राजस्थान में नहीं पढ़ाई जा रही- ‘झांसी की रानी की कहानी’, पाठ्यक्रम में शामिल नहीं
दैनिक नवज्योति ने खंगाली सरकारी स्कूलों की हिन्दी की पुस्तक
जयपुर। देशभक्ति के उबाल के समय यह हैरानीजनक है कि प्रदेश के स्कूलों की किसी भी कक्षा में महान कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की कालजयी कविता ‘बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह झांसी वाली रानी थी...’ नहीं पढ़ाई जा रही। आजादी के बाद राजस्थान की कई पीढियों ने कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘बुंदेले हरबोलों के मुंह, हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह झांसी वाली रानी थी...’ सुनकर जवान हुई, लेकिन अब यह कविता कक्षा एक से लेकर बारहवीं कक्षा तक हिन्दी में नहीं पढ़ाई जा रहीं हैं।
कविता कुछ इस तरह रची थी सुभद्रा चौहान ने :
‘सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकृटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दर फि रंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन् सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।’
क्या पढ़ाया जाएगा, यह पाठ्यक्रम निर्माण समिति तय करती है। पिछली सरकार में भी पाठ्यक्रम निर्माण समिति ने तय किया था और इस सरकार में भी पाठ्यक्रम निर्माण समिति ने तय किया होगा। लेकिन हिन्दी साहित्य और स्वतंत्रता आन्दोलन के समय और बाद में कविता का काफी महत्व रहा है।
-प्रो.बीएम शर्मा, पूर्व अध्यक्ष, पाठ्यक्रम निर्माण समिति
कौन थी सुभद्रा कुमारी चौहान :
चौहान का जन्म 16 अगस्त, 1904 इलाहाबाद के निकट निहापुर नामक एक जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रामनाथ सिंह था, उनके पिता के मार्गदर्शन में ही उनकी शिक्षा दीक्षा हुई थीं। उनका विवाह ठाकुर लक्ष्मण सिंह के साथ हुआ था, उन्होंने 1921 में गांधीजी के असहसयोग आन्दोलन में हिस्सा लेने चली गई थीं। 44 साल की उम्र में 1948 में एक कार दुर्घटना में उनका निधन हो गया था।

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