सामाजिक सद्भाव की परीक्षा और नेपाल सरकार की विफलता
विघटनकारी ताकतों को नाकाम करें
नेपाल, जिसे दुनिया बुद्ध की शांति-भूमि और बहुसांस्कृतिक सह-अस्तित्व के एक अनुपम उदाहरण के रूप में जानती है, आज एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। भारत के बिहार राज्य की सीमा से सटे सुनसरी जिले के कप्तानगंज से शुरू हुई चिंगारी ने देखते ही देखते मधेश और कोशी प्रांत के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। सावन के पवित्र महीने में पारंपरिक बोलबम/कांवड़ यात्रा के दौरान लाउडस्पीकर बजाने और धार्मिक झंडों के प्रदर्शन को लेकर उपजा एक मामूली सा विवाद आज एक भयावह सांप्रदायिक हिंसा का रूप अख्तियार कर चुका है। इस हिंसा में अब तक तीन बेगुनाह नागरिकों ओम प्रकाश मेहता, जय प्रकाश मेहता और गणेश यादव की जान जा चुकी है, जबकि दर्जनों सुरक्षाकर्मी और आम नागरिक गंभीर रूप से घायल हैं। कई जिलों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू, इंटरनेट सेवाओं पर आंशिक पाबंदी और सड़कों पर गश्त करती सेना इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि नेपाल का सामाजिक ताना-बाना इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। यह विवाद 26 जुलाई 2026 की रात सुनसरी जिले की देवानगंज ग्रामीण नगरपालिका के कप्तानगंज इलाके में तब शुरू हुआ, जब दो अलग-अलग समुदाय अपने धार्मिक आयोजन कर रहे थे। एक पक्ष की धार्मिक यात्रा के दौरान लाउडस्पीकर की आवाज और प्रतीकों के प्रदर्शन को लेकर दोनों गुटों में तीखी बहस हुई, जो जल्द ही हिंसक झड़प में बदल गई।
खुफिया तंत्र की घोर लापरवाही :
स्थानीय प्रशासन और खुफिया तंत्र की घोर लापरवाही के कारण इस शुरुआती विवाद को समय रहते शांत नहीं किया जा सका। स्थिति तब और अनियंत्रित हो गई जब उग्र भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग और गोलीबारी का सहारा लेना पड़ा, जिसमें एक स्थानीय युवक की मौत हो गई। इस मौत की खबर आग की तरह फैली और इसने सुलगते असंतोष को पूरे क्षेत्र में भड़का दिया। इसके बाद हिंसा का यह दौर सुनसरी से निकलकर सिराहा, धनुषा, पर्सा और जनकपुरधाम जैसे प्रमुख व्यावसायिक और सांस्कृतिक केंद्रों तक पहुंच गया। कई स्थानों पर आगजनी, तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की घटनाएं सामने आईं, जिससे आम जनजीवन पूरी तरह ठप हो गया है। दरअसल यह हिंसा केवल दो समुदायों की आपसी कट्टरता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह नेपाल के प्रशासनिक और सुरक्षा तंत्र की एक बहुत बड़ी विफलता है। सुरक्षा मामलों के जानकारों और पूर्व अधिकारियों का भी मानना है कि सुनसरी की घटना से काफी पहले ही तराई के इलाकों में सांप्रदायिक तनाव के स्पष्ट संकेत मिल रहे थे। लेकिन स्थानीय प्रशासन, नेपाल पुलिस और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों ने इन चेतावनियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। जब कोई संवेदनशील धार्मिक त्योहार या यात्रा आयोजित होती है, तो प्रशासन का यह प्राथमिक कर्तव्य होता है कि वह पहले से ही दोनों पक्षों के प्रबुद्ध नागरिकों के साथ बैठकें करे, रूट तय करे और लाउडस्पीकर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कड़े नियम लागू करे। कप्तानगंज में ऐसा कोई पूर्व-नियोजित प्रयास दिखाई नहीं दिया।
इस हिंसा का प्रभाव :
जब हिंसा भड़की, तो केंद्र सरकार की ओर से त्वरित राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप बेहद देरी से हुआ। पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल 'प्रचंड' सहित कई सांसदों ने संसद में सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सवाल उठाया है कि जब मधेश जल रहा था, तब देश के शीर्ष नेतृत्व ने सर्वदलीय बैठक और शांति बहाली के प्रयासों में इतनी देरी क्यों की। तराई-मधेश क्षेत्र में भड़की इस हिंसा का प्रभाव केवल नेपाल की आंतरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने भारत-नेपाल की खुली सीमा की संवेदनशीलता और दोनों देशों के बीच चलने वाले द्विपक्षीय व्यापारिक गलियारे के सामने भी गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। सुनसरी, पर्सा और सिराहा जैसे अशांत जिले भारत के बिहार राज्य के सीमावर्ती इलाकों से सीधे जुड़े हुए हैं। इस भू-राजनीतिक जुड़ाव के कारण नेपाल में उपजा कोई भी सांप्रदायिक या सामाजिक तनाव बहुत तेजी से सीमा पार भारतीय क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सकता है। इससे भी बड़ा संकट आर्थिक मोर्चे पर दिखाई दे रहा है। रक्सौल-वीरगंज, जोगबनी-विराटनगर और जयनगर-जनकपुर जैसे प्रमुख व्यापारिक मार्ग नेपाल की जीवनरेखा माने जाते हैं। नेपाल अपनी दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं, ईंधन, दवाओं और औद्योगिक कच्चे माल के लिए 70 प्रतिशत से अधिक भारत से होने वाले आयात पर निर्भर है।
विघटनकारी ताकतों को नाकाम करें :
मधेश में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू, सड़कों पर तोड़फोड़ और असुरक्षा के माहौल के कारण मालवाहक ट्रकों के पहिए थम गए हैं। सीमा पार माल की आवाजाही रुकने से नेपाल के बाजारों में आवश्यक वस्तुओं की किल्लत होने लगी है, जिससे महंगाई बेलगाम होने का खतरा पैदा हो गया है। चार दिनों के भारी तनाव और चौतरफा दबाव के बाद प्रधानमंत्री बालिंद्र (बालेन) शाह ने अंततः राष्ट्र को संबोधित किया। उन्होंने देशवासियों से धैर्य, सहिष्णुता और आपसी सद्भाव बनाए रखने की भावुक अपील की है। नेपाल इस समय एक चौराहे पर खड़ा है। कर्फ्यू और संगीनों के साये में कायम की गई शांति कभी भी स्थायी नहीं हो सकती। यदि तराई-मधेश में स्थायी शांति बहाल करनी है, तो बहुस्तरीय प्रयास करने होंगे। अब समय आ गया है कि नेपाल का नागरिक समाज, सरकार और आम जनता एकजुट होकर इन विघटनकारी ताकतों को नाकाम करें। बंदूक की गोलियों और कर्फ्यू के साये से बाहर निकलकर, संवाद और सहिष्णुता के रास्ते पर चलकर ही नेपाल फिर से शांति के पथ पर अग्रसर हो सकता है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कप्तानगंज जैसी पुनरावृत्ति देश के किसी भी कोने में न हो।
-अशोक भाटिया
यह लेखक के अपने विचार हैं

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