न्यायपालिका में नारी शक्ति का नया अध्याय : बदल रही न्यायपालिका की तस्वीर,  बेटियों के हाथ में न्याय की कमान

गरिमा में सेवा का भी आकर्षण

न्यायपालिका में नारी शक्ति का नया अध्याय : बदल रही न्यायपालिका की तस्वीर,  बेटियों के हाथ में न्याय की कमान
अदालतों में महिला सशक्तिकरण की नई तस्वीर सामने आई। जयपुर महानगर प्रथम व द्वितीय की अदालतों में कुल 108 महिला न्यायाधीश कार्यरत, पुरुषों से अधिक। विशेषज्ञों के अनुसार, आरजेएस परीक्षा में बेटियों के लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन, पारदर्शी चयन प्रक्रिया और न्यायिक सेवा की गरिमा के कारण छात्राओं का रुझान तेजी से बढ़ा।

जयपुर। राजस्थान की न्याय व्यवस्था में महिला सशक्तिकरण की एक ऐसी ऐतिहासिक तस्वीर उभरकर सामने आई है, जिसने पुरुष प्रधान व्यवस्था के पुराने ढर्रे को पूरी तरह बदल दिया है। पिंक सिटी की अदालतों में अब महिलाओं का दबदबा सिर्फ  मुकदमों की पैरवी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इंसाफ  की कुर्सी पर भी बेटियां मजबूती से विराजमान हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक जयपुर महानगर प्रथम और द्वितीय कोर्ट को मिलाकर महिला न्यायाधीशों का आंकड़ा 100 के पार कर कुल 108 पर पहुंच गया है। आंकड़ों का विश्लेषण करें तो जयपुर महानगर प्रथम में वर्तमान में कार्यरत कुल 94 जजों में से 61 महिला जज हैं। यानि, यहां करीब 65 फीसदी न्यायपीठों की कमान महिलाओं के हाथों में है। वहीं जयपुर महानगर द्वितीय में भी यही रुख देखने को मिल रहा है। जहां कुल 84 न्यायाधीशों में से 47 पदों पर महिला जज सेवाएं दे रही हैं। दोनों ही महानगर अदालतों में महिलाओं की यह संख्या पुरुष जजों की तुलना में काफी अधिक है, जो न्यायिक सेवा में एक बड़े वैचारिक और सामाजिक बदलाव का संकेत है।

आरजेएस परीक्षा में बेटियों का क्लीन स्वीप :

अदालतों में महिला न्यायाधीशों की यह भारी संख्या कोई संयोग नहीं है, बल्कि पिछले कई सालों से राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा में बेटियों की कड़ी मेहनत और प्रतिभा का नतीजा है। आरजेएस भर्ती परीक्षाओं के पिछले 4 भर्तियों के परिणाम बताते हैं कि मेरिट सूची के शीर्ष 10 स्थानों पर हर बार लड़कियों ने एकतरफा कब्जा किया

क्यों बदल रहा है ट्रेंड ?

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कानूनविदों का मानना है कि न्यायिक सेवा में मिल रहे पारदर्शी माहौल और सुरक्षा के कारण कानून की पढ़ाई करने वाली छात्राओं की पहली पसंद जज बनना है। पिछले एक दशक में राजस्थान की न्यायिक व्यवस्था में बेटियों का चयन प्रतिशत कभी 57 फीसदी से नीचे नहीं गिरा है। न्याय के इस मंदिर में आधी आबादी की यह मजबूत मौजूदगी आम फरियादियों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में अधिक संवेदनशील और त्वरित न्याय की उम्मीद जगाती है।

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गरिमा में सेवा का भी आकर्षण :

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इस संबंध में जवाहर नगर निवासी अधिवक्ता कुसुमलता अग्रवाल का कहना है कि बीते कुछ सालों विधि क्षेत्र में लडकियों का रुझान बढा है। इसके साथ ही जज के तौर पर गरिमामय सेवा भी आकर्षण के कारणों में से एक है।

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