पंचायत चुनाव में कांग्रेस की दोहरी चुनौती, टिकट भी साधने हैं और गांवों के मुद्दे भी
घोषणा पत्र में स्थानीय समस्याओं को जगह देने पर मंथन
जयपुर। राजस्थान में पंचायती राज चुनाव को लेकर कांग्रेस की तैयारी अब उम्मीदवारों के चयन से आगे बढ़कर संगठनात्मक पकड़ और ग्रामीण मुद्दों को चुनावी एजेंडे में बदलने की दिशा में बढ़ रही है। पार्टी के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्य पदों के लिए दावेदारों में से ऐसे उम्मीदवार चुनने हैं, जिन्हें संगठन का समर्थन मिलने के साथ स्थानीय स्तर पर भी स्वीकार्यता हो। 41 जिला पर्यवेक्षकों और 457 पंचायत समितियों के लिए समन्वयकों की नियुक्ति इसी व्यापक तैयारी का हिस्सा है।
टिकट चयन में जनाधार की परीक्षा : कांग्रेस ने दावेदारों से ऑनलाइन आवेदन लेकर उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि, संगठन में सक्रियता, पूर्व चुनावी अनुभव, पारिवारिक राजनीतिक जुड़ाव और सोशल मीडिया पर सक्रियता जैसी जानकारियां जुटाने की प्रक्रिया अपनाई है। जाति और संबंधित क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या का ब्यौरा मांगा है।
गुटबाजी संभालने की चुनौती : पर्यवेक्षकों को इस ढांचे का उद्देश्य केवल दावेदारों की जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि स्थानीय संगठन के साथ तालमेल बनाना और टिकट चयन से जुड़े विवादों को संभालना है। पंचायत चुनावों में स्थानीय रिश्ते, जातीय समीकरण, व्यक्तिगत राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता कई बार पार्टी के व्यापक एजेंडे पर भारी पड़ते हैं। ऐसे में पर्यवेक्षकों के लिए चुनौती यह होगी कि वे स्थानीय नेताओं के बीच संतुलन बनाते हुए उम्मीदवारों के चयन में विवाद कम कर सकें।
स्थानीय मुद्दों को एजेंडे हो सकते है शामिल : कांग्रेस की चुनावी रणनीति के तहत ग्रामीण समस्याओं में खाद बीज की उपलब्धता, सिंचाई के लिए बिजली-पानी, पेयजल, ग्रामीण सड़कें, सफाई और पशुपालकों को दूध के भुगतान व बोनस जैसे विषय पंचायत चुनावों में प्रासंगिक हो सकते हैं।

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