राज काज में क्या है खास, जानें
अब सताने लगा डर
चर्चा में कागज का टुकड़ा :
सूबे में इन दिनों कागज का एक टुकड़ा काफी चर्चा में है। चर्चा भी दोनों दलों के ठिकानों पर है, लेकिन सबसे ज्यादा चटकारे इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर है। एफआईआर के लिए दिल्ली से राजकुमार का संदेश मिलने के बाद बेचारे सूबे के हाथ वाले लीडर्स ने पुलिस कमिश्नरेट में 48 घंटे तक धरना दिया। बेचारों ने गद्दे भी वहीं बिछाए, दिन-रात नारे भी लगाए और उम्मीद भी पाली कि आखिर खाकी वाले साहब लोगों तक फरियाद पहुंच जाएगी। मगर हुआ वो ही, जो अक्सर सियासत में होता है। बेचारों को माया मिली न राम। एफआईआर तो दर्ज नहीं हुई, उलटे सूबे के सदर लक्ष्मणगढ़ वाले भाई साहब अपने पैरों में फ्रैक्चर करवा बैठे। धरने का हस्र पूछो, तो बस एक कागज का टुकड़ा। खाकी वाले साहब लोगों ने भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई और एक कागज थमाया तथा चलता किया। अब बेचारे हाथ वाले लीडर्स दुविधा में हैं कि इस कागज को कुर्ते की बाईं जेब में रखे या दाईं में। सामने वाली जेब में रखने का सवाल ही नहीं, क्योंकि वहां तो उम्मीदों की गठरी पहले से ही रखी है। अब उनकी समझ में नहीं आ रहा कि यह जीत का दस्तावेज है या बेबसी की रसीद।
अब सताने लगा डर :
सूबे में इन दिनों सत्ताधारी दल के कई लीडर्स को डर सताने लगा है। सताए भी क्यों नहीं, मामला सीधा-सीधा हार्डकोर यूथ वर्कर्स से ताल्लुक रखता है। अब देखो न, राज के रत्नों में शामिल मैडम ने पिछले दिनों वर्कर्स को हड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनका हड़काना भी लाजिमी था, चूंकि चुनाव तो मैडम को ही लड़ना है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर चर्चा है कि शहरी सरकारों के चुनाव से पहले मैडम के आगे पीछे मंडराने वाले यूथ लीडर्स की कोई कमी नहीं थी, चूंकि उनको मैडम से काफी उम्मीदें थी। बेचारे मैडम के पिंकसिटी के बाहर के दौरों में भी खुद की गाड़ियों के साथ जाने में कोई कंजूसी नहीं बरतते थे। लेकिन अब नजारा उलटा हो गया। पिछले दिनों उत्सव के एक कार्यक्रम में मैडम ने दौरे पर दलबल के साथ चलने के लिए हार्डकोर वर्कर्स से कहा, तो वर्कर्स ने भी टिकट नहीं देने का बहाना बनाकर कन्नी काटने में कोई देरी नहीं की। अब राज के रत्नों को कौन समझाए कि ये वर्कर्स हैं, ये सब जानते हैं, और सब पहचानते हैं।
कुर्सी के दावेदार और फाइलों की फनकार :
सूबे की राजनीति में इन दिनों वोटर लिस्ट भी ऐसी हो गई है जैसे मोहल्ले की वह पुरानी रजिस्टर-बही, जिसे देखकर हर पार्टी कहती है कि पहले मेरा हिसाब देखो, दूसरे का बाद में। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि सूबे में राज करने वाली भगवा वाली पार्टी ने एसआईआर को लेकर हाथ वाले भाई लोगों के आरोपों का जवाब देने के लिए अभियान चलाने तक का ऐलान कर दिया। नाम भी अंग्रेजी में ऐसा रखा कि सुनने वाला भी पहले उसका मतलब पूछे और फिर राजनीतिक मंशा समझने बैठे कि सेव डेमोक्रेसी, रिमूव मोबोक्रेसी। लेकिन राज की असली परीक्षा यह होगी कि अभियान में नियमों की जानकारी कितनी दी जाती है और राजनीतिक आरोपों का शोर कितना रहता है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि राज का काज करने वाले बाबुओं से ताल्लुक रखता है। जुमला है कि राज के एक फरमान से बाबुओं की अचानक धड़कनें बढ़ गईं। बेचारों की धड़कनें बढनी भी लाजिमी है, चूंकि अब वेतन निर्धारण की पुरानी फाइलें और सर्विस बुक फिर से जांच के दायरे में रहेगी। वेतन निर्धारण कोई मामूली गणित नहीं है। एक छोटी से गलती भी फ्यूचर में मिलने वाले वित्तीय लाभों पर असर डाल सकती है। इसलिए इस बार फाइलों को अलमारी में सुलाने के बजाय उनका हिसाब समय पर दुरुस्त करना ही समझदारी होगी। अब इस जुमले को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।
-एल.एल. शर्मा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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