथ कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट तथा एडोबी की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर रोक लगा रहे हैं।

मध्यावधि चुनावों का दबाव :

जहां तक सवाल है ईरान युद्ध या रूस से डीजल खरीद से जुड़े समझौते के पीछे अगले माह देश में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों का उन पर दबाव बना हुआ है। देश में बढ़ती ऊर्जा कीमतों को वे रूसी डीजल खरीद से रोकना चाह रहे हैं। ऐसे में वैश्विक व्यापारिक और कूटनीतिक मंचों पर सवाल खड़े होंगे ही कि अमेरिका के लिए जो स्वीकार्य है, वह अन्य देशों के लिए दंडनीय कैसे हो सकता है?

ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर रोक :

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खैर, हम केंद्रित होते हैं-भारतीय आईटी कंपनियों के ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर रोक के मुद्दे पर। यह फैसला ऐसे वक्त पर लिया गया जब दोनों देशों के बीच विभिन्न मुद्दों को लेकर तनाव की स्थितियां बनी हुई हैं। ऐसे में यह फैसला केवल आव्रजन नीति से जुड़ा मामला भर नहीं है, बल्कि यह भारत-अमेरिका के आर्थिक संबंधों के साथ रोजगार संरक्षण, कुशल पेशेवरों के अधिकारों और वैश्विक तकनीकी उद्योग के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है।

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बोलों से तनाव :

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फैसले की घोषणा के वक्त अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने विदेशी पेशेवरों की तुलना बंधुआ मजदूरों की रूप में की। तो श्रम मंत्री कीथ सॉन्डरलिंग ने सांप का सिर काटने से की। भारत ने इन नेताओं के व्यक्त किए गए शब्दों पर कड़ा रोष जताया। इसे पूरी तरह से बेबुनियाद और बेहद अपमानजनक करार दिया। भारतीय पेशेवर उच्च स्तर के शिक्षित और कुशल कर्मी हैं। अमेरिका का इतिहास प्रवासियों की कई पीढ़ियों से बना है। उनकी कड़े उद्यम और इनोवेशन से अमेरिका की तरक्की तथा खुशहाली बढ़ी है।

खैर, इस घोषणा के साथ अब इन कंपनियों से जुड़े नए और लंबित पीईआरएम आवेदनों पर अमल नहीं होगा। पीईआरएम में कंपनी को साबित करना होगा है कि अमेरिका में कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं या नियुक्ति से अमेरिकी रोजगार और वेतन पर कोई असर नहीं होगा। ट्रंप का आरोप है कि यह कंपनियां अमेरिकियों के बदले सस्ते विदेशी कर्मी भर्ती कर उन्हें अमेरिका की नागरिकता दिला रही हैं।

असर कम होना संभव :

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी सरकार के इस फैसले का आईटी उद्योग पर बहुत ज्यादा असर पड़ने की संभावना नहीं है क्योंकि आवेदनों की संख्या पहले ही काफी कम हो गई है। करीब दो फीसदी रह गई है। लेकिन अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर सकती हैं और अमेरिकी नागरिकों के रोजगार के अवसरों तथा वेतन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

अमेरिकी श्रम विभाग के अनुसार संबंधित कंपनियों के खिलाफ श्रम भर्ती और वीजा प्रक्रियाओं में संभावित अनियमितताओं की जांच की जा रही है। लेकिन किसी कंपनी के खिलाफ आरोप लगाना और उसका दोष कानूनी रूप से सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए इन कंपनियों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए।

अमेरिकी बाजार बड़ा :

भारत की प्रमुख आईटी कंपनियों का अमेरिकी बाजार में बड़ा कारोबार है। अमेरिकी कंपनियों को सॉफ्टवेयर विकास, डिजिटल सेवाएं, साइबर सुरक्षा, क्लाउड कंप्यूटिंग और तकनीकी परामर्श उपलब्ध कराने के लिए भारतीय कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस फैसले से इन कंपनियों की कारोबारी गतिविधियां तत्काल बंद नहीं होंगी और न ही उनके सभी अमेरिकी कर्मचारियों के वीजा स्वत: रद्द होंगे।

विश्लेशकों को निकट भविष्य में भारतीय आईटी कंपनियों के राजस्व पर बड़े प्रत्यक्ष प्रभाव की आशंका सीमित दिखाई देती है। इसका एक कारण यह है कि कंपनियां पहले की तुलना में स्थानीय अमेरिकी नियुक्तियों और वैकल्पिक कर्मचारी व्यवस्थाओं पर अधिक निर्भर हो रही हैं। फिर भी दीर्घकालीन जोखिम बने हुए हैं।

यदि कर्मचारियों को अमेरिका में स्थाई निवास का भरोसा नहीं मिलता तो कंपनियों के लिए प्रतिभाषाली कर्मचारियों को लंबे समय तक अपने साथ बनाए रखना कठिन हो सकता है। इससे भर्ती, प्रषिक्षण और कर्मचारियों के स्थानांतरण की लागत बढ़ सकती है। ग्राहकों की परियोजनाओं को प्रभावित होने से बचाने के लिए कंपनियों को अपनी मानव संसाधन नीतियों में भी बदलाव कराना पड़ सकता है।

भारत के लिए सबक :

इस घटनाक्रम से भारतीय कंपनियों को तीन महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। पहला-अमेरिकी बाजार में कारोबार के साथ-साथ स्थानीय नियुक्तियों और विभिन्न देशों में कार्यबल के संतुलित वितरण पर ध्यान देना होगा। दूसरा-वीजा और श्रम कानूनों की अनुपालना, पारदर्शी भर्ती तथा कर्मचारियों के अधिकारों को अपने कर्मचारियों के लिए वैकल्पिक कानूनी और रोजगार संबंधी विकल्पों की जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए।

देश के लिए अवसर भी :

इस घटनाक्रम का एक दूसरा पक्ष भी है। यदि अमेरिका में स्थाई निवास और रोजगार संबंधी अनिश्चितता बढ़ती है, तो भारत को अपने अनुभवी तकनीकी विषेषज्ञों को वापस आकर्षित करने का अवसर मिल सकता है। भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर डिजाइन और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

माहौल बनाना होगा :

सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर ऐसी नौकरियां तथा शोध सुविधाएं विकसित करें जिनसे विदेश में अनुभव प्राप्त करने वाले भारतीय पेशेवर देश में लौटकर काम करना पसंद करें। हालांकि केवल विदेश में पैदा हुई कठिनाइयों से भारत को लाभ नहीं मिल जाएगा। इसके लिए प्रतिस्पर्धी वेतन, बेहतर शोध वातावरण, मजबूत तकनीकी बुनियादी ढांचा और उच्च गुणवत्ता वाली नौकरियां जरूरी हैं।

-महेश चंद्र शर्मा

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